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जांच संपन्न मामलों में 34 प्रतिशत नाम मतदाता सूची से हटाने योग्य पाए गए

कोलकाता,अंग भारत। पश्चिम बंगाल में आगामी विधानसभा चुनावों से पहले मतदाता सूची को पूरी तरह शुद्ध और पारदर्शी बनाने का काम तेजी से चल रहा है। इस समय राज्य की वोटर लिस्ट में “तार्किक विसंगति” (logical anomaly) वाली श्रेणी में रखे गए संदिग्ध नामों की गहन न्यायिक जांच की जा रही है। अब तक जितने भी मामलों का निपटारा हुआ है, उनमें से लगभग 34 प्रतिशत नाम फर्जी, गलत या नियमों के विपरीत पाए गए हैं, जिन्हें मतदाता सूची से हटा दिया जाएगा। राज्य के मुख्य निर्वाचन पदाधिकारी कार्यालय के सूत्रों के अनुसार, अब तक जांचे गए कुल मामलों में से एक चौथाई का फैसला हो चुका है और इस बड़ी कार्रवाई के बाद बंगाल में हटाए गए मतदाताओं का कुल आंकड़ा 63 लाख को पार कर गया है।

मतदाता सूची का गणित

इस पूरी प्रक्रिया को समझने के लिए आंकड़ों पर नजर डालना जरूरी है। चुनाव आयोग ने पश्चिम बंगाल की मतदाता सूची में गड़बड़ियों को दूर करने के लिए विशेष अभियान चलाया है। पिछले साल दिसंबर में जब प्रारूप मतदाता सूची प्रकाशित हुई थी, तब “मृत”, “स्थानांतरित” (दूसरी जगह जा चुके), “डुप्लीकेट” (दोहरी प्रविष्टि) और “लापता” श्रेणियों के तहत 59 लाख मतदाताओं के नाम पहले ही हटाए जा चुके थे।

इसके बाद, “तार्किक विसंगति” के संदेह वाले कुल 60 लाख से अधिक मामलों की पहचान की गई। इन सभी मामलों को जांच के लिए न्यायिक अधिकारियों के पास भेजा गया। ताजा रिपोर्ट के अनुसार, शुक्रवार रात तक इनमें से लगभग 15 लाख मामलों की जांच पूरी कर ली गई, जो कुल चिह्नित मामलों का 25 प्रतिशत है। इस 15 लाख की जांच में से 5 लाख से अधिक नाम वोटर लिस्ट से हटाए जाने के योग्य पाए गए हैं। यही वह 34 प्रतिशत हिस्सा है जिसे फर्जी या त्रुटिपूर्ण माना गया है और इसी वजह से कुल कटे नामों की संख्या अब बढ़कर 63 लाख तक पहुंच गई है।

कैसे हो रही जांच?

वोटर लिस्ट से किसी का नाम हटाना एक बेहद संवेदनशील मामला है। लोकतांत्रिक देश में किसी भी वैध वोटर का नाम गलती से न कटे, इसके लिए चुनाव आयोग पूरी सावधानी बरत रहा है। इसीलिए इन 60 लाख संदिग्ध मामलों की जांच सीधे प्रशासनिक अधिकारियों के बजाय न्यायिक अधिकारियों से कराई जा रही है। इस समय पश्चिम बंगाल में इस महा-अभियान को पूरा करने के लिए कुल 732 न्यायिक अधिकारी दिन-रात काम कर रहे हैं।

काम के भारी दबाव को देखते हुए पड़ोसी राज्यों से भी मदद ली गई है। इस जांच दल में झारखंड और ओडिशा से आए 100-100 न्यायिक अधिकारियों को भी शामिल किया गया है। अधिकारियों की इस बड़ी टीम की बदौलत जांच की रफ्तार काफी तेज है और माना जा रहा है कि इस प्रक्रिया से जुड़ी पहली पूरक (supplementary) मतदाता सूची अगले हफ्ते ही जारी कर दी जाएगी।

मुख्य चुनाव आयुक्त का दौरा

पिछले सप्ताह भारत निर्वाचन आयोग (ECI) की पूरी टीम ने खुद जमीनी हालात का जायजा लिया। मुख्य निर्वाचन आयुक्त ज्ञानेश कुमार के नेतृत्व में आयोग का पूर्ण पीठ कोलकाता पहुंचा था। उन्होंने राज्य के आला अधिकारियों और राजनीतिक दलों के प्रतिनिधियों के साथ लंबी बैठकें कीं।

कोलकाता में मीडिया से बात करते हुए मुख्य निर्वाचन आयुक्त ज्ञानेश कुमार ने साफ किया कि राज्य में होने वाले आगामी विधानसभा चुनावों से पहले मतदाता सूची को पूरी तरह त्रुटिहीन बना दिया जाएगा। उन्होंने भरोसा जताया कि समय रहते न्यायिक जांच की यह जटिल प्रक्रिया पूरी हो जाएगी। आयोग का मुख्य उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि राज्य का कोई भी वास्तविक और योग्य मतदाता मतदान करने से वंचित न रहे, और किसी भी फर्जी व्यक्ति का नाम सूची में न बचे।

पीड़ितों के लिए क्या विकल्प?

इस पूरी कार्रवाई में पारदर्शिता और न्याय का पूरा ध्यान रखा जा रहा है। जिन लोगों के नाम इस सूची से हटाए जा रहे हैं, उन्हें असहाय नहीं छोड़ा जाएगा। माननीय उच्चतम न्यायालय (सुप्रीम कोर्ट) के ताजा दिशा-निर्देशों के तहत, जिन मतदाताओं के नाम काटे जाएंगे, उन्हें अपनी आपत्ति दर्ज कराने का पूरा अधिकार होगा।

  • पीड़ित वोटर अपीलीय न्यायाधिकरण (Appellate Tribunal) के समक्ष अपनी अपील दायर कर सकते हैं।
  • न्यायाधिकरण में वे अपने वैध दस्तावेज पेश करके यह साबित कर सकते हैं कि वे उसी क्षेत्र के वास्तविक निवासी हैं।
  • यदि न्यायाधिकरण उनकी दलीलों और दस्तावेजों से संतुष्ट होता है, तो उनका नाम तुरंत दोबारा सूची में शामिल कर लिया जाएगा।

क्या है आगे की राह?

पश्चिम बंगाल की अंतिम मतदाता सूची, जिसमें न्यायिक जांच वाले 60 लाख संदिग्ध मामलों को अलग रखा गया था, उसे पहले ही 28 फरवरी को प्रकाशित किया जा चुका है। अब जैसे-जैसे न्यायिक जांच आगे बढ़ेगी और मामलों का निपटारा होगा, वैसे-वैसे सुप्रीम कोर्ट के आदेशानुसार नई पूरक सूचियां जारी की जाती रहेंगी।

यह पूरी कसरत पश्चिम बंगाल के चुनावी इतिहास में एक बड़ा बदलाव ला सकती है। इतने बड़े पैमाने पर फर्जी और दोहरे नामों का हटना यह दर्शाता है कि पहले की व्यवस्था में कितनी खामियां थीं। चुनाव आयोग और न्यायिक तंत्र की यह साझा कोशिश राज्य में निष्पक्ष और पारदर्शी चुनाव कराने की दिशा में एक बड़ा कदम साबित होगी।

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अंग भारत • रिपोर्टर

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