भागलपुर, अंग भारत। सिल्क सिटी के रूप में मशहूर भागलपुर के जगदीशपुर प्रखंड अंतर्गत मोहिबअली चक गांव की रहने वाली बीबी शबनम ने साहूकारों के कर्ज के दुष्चक्र को तोड़कर आर्थिक आजादी की एक नई मिसाल पेश की है। ‘बुनकर दीदी’ के नाम से पूरे क्षेत्र में लोकप्रिय हो चुकीं शबनम कभी ऊंचे ब्याज दर पर महाजनों से पैसे लेकर रेशम का धागा खरीदने को मजबूर थीं, लेकिन आज वे अपनी बुनाई कला के दम पर सालाना 10 लाख रुपये से अधिक का कारोबार कर रही हैं। बिहार सरकार की जीविका योजना और महिला स्वयं सहायता समूह के सहयोग से उन्होंने न केवल अपनी माली हालत सुधारी, बल्कि गांव की 15 अन्य महिलाओं को भी इस स्वरोजगार से जोड़कर उन्हें स्वावलंबी बनने की राह दिखाई है।
साहूकारों के चंगुल में फंसा हुनर
भागलपुर जिले के ग्रामीण इलाकों में पारंपरिक बुनकर परिवारों की जिंदगी सालों से तंगहाली में बीतती रही है। बीबी शबनम के घर में भी हथकरघा मौजूद था और उनके हाथों में हुनर की कोई कमी नहीं थी, लेकिन पूंजी के अभाव में उनकी मेहनत का फल साहूकारों और बिचौलियों की जेब में चला जाता था। रेशमी साड़ियों के निर्माण के लिए कच्चा धागा खरीदने हेतु उन्हें गांव के स्थानीय महाजनों से भारी ब्याज दरों पर कर्ज लेना पड़ता था।
इसके बाद, जब साड़ियां बनकर तैयार होती थीं, तो उन्हें उसी महाजन द्वारा तय की गई बेहद मामूली कीमत पर बेचना पड़ता था। महीने भर दिन-रात कड़ी मेहनत करने के बाद भी शबनम के हाथ सिर्फ इतनी ही रकम आती थी जिससे दो वक्त की रोटी का इंतजाम मुश्किल से हो पाता था। महाजनों का कर्ज चुकाते-चुकाते उनका परिवार कर्ज के गर्त में डूबता चला गया।
15 महिलाओं का संगठित प्रयास
साहूकारों के शोषण से मुक्ति पाने और अपने हुनर का सही मूल्य हासिल करने के लिए बीबी शबनम ने हिम्मत जुटाई। उन्होंने अकेले संघर्ष करने के बजाय गांव की अन्य जरूरतमंद महिलाओं को जोड़ने की योजना बनाई। शबनम ने अपने गांव की 15 बुनकर महिलाओं के साथ बैठक की और उन्हें एकजुट होकर काम करने के फायदे समझाए। इसके बाद इन महिलाओं ने मिलकर ‘प्राची जीविका महिला रेशम वस्त्र उत्पादक समूह’ का गठन किया।
इस समूह के गठन से महिलाओं को कई प्रकार के प्रत्यक्ष लाभ मिले:
- एकजुटता की शक्ति: अलग-अलग काम करने के बजाय सामूहिक रूप से उत्पादन शुरू किया गया।
- बिचौलियों का अंत: महाजनों से महंगे दाम पर धागा लेने के बजाय सीधे थोक बाजार से खरीदारी का रास्ता खुला।
- आर्थिक सुरक्षा: समूह की बचत और आपसी सहयोग से आपातकालीन जरूरतों के लिए पैसों का प्रबंध आसान हो गया।
जीविका योजना से मिली आर्थिक मदद
बीबी शबनम और उनके समूह की महिलाओं के इस साहसी प्रयास को बिहार सरकार की ‘जीविका’ योजना का मजबूत संबल प्राप्त हुआ। समूह की गतिविधियों और उनकी कार्ययोजना को देखते हुए ‘नई उड़ान जीविका महिला संकुल स्तरीय संघ’ के माध्यम से इस समूह को कारोबार के विस्तार के लिए 4 लाख 95 हजार रुपये की वित्तीय सहायता मंजूर की गई।
यह आर्थिक मदद शबनम और उनके साथी बुनकरों के लिए एक संजीवनी बनकर आई। इस राशि का उपयोग कर उन्होंने बाजार से सीधे उच्च गुणवत्ता वाला रेशमी धागा खरीदा। अब उन्हें कच्चा माल लेने के लिए किसी महाजन के सामने हाथ फैलाने की जरूरत नहीं बची थी। पूरी स्वतंत्रता के साथ काम करते हुए महिलाओं ने अपने हथकरघों पर गुणवत्तापूर्ण भागलपुरी सिल्क साड़ियों का उत्पादन तेजी से बढ़ा दिया।
| प्रमुख विवरण | जानकारी |
|---|---|
| लाभार्थी का नाम | बीबी शबनम (बुनकर दीदी) |
| स्थान | मोहिबअली चक गांव, जगदीशपुर प्रखंड, भागलपुर |
| उत्पादक समूह | प्राची जीविका महिला रेशम वस्त्र उत्पादक समूह |
| सहयोगी संस्था | नई उड़ान जीविका महिला संकुल स्तरीय संघ |
| स्वीकृत वित्तीय राशि | 4,95,000 रुपये |
| वर्तमान वार्षिक आय | 10 लाख रुपये से अधिक |
बड़े शहरों के शोरूम तक पहुंची साड़ियां
उत्पादन की प्रक्रिया बदलने के साथ ही बिक्री की रणनीति में भी बड़ा बदलाव किया गया। पहले जहां शबनम की बनाई साड़ियां सिर्फ स्थानीय गांव के हाट-बाजारों तक सीमित रहती थीं और बहुत कम दाम में बिकती थीं, वहीं अब स्थिति पूरी तरह बदल चुकी है। जीविका और वूमेन वर्ल्ड बैंकिंग के संयुक्त प्रयास से आयोजित किए जाने वाले ‘बायर्स-सेलर्स मीट’ जैसे राष्ट्रीय व प्रांतीय मंचों ने इन महिला बुनकरों को देश भर के बड़े खरीदारों और शोरूम मालिकों से सीधे जोड़ दिया है।
बीबी शबनम द्वारा तैयार भागलपुरी सिल्क साड़ियों की चमक, शुद्धता और उत्कृष्ट बुनाई की मांग अब बड़े शहरों के नामी शोरूमों में होने लगी है। बिचौलियों की मध्यस्थता समाप्त होने के कारण बिक्री से मिलने वाला पूरा मुनाफा सीधे शबनम और उनके समूह की महिलाओं के बैंक खातों में जमा होता है।
स्वावलंबन और सम्मान का नया सफर
सालाना 10 लाख रुपये से अधिक का कारोबार कर रही बीबी शबनम आज गांव की अन्य महिलाओं के लिए एक मिसाल बन चुकी हैं। उनकी इस सफलता ने यह साबित कर दिया है कि यदि सही मार्गदर्शन और वित्तीय सहायता मिले तो ग्रामीण महिलाएं अपने हुनर के दम पर बड़ी से बड़ी बाधा को पार कर सकती हैं।
अपनी सफलता की इस यात्रा को याद करते हुए शबनम कहती हैं:
“एक वक्त था जब लगता था कि हमारा हुनर सिर्फ महाजनों का कर्ज चुकाने में ही खत्म हो जाएगा। लेकिन जब महिलाएं एक साथ खड़ी हुईं और जीविका का सहारा मिला, तो समझ आया कि हमारे हाथों में ही हमारी तकदीर है। आज हमारी कमाई 10 लाख से ऊपर है और हमारे साथ जुड़ी कई बहनें आत्मनिर्भर बन चुकी हैं।”
बीबी शबनम का यह सफर केवल व्यक्तिगत कमाई की कहानी नहीं है, बल्कि यह ग्रामीण बिहार में महिला सशक्तीकरण और ‘लखपति दीदी’ की संकल्पना को धरातल पर सच साबित करने वाली एक प्रेरणादायक गाथा है। आज मोहिबअली चक गांव के हथकरघों से उठने वाली आवाज केवल साड़ियों के ताने-बाने की नहीं, बल्कि महिलाओं की आत्मनिर्भरता और सम्मान की गूंज है।








