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नेपाल में 6 अध्यादेशों पर रोक, राष्ट्रपति का बड़ा फैसला

काठमांडू,अंग भारत। नेपाल की राजनीति में उस समय नया मोड़ आ गया जब राष्ट्रपति रामचन्द्र पौडेल ने सरकार द्वारा प्रस्तावित छह अहम अध्यादेशों को तत्काल प्रभाव से रोक दिया। बालेन्द्र सरकार ने संसद सत्र के स्थगन के बीच इन अध्यादेशों को मंजूरी के लिए राष्ट्रपति के पास भेजा था, लेकिन राष्ट्रपति ने बिना जल्दबाजी किए पहले संवैधानिक विशेषज्ञों से परामर्श लेने का फैसला किया है।राष्ट्रपति भवन की ओर से मिली जानकारी के अनुसार, इन अध्यादेशों पर निर्णय लेने से पहले विशेषज्ञों के साथ विस्तृत चर्चा की जाएगी। इसके लिए शीतल निवास में संवैधानिक विशेषज्ञों की बैठक बुलाई गई है, जिसमें इन प्रस्तावों के कानूनी और संवैधानिक पहलुओं पर विचार किया जाएगा।

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किन मुद्दों से जुड़े हैं अध्यादेश

सरकार द्वारा लाए गए ये अध्यादेश कई महत्वपूर्ण क्षेत्रों को प्रभावित करते हैं। इनमें सार्वजनिक निकायों में नियुक्तियों को अधिक पारदर्शी और प्रतिस्पर्धी बनाना, राजनीतिक हस्तक्षेप को कम करना, और सार्वजनिक निर्माण कार्यों को तेज करना शामिल है। इसके अलावा सहकारी संस्थाओं में फंसे छोटे बचतकर्ताओं की राशि वापस दिलाने और भूमि, मालपोत तथा नापी सेवाओं को अधिक प्रभावी बनाने के उद्देश्य भी इन अध्यादेशों में शामिल हैं।इन प्रस्तावों में संवैधानिक परिषद से जुड़े कानून में संशोधन, सहकारी अधिनियम में बदलाव, विश्वविद्यालय और स्वास्थ्य विज्ञान संस्थानों से संबंधित कानूनों में संशोधन, और सार्वजनिक खरीद प्रक्रिया को सरल बनाने जैसे प्रावधान भी शामिल हैं। साथ ही, अतीत में राजनीतिक आधार पर नियुक्त पदाधिकारियों को हटाने के लिए विशेष व्यवस्था का प्रस्ताव भी दिया गया है।

संवैधानिक परिषद बना विवाद की जड़

राष्ट्रपति के मीडिया सलाहकार किरण पोखरेल के अनुसार, सबसे अधिक असमंजस संवैधानिक परिषद से जुड़े अध्यादेश को लेकर है। इस अध्यादेश में यह प्रस्ताव रखा गया है कि परिषद के छह सदस्यों में से तीन सदस्य मिलकर भी निर्णय ले सकते हैं।हालांकि, इससे पहले जब संसद ने इसी तरह का एक विधेयक पारित किया था, तब राष्ट्रपति ने उसे पुनर्विचार के लिए वापस भेज दिया था। उस समय उन्होंने कहा था कि इस तरह के महत्वपूर्ण निर्णयों के लिए बहुमत आवश्यक होना चाहिए, जो लोकतांत्रिक मूल्यों के अनुरूप है। यही कारण है कि अब राष्ट्रपति इस प्रावधान को लेकर सतर्क रुख अपना रहे हैं।राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि राष्ट्रपति का यह कदम सरकार के लिए एक बड़ा झटका है, क्योंकि इन अध्यादेशों के जरिए सरकार कई अहम सुधार लागू करना चाहती थी। अब विशेषज्ञों की राय के बाद ही यह तय होगा कि इन अध्यादेशों को मंजूरी दी जाएगी या उनमें बदलाव किया जाएगा।फिलहाल नेपाल की राजनीति में इस घटनाक्रम ने नई बहस को जन्म दे दिया है। सरकार और राष्ट्रपति के बीच संतुलन, संवैधानिक मर्यादाएं और लोकतांत्रिक प्रक्रिया—इन सभी मुद्दों पर अब चर्चा तेज हो गई है।

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अंग भारत • रिपोर्टर

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