गुवाहाटी,अंग भारत। असम के मुख्यमंत्री डॉ. हिमंत बिस्व सरमा ने असमिया संगीत और साहित्य के स्तंभ, प्रख्यात गीतकार आनंदिराम दास की पुण्यतिथि पर उन्हें भावभीनी श्रद्धांजलि अर्पित की है। आनंदिराम दास को असमिया संस्कृति का एक ऐसा नक्षत्र माना जाता है, जिन्होंने अपनी लेखनी से असम के लोक संगीत और आधुनिक गीतों के बीच के अंतर को पाट दिया था। उनके गीतों का प्रभाव आज भी असम के हर घर में महसूस किया जा सकता है। मुख्यमंत्री के इस संदेश ने राज्य सरकार की उस प्रतिबद्धता को दोहराया है, जिसके तहत असम की अमूल्य सांस्कृतिक धरोहरों को सहेजने और उसे आने वाली पीढ़ियों तक पहुँचाने का कार्य किया जा रहा है।
बनकोंवर का परिचय
आनंदिराम दास असमिया संगीत जगत में ‘बनकोंवर’ के नाम से विख्यात थे। उनका जीवन असम की मिट्टी, यहाँ की नदियों और चाय बागानों के साथ गहराई से जुड़ा था। वे केवल शब्द पिरोने वाले गीतकार नहीं थे, बल्कि असम की प्राकृतिक सुंदरता के एक संवेदनशील दृष्टा थे। उनके गीतों में ब्रह्मपुत्र की कल-कल ध्वनि और ग्रामीण परिवेश की सादगी का संगम मिलता है। उन्होंने ऐसे दौर में अपनी कला को निखारा जब असमिया संगीत अपनी नई पहचान की तलाश में था। उन्होंने लोक गीतों की मिठास को आधुनिक शब्दावली के साथ इस तरह संयोजित किया कि वे हर वर्ग के लोगों के प्रिय बन गए।
| महत्वपूर्ण पहलू | विवरण |
|---|---|
| लोकप्रिय नाम | ‘बनकोंवर’ (Bono Konwar) |
| मुख्य योगदान | असमिया लोक और आधुनिक सुगम संगीत का एकीकरण |
| लेखन की शैली | प्रकृति, नदी, चाय बागान और मानवीय भावनाएं |
| सांस्कृतिक प्रभाव | असमिया संगीत को राष्ट्रीय स्तर पर पहचान दिलाने में मदद |
मुख्यमंत्री का संदेश
असम के मुख्यमंत्री डॉ. हिमंत बिस्व सरमा ने उन्हें याद करते हुए कहा कि राज्य उनकी रचनाओं का सदैव ऋणी रहेगा। उन्होंने अपने संबोधन में इस बात पर जोर दिया कि आनंदिराम दास की कृतियां समय की सीमाओं से परे हैं।
“शब्दों की मधुरता, भावनाओं की गहराई और सांस्कृतिक चेतना से समृद्ध आनंदिराम दास की रचनाएं आज भी उतनी ही प्रासंगिक और प्रेरणादायक हैं। उनके गीतों ने असमिया संगीत के आकाश को सदा के लिए जगमगाया है।”
मुख्यमंत्री ने यह भी स्पष्ट किया कि भविष्य में राज्य सरकार ऐसी महान विभूतियों की स्मृतियों को संजोने के लिए और भी ठोस कदम उठाएगी। उन्होंने युवा संगीतकारों का आह्वान किया कि वे दास साहब के गीतों का अध्ययन करें ताकि वे अपनी जड़ों से कटे बिना संगीत के क्षेत्र में आगे बढ़ सकें।
गीतों की विशेषता
आनंदिराम दास की रचनाएं अपनी सादगी और गहराई के लिए जानी जाती हैं। उन्होंने अपनी लेखनी में ऐसी शब्दावली का प्रयोग किया जिसे आम आदमी आसानी से समझ सके। उनके गीतों की प्रमुख विशेषताएं निम्नलिखित हैं:
- प्रकृति का सजीव चित्रण: उनके गीतों में असम की हरियाली, नदियां और पक्षी एक जीवंत पात्र की भांति व्यवहार करते हैं।
- सुबोध भाषा: जटिल साहित्य के बजाय उन्होंने सरल असमिया भाषा का उपयोग किया।
- सांस्कृतिक पहचान: उनके गीत असमिया गौरव और अस्मिता को प्रदर्शित करते हैं।
- धुनों का सामंजस्य: वे शब्दों के साथ-साथ संगीत की बारीक समझ रखते थे, जिससे उनके गीत लयबद्ध होते थे।
संरक्षण का दायित्व
वर्तमान समय में जब संगीत की दुनिया तेजी से डिजिटल हो रही है, तब आनंदिराम दास जैसे दिग्गजों की रचनाओं का डिजिटलीकरण अनिवार्य है। असम के विभिन्न बुद्धिजीवियों का सुझाव है कि उनके गीतों को वैश्विक मंचों पर उपलब्ध कराया जाए। स्कूलों और विश्वविद्यालयों के पाठ्यक्रम में उनके जीवन और कार्यों को शामिल करना एक दूरदर्शी कदम होगा। ऐसा करने से नई पीढ़ी के पास अपने राज्य के समृद्ध इतिहास और संगीत विरासत को जानने का बेहतर अवसर होगा।
असम सरकार डॉ. हिमंत बिस्व सरमा के नेतृत्व में लगातार राज्य के सांस्कृतिक नायकों को सम्मानित कर रही है। चाहे वह महापुरुष श्रीमंत शंकरदेव का दर्शन हो या आनंदिराम दास की कालजयी धुनें, सरकार इन सभी को संरक्षित करने के लिए समर्पित है। विकास के पथ पर आगे बढ़ते हुए अपनी सांस्कृतिक पहचान को बनाए रखना ही किसी भी समाज की सच्ची प्रगति है। आनंदिराम दास की पुण्यतिथि का आयोजन केवल एक रस्म नहीं, बल्कि यह इस बात का प्रमाण है कि असम अपनी जड़ों से कितना गहराई से जुड़ा हुआ है।








