नई दिल्ली,अंग भारत। पंजाब में अस्सी और नब्बे के दशक के काले दौर पर बनी फिल्म ‘सतलुज’ रिलीज से पहले ही गंभीर राजनीतिक और सामाजिक विवादों में घिर गई है। केंद्रीय राज्यमंत्री रवनीत सिंह बिट्टू ने इस फिल्म में दिखाए गए दावों को सिरे से खारिज करते हुए निर्माताओं को खुली चुनौती दी है। बिट्टू ने फिल्म में किए गए उस दावे पर सबसे बड़ी आपत्ति दर्ज कराई है, जिसमें दावा किया गया है कि पंजाब में आतंकवाद के दौरान करीब 25 हजार लोग रहस्यमयी तरीके से गायब हो गए थे। केंद्रीय मंत्री ने साफ कहा है कि यदि निर्माता अगले कुछ दिनों में इस आंकड़े से जुड़े पुख्ता सरकारी दस्तावेज और कानूनी सबूत पेश नहीं करते हैं, तो वे निर्माताओं के खिलाफ कड़ी कानूनी कार्रवाई करेंगे। यह विवाद केवल एक फिल्म की कहानी तक सीमित नहीं है, बल्कि यह पंजाब के उस जख्म को फिर से कुरेद रहा है जिस पर आज भी सियासत और इतिहासकार आमने-सामने खड़े हैं।
विवाद की मुख्य वजह
पंजाब का वह दौर बेहद संवेदनशील रहा है। उस समय क्या हुआ, इसके आंकड़े हमेशा से तीखी बहस का विषय रहे हैं। फिल्म ‘सतलुज’ इसी संवेदनशील नस पर हाथ रखती है। रवनीत सिंह बिट्टू का कहना है कि मनोरंजन के नाम पर इतिहास के साथ खिलवाड़ बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। उन्होंने चुनौती दी कि अगर फिल्म बनाने वालों के पास कोई पुख्ता दस्तावेज हैं, तो वे पीछे क्यों हट रहे हैं? वे इन सबूतों को देश की जनता के सामने लाएं। बिट्टू ने यहां तक कह दिया कि अगर दावे सच साबित होते हैं, तो वे खुद सार्वजनिक मंच पर खड़े होकर माफी मांगेंगे। लेकिन अगर यह महज सनसनी फैलाने की कोशिश है, तो इसका अंजाम कोर्ट में तय होगा।
लापता लोगों का आंकड़ा
फिल्म में 25 हजार लोगों के लापता होने की बात कही गई है। यह संख्या कोई मामूली आंकड़ा नहीं है। ऐतिहासिक दस्तावेजों और सरकारी रिपोर्टों में इस तरह के बड़े आंकड़ों का कोई पुख्ता मेल नहीं मिलता। इसी विरोधाभास को लेकर बिट्टू ने सवाल उठाए हैं। इस आंकड़े के पीछे का सच क्या है, यह केवल फिल्म निर्माता ही बता सकते हैं। लेकिन बिना किसी ठोस आधार के इतने संवेदनशील आंकड़े को परदे पर दिखाना समाज में गलत संदेश भेज सकता है।
इतिहास बनाम सिनेमाई स्वतंत्रता
सिनेमा को समाज का आईना माना जाता है, लेकिन जब बात किसी ऐतिहासिक त्रासदी की हो, तो जिम्मेदारी दोगुनी हो जाती है। बिट्टू ने आरोप लगाया कि फिल्म में जानबूझकर एकतरफा कहानी सेट करने की कोशिश की गई है। उनका कहना है कि पंजाब ने जो झेला, वह सिर्फ एक पक्ष की कहानी नहीं थी। वह पूरा राज्य एक भयावह दौर से गुजरा था, जहां रोज निर्दोष लोग अपनी जान गंवा रहे थे।
पीड़ितों की अनदेखी
उस दौर में सिर्फ राजनीतिक या मानवाधिकार कार्यकर्ता ही प्रभावित नहीं हुए थे। हजारों की संख्या में आम लोग, हिंदू परिवार, खेतों में काम करने वाले मजदूर, बस यात्री और सरकारी कर्मचारी भी अपनी जान गंवा चुके थे। बिट्टू ने मीडिया से बातचीत में तीखा सवाल पूछा कि इन बेगुनाहों की चीखें फिल्म में क्यों नहीं सुनाई दीं? केवल एक पक्ष को दिखाकर सहानुभूति बटोरने की कोशिश इतिहास के साथ बेइंसाफी है। फिल्मकारों को हर पीड़ित के दर्द को समान जगह देनी चाहिए थी।
तारीखों का बड़ा झोल
इस पूरे मामले में सबसे बड़ा मोड़ तब आया जब बिट्टू ने फिल्म में अपने दादा और पंजाब के पूर्व मुख्यमंत्री बेअंत सिंह की भूमिका पर सवाल खड़े किए। उन्होंने सीधे तौर पर इतिहास की तारीखों का हवाला देकर फिल्म की रिसर्च पर ही पानी फेर दिया। इस विरोधाभास को समझने के लिए हमें उस दौर की दो बड़ी घटनाओं की तारीखों को देखना होगा, जो फिल्म के दावों को कमजोर करती हैं।
| ऐतिहासिक घटना | वास्तविक तारीख / वर्ष | तथ्यात्मक स्थिति |
|---|---|---|
| बेअंत सिंह की शहादत | 31 अगस्त 1995 | बम धमाके में मौत |
| जसवंत सिंह खालड़ा की गिरफ्तारी | 6 सितंबर 1995 | बेअंत सिंह की मृत्यु के बाद |
जसवंत सिंह का मामला
मानवाधिकार कार्यकर्ता जसवंत सिंह खालड़ा का मामला पंजाब के इतिहास में बेहद संवेदनशील माना जाता है। फिल्म में कथित तौर पर जसवंत सिंह की गिरफ्तारी और उसमें पूर्व मुख्यमंत्री बेअंत सिंह की संलिप्तता को दिखाने की कोशिश की गई है। लेकिन असलियत कुछ और ही बयां करती है। जसवंत सिंह खालड़ा को पुलिस ने 6 सितंबर 1995 को हिरासत में लिया था। जबकि बेअंत सिंह की हत्या उससे पहले ही, यानी 31 अगस्त 1995 को एक आत्मघाती बम धमाके में हो चुकी थी। जब कोई व्यक्ति जीवित ही नहीं था, तो वह किसी की गिरफ्तारी का आदेश कैसे दे सकता है? यह बुनियादी भूल फिल्म की पूरी विश्वसनीयता पर सवाल खड़े करती है।
सिनेमा और राजनीतिक असर
इस फिल्म को इतनी चर्चा मिलने की एक बड़ी वजह इसमें अभिनेता दिलजीत दोसांझ का नाम जुड़ना भी है। दिलजीत पंजाब ही नहीं, बल्कि वैश्विक स्तर पर एक बड़ा चेहरा हैं। उनकी मौजूदगी ने इस फिल्म को अचानक सुर्खियों में ला दिया। बिट्टू का मानना है कि इस तरह के बड़े सितारों के कंधों का इस्तेमाल करके कुछ लोग अपने निजी एजेंडे को हवा दे रहे हैं।
“इतिहास कोई फिक्शन नहीं है जिसे अपनी मर्जी से बदला जा सके। अगर आप पंजाब के जख्मों पर फिल्म बना रहे हैं, तो आपके पास सच को सहने और दिखाने का माद्दा भी होना चाहिए। हवा में आंकड़े उछालने से सिर्फ नफरत बढ़ती है, समाधान नहीं मिलता।”
— रवनीत सिंह बिट्टू, रेल एवं खाद्य प्रसंस्करण उद्योग राज्यमंत्री
पंजाब में शांति बहाली के लिए एक लंबी और दर्दनाक लड़ाई लड़ी गई थी। बेअंत सिंह की सरकार ने उस दौर में उग्रवाद को खत्म करने के लिए सख्त फैसले लिए थे, जिसके लिए उन्हें अपनी जान भी गंवानी पड़ी। ऐसे में उनके परिवार और समर्थकों का नाराज होना स्वाभाविक है। विवाद अब केवल सेंसर बोर्ड तक सीमित नहीं रहने वाला। पंजाब के इस संवेदनशील मुद्दे पर अब कानूनी लड़ाई की जमीन तैयार हो चुकी है। अब सबकी नजरें फिल्म के निर्माताओं पर हैं कि वे इन तीखे सवालों का क्या जवाब देते हैं और क्या कोर्ट में टिक पाने लायक सबूत पेश कर पाते हैं या नहीं।








