वीआरएम बिजनेस सर्विसेज और उसके निदेशक राजेश गोयनका पर धन शोधन का दर्ज हुआ मामला, अवैध कॉल सेंटर के जरिए विदेशियों को बनाया गया था निशाना
कोलकाता,अंग भारत। प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) ने कोलकाता की आईटी कंपनी वीआरएम बिजनेस सर्विसेज प्राइवेट लिमिटेड और उसके निदेशक राजेश गोयनका समेत अन्य आरोपितों के खिलाफ बड़ी कार्रवाई करते हुए धन शोधन निवारण अधिनियम (पीएमएलए), 2002 के तहत विशेष अदालत में आरोपपत्र दाखिल किया है। जांच एजेंसी का आरोप है कि कंपनी के कार्यालय से अवैध कॉल सेंटर संचालित किया जा रहा था, जिसके माध्यम से विदेशी नागरिकों को झूठे बहाने बनाकर ठगा गया और करीब 20.35 करोड़ रुपये की अवैध कमाई की गई।ईडी के अनुसार यह मामला इलेक्ट्रॉनिक्स कॉम्प्लेक्स, बिधाननगर थाना में दर्ज प्राथमिकी के आधार पर शुरू हुआ था। शुरुआती जांच में सामने आया कि कंपनी के नाम और संसाधनों का इस्तेमाल ऐसे कॉल सेंटर को संचालित करने में किया गया, जहां से विदेशों में रहने वाले लोगों को फोन कर उन्हें प्रतिष्ठित कंपनियों का प्रतिनिधि बताकर विश्वास में लिया जाता था। इसके बाद तकनीकी सहायता, सॉफ्टवेयर सेवाओं, सदस्यता समाप्त करने या अन्य फर्जी सेवाओं के नाम पर उनसे रकम वसूली जाती थी।
जांच में सामने आया सुनियोजित नेटवर्क
ईडी की जांच के मुताबिक यह कोई सामान्य धोखाधड़ी नहीं थी, बल्कि पूरी तरह योजनाबद्ध तरीके से संचालित साइबर ठगी का नेटवर्क था। आरोप है कि कॉल सेंटर में कार्यरत कर्मचारी इंटरनेट आधारित कॉलिंग सेवाओं का इस्तेमाल कर विदेशी नागरिकों से संपर्क करते थे।बातचीत के दौरान उन्हें यह विश्वास दिलाया जाता था कि वे किसी बड़े इंटरनेशनल कंपनी के अधिकारी हैं।इसके बाद ग्राहकों को कंप्यूटर में वायरस, सुरक्षा संबंधी खतरे, फर्जी तकनीकी समस्याएं या सदस्यता समाप्त होने जैसी बातें बताकर डराया जाता था। कई मामलों में उन्हें उपहार वाउचर, प्रीमियम तकनीकी सहायता या अन्य ऐसी सेवाओं का लालच दिया जाता था,जो हकीकत था ही नहीं। इन बहानों के जरिए पीड़ितों से ऑनलाइन पैसे लिए जा रहे थे।
कंपनी ने ही उपलब्ध कराई थी पूरी व्यवस्था
जांच एजेंसी का कहना है कि वीआरएम बिजनेस सर्विसेज प्राइवेट लिमिटेड और उसके निदेशक राजेश गोयनका ने इस पूरे अवैध कारोबार को चलाने के लिए जरुरी सुविधाएं उपलब्ध कराईं।कंपनी के परिसर, तकनीकी संसाधनों और अन्य व्यवस्थाओं का उपयोग कथित रूप से इसी फर्जी कॉल सेंटर के संचालन में किया गया।ईडी का दावा है कि जांच में ऐसे कई साक्ष्य मिले हैं, जिनसे यह स्पष्ट होता है कि कंपनी और उसके निदेशक इस पूरे नेटवर्क से सीधे तौर पर जुड़े हुए थे और अपराध से कमाए हुए धन के प्रमुख लाभार्थी भी थे।
करोड़ों की संपत्ति पहले ही हो चुकी है जब्त
धन शोधन मामले की जांच के दौरान ईडी पहले ही आरोपितों की बड़ी संपत्तियों पर कार्रवाई कर चुकी है। एजेंसी ने लगभग 2.35 करोड़ रुपये मूल्य की चल संपत्तियां और विभिन्न बैंक खातों को जब्त तथा फ्रीज किया है। इसके अलावा करीब 11.14 करोड़ रुपये मूल्य की अचल संपत्तियों को भी अस्थायी रूप से कुर्क किया जा चुका है।ईडी का कहना है कि जांच में यह भी सामने आया है कि ठगी से हासिल रकम का इस्तेमाल आभूषण खरीदने, अचल संपत्तियां अर्जित करने और अन्य निवेश करने में किया गया। एजेंसी अब इस धन के पूरे लेनदेन और उससे जुड़े अन्य लोगों की भूमिका की भी जांच कर रही है।
कर्मचारियों और संचालकों की भूमिका भी जांच के दायरे में
जांच एजेंसी के मुताबिक केवल कंपनी और उसके निदेशक ही नहीं, बल्कि कॉल सेंटर का संचालन करने वाले लोग और वहां काम करने वाले कुछ कर्मचारी भी इस अवैध कमाई के लाभार्थियों में शामिल थे। ईडी यह पता लगाने का प्रयास कर रही है कि इस नेटवर्क में और कौन-कौन लोग शामिल थे तथा विदेशों से प्राप्त धन को किस प्रकार विभिन्न माध्यमों से निवेश या खर्च किया गया।
अदालत में दाखिल हुआ आरोपपत्र
ईडी ने अब विशेष अदालत में आरोपपत्र दाखिल कर दिया है। एजेंसी का मानना है कि उपलब्ध साक्ष्य धन शोधन और संगठित साइबर धोखाधड़ी के आरोपों को मजबूत करते हैं। अदालत में मामले की सुनवाई के दौरान आगे यह तय होगा कि आरोपितों के खिलाफ किन धाराओं में मुकदमा चलाया जाएगा।यह मामला एक बार फिर इस बात को उजागर करता है कि साइबर ठगी के नेटवर्क अब केवल देश तक सीमित नहीं हैं, बल्कि विदेशी नागरिकों को भी निशाना बनाकर बड़े पैमाने पर अवैध कमाई की जा रही है। जांच एजेंसियां ऐसे मामलों में लगातार कार्रवाई कर रही हैं ताकि इस तरह के संगठित साइबर अपराधों पर प्रभावी अंकुश लगाया जा सके।











