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राज्यसभा में राष्ट्रगीत को राष्ट्रगान के समान दर्जा देने वाला विधेयक पेश, संसद के दोनों सदन सोमवार तक स्थगित

राज्यसभा में पेश हुए विधेयक में वंदे मातरम को राष्ट्रगान के समान कानूनी दर्जा देने की मांग पर संसद में चर्चा और हंगामा।

नई दिल्ली, अंग भारत। संसद के उच्च सदन राज्यसभा में शुक्रवार को राष्ट्रगीत ‘वंदे मातरम’ को राष्ट्रगान ‘जन गण मन’ के समान कानूनी दर्जा दिलाने के उद्देश्य से एक निजी विधेयक पेश किया गया। केंद्रीय गृह राज्यमंत्री नित्यानंद राय द्वारा राष्ट्र गौरव अपमान निवारण अधिनियम, 1971 में संशोधन के इस प्रस्ताव के बाद सदन में तीखी बहस छिड़ गई। विपक्ष के भारी हंगामे और विरोध के कारण संसद के दोनों सदनों की कार्यवाही को सोमवार तक के लिए स्थगित कर दिया गया है। यह विधेयक न केवल कानूनी ढांचे में बदलाव की बात करता है, बल्कि देश के ऐतिहासिक प्रतीकों के सम्मान और संवैधानिक व्याख्याओं पर एक बड़ी बहस को जन्म दे चुका है।

विधेयक का कानूनी आधार

सरकार की ओर से इस विधेयक को पेश करने के पीछे का तर्क स्पष्ट है—संवैधानिक समानता। नित्यानंद राय ने संविधान सभा के पन्नों का हवाला देते हुए कहा कि 24 जनवरी 1950 को पहले राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद ने स्पष्ट रूप से घोषणा की थी कि ‘वंदे मातरम’ को ‘जन गण मन’ के समकक्ष ही सम्मान मिलना चाहिए। वर्तमान में 1971 का कानून केवल राष्ट्रगान के अपमान पर दंडात्मक कार्रवाई की अनुमति देता है। सरकार चाहती है कि ‘वंदे मातरम’ को भी वही संवैधानिक सुरक्षा मिले ताकि इसे अपमान से बचाया जा सके। उनका मानना है कि यह संशोधन देश के प्रत्येक नागरिक में दोनों प्रतीकों के लिए समान आदर सुनिश्चित करेगा।

विपक्ष के गंभीर सवाल

विपक्ष, विशेषकर वामपंथी दलों ने इस कदम को वैचारिक ध्रुवीकरण का नाम दिया है। सांसद जॉन ब्रिटास ने इसे संविधान की मूल भावना के खिलाफ बताया है। उनका तर्क है कि संविधान निर्माताओं ने तीन साल की लंबी चर्चा के बाद बहुत सोच-समझकर इन दोनों प्रतीकों के लिए अलग-अलग भूमिकाएं तय की थीं। एक साधारण कानून के जरिए इस व्यवस्था को बदलना लोकतांत्रिक मर्यादा के अनुरूप नहीं है।

दूसरी ओर, सांसद संदोष कुमार पी का कहना है कि यह विधेयक बंकिमचंद्र चट्टोपाध्याय और रवींद्रनाथ ठाकुर के योगदान के बीच एक अनावश्यक प्रतिस्पर्धा पैदा कर रहा है। विपक्ष का मानना है कि देशभक्ति को दंड के डर से नहीं, बल्कि स्वेच्छा से अपनाया जाना चाहिए। जबरन थोपा गया कानून न केवल समाज को बांटता है, बल्कि राष्ट्रीय एकता की उस बारीकी को भी खत्म करता है जिसे हमारे स्वतंत्रता सेनानियों ने बड़ी मेहनत से बुना था।

कारगिल शहीदों को नमन

संसद की कार्यवाही में यह हंगामा उस समय शुरू हुआ, जब पूरे सदन ने कारगिल विजय दिवस की 27वीं वर्षगांठ पर शहीदों को श्रद्धांजलि दी। लोकसभा अध्यक्ष और राज्यसभा के सदस्यों ने विषम परिस्थितियों में अपनी जान गंवाने वाले वीर जवानों के अदम्य साहस को याद किया। सेना के शौर्य के प्रति सदन ने एक सुर में सम्मान व्यक्त किया। यह क्षण देश की एकजुटता का प्रतीक था, लेकिन अफसोस की बात रही कि इस गौरवशाली स्मृतियों के तुरंत बाद सदन राजनीतिक खींचतान का अखाड़ा बन गया और जनहित की चर्चाएं पीछे छूट गईं।

संसद में गतिरोध

हंगामे के बीच संसदीय कार्यमंत्री किरेन रिजिजू ने विपक्षी सदस्यों से सदन चलाने की अपील की। उन्होंने सोनम वांगचुक के मुद्दे और लद्दाख के छात्रों की समस्याओं का उदाहरण देते हुए कहा कि सरकार बातचीत के लिए तैयार है। उन्होंने कांग्रेस नेता राहुल गांधी से भी आग्रह किया कि वे सार्थक चर्चा के लिए माहौल बनाएं। रिजिजू के मुताबिक, संसद जनता के मुद्दों का मंच है, लेकिन बार-बार होने वाले व्यवधानों के कारण देश के महत्वपूर्ण विषयों पर कोई ठोस निर्णय नहीं हो पा रहा है।

ऐतिहासिक और सांस्कृतिक तथ्य

  • संवैधानिक इतिहास: 24 जनवरी 1950 को संविधान सभा ने ‘जन गण मन’ को राष्ट्रगान और ‘वंदे मातरम’ को राष्ट्रगीत के रूप में स्वीकार किया था।
  • मूल अधिनियम 1971: यह कानून राष्ट्रीय गौरव के अपमान को रोकता है, जिसमें तिरंगा और राष्ट्रगान का अनादर दंडनीय अपराध है।
  • क्रांतिकारी प्रेरणा: बंकिमचंद्र का ‘वंदे मातरम’ उपन्यास ‘आनंदमठ’ का हिस्सा है, जो आजादी की लड़ाई में लाखों क्रांतिकारियों के लिए प्राणवायु का काम करता था।
  • विवादास्पद पहलू: आलोचक इसे कानूनी बाध्यता मानते हैं, जबकि समर्थक इसे राष्ट्र के नायकों के प्रति सच्चा सम्मान प्रदान करने की प्रक्रिया बता रहे हैं।

वर्तमान स्थिति यह है कि जब तक सरकार और विपक्ष किसी आम सहमति पर नहीं पहुंचते, तब तक यह विधायी प्रक्रिया अधर में लटकी रहेगी। सोमवार को जब सदन फिर से शुरू होगा, तो देश की निगाहें इसी बात पर होंगी कि क्या इस संवेदनशील मुद्दे पर कोई सर्वसम्मत समाधान निकल पाएगा या फिर राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप का सिलसिला आगे भी जारी रहेगा।

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अंग भारत • रिपोर्टर

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