पूर्णिया,अंग भारत। पूर्णिया के निर्दलीय सांसद राजेश रंजन उर्फ पप्पू यादव ने लोकसभा में देश के सबसे पिछड़े इलाकों में शुमार कोसी और सीमांचल क्षेत्र की तकदीर बदलने के लिए केंद्र सरकार से तीन बड़े राष्ट्रीय संस्थानों—आईआईटी (IIT), आईआईएम (IIM) और एम्स (AIIMS) की स्थापना की मांग पुरजोर तरीके से उठाई है। सांसद पप्पू यादव का तर्क है कि साल 2000 में बिहार के विभाजन के बाद यह पूरा इलाका विकास की दौड़ में बहुत पीछे छूट गया है। नेपाल और बांग्लादेश की अंतरराष्ट्रीय सीमाओं से सटे इस संवेदनशील और भौगोलिक रूप से महत्वपूर्ण क्षेत्र में उच्च शिक्षा, विश्वस्तरीय स्वास्थ्य सुविधाओं और रोजगार के अवसरों की भारी कमी है, जिसे दूर करने के लिए केंद्र सरकार का सीधा हस्तक्षेप जरूरी हो चुका है। इसके साथ ही उन्होंने सीमांचल के गरीब लोगों को सस्ता और सुलभ न्याय दिलाने के लिए पूर्णिया में पटना हाई कोर्ट की एक खंडपीठ (बेंच) स्थापित करने की भी बड़ी मांग सदन के सामने रखी।
सीमांचल की अनदेखी
संसद में अपनी बात रखते हुए पप्पू यादव ने इस बात पर गहरा दुख जताया कि कोसी और सीमांचल के जिलों (पूर्णिया, कटिहार, अररिया, किशनगंज, सहरसा, मधेपुरा, सुपौल) को हमेशा से हाशिए पर रखा गया है। बिहार बंटवारे के बाद से इस बेल्ट के विकास पर कोई खास ध्यान नहीं दिया गया। पप्पू यादव ने साफ कहा कि यह क्षेत्र केवल बाढ़ की त्रासदी झेलने के लिए नहीं है, बल्कि यहां के युवाओं के सपनों को भी उड़ान मिलनी चाहिए। भौगोलिक दृष्टिकोण से देखें तो यह इलाका बेहद संवेदनशील है क्योंकि इसकी सीमाएं सीधे नेपाल और बांग्लादेश से सटती हैं। सुरक्षा और देश की मुख्यधारा से जोड़ने के लिहाज से भी यहां केंद्रीय स्तर के बड़े संस्थानों का होना आवश्यक है।
आईआईटी और आईआईएम
शिक्षा के क्षेत्र में सीमांचल आज भी काफी पिछड़ा हुआ है। हर साल हजारों छात्र बुनियादी और उच्च शिक्षा के लिए दिल्ली, कोटा, पटना या दक्षिण भारत के राज्यों की तरफ पलायन करने को मजबूर हैं। पप्पू यादव ने मांग की कि यदि पूर्णिया में एक भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (IIT) और एक भारतीय प्रबंधन संस्थान (IIM) खुल जाता है, तो स्थानीय प्रतिभाओं को अपने ही घर में विश्वस्तरीय पढ़ाई का मौका मिलेगा। इससे न केवल स्थानीय स्तर पर रोजगार के नए अवसर पैदा होंगे बल्कि कोसी क्षेत्र में औद्योगिक निवेश का रास्ता भी साफ होगा। युवाओं को बाहर जाकर लाखों रुपये खर्च करने और भटकने की जरूरत नहीं पड़ेगी।
एम्स अस्पताल की मांग
स्वास्थ्य सुविधाओं के मामले में कोसी-सीमांचल की हालत बेहद चिंताजनक है। गंभीर बीमारियों के इलाज के लिए लोगों को सिलीगुड़ी, पटना या दिल्ली की दौड़ लगानी पड़ती है। रास्ते में ही दम तोड़ देने वाले मरीजों की संख्या यहां आम बात है। सांसद राजेश रंजन ने संसद में इसी दर्द को बयां करते हुए पूर्णिया में एक अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (AIIMS) खोलने की वकालत की। उन्होंने स्पष्ट किया कि इस क्षेत्र की आबादी और गरीबी को देखते हुए यहां एक बड़े अस्पताल और मेडिकल कॉलेज की सख्त जरूरत है, जो नेपाल के सीमावर्ती जिलों और पूरे उत्तर-पूर्वी बिहार के मरीजों को सस्ता और आधुनिक इलाज दे सके।
हाई कोर्ट बेंच
न्याय की गुहार लगाने के लिए सीमांचल के लोगों को लगभग 300 किलोमीटर दूर पटना जाना पड़ता है। एक गरीब किसान या मजदूर के लिए पटना जाकर वकील खड़ा करना और तारीखों पर जाना आर्थिक रूप से कमर तोड़ने वाला काम है। पप्पू यादव ने इसी समस्या को रेखांकित करते हुए पूर्णिया में पटना हाई कोर्ट की एक स्थायी खंडपीठ (बेंच) बनाने की मांग की। उनका कहना है कि अगर पूर्णिया में बेंच खुलती है, तो सीमांचल और कोसी प्रमंडल के लाखों लोगों को कम खर्चे में और जल्दी न्याय मिल सकेगा। कोर्ट की दूरी कम होने से मुकदमों का निपटारा भी तेजी से होगा।
मुख्य मांगों का लेखा-जोखा
संसद में सांसद पप्पू यादव द्वारा उठाई गई प्रमुख मांगों और उनके संभावित सामाजिक-आर्थिक प्रभावों को इस तालिका के जरिए समझा जा सकता है:
| प्रस्तावित संस्थान/मांग | लक्षित क्षेत्र | मुख्य लाभ और प्रभाव |
|---|---|---|
| आईआईटी (IIT) | उच्च तकनीकी शिक्षा | स्थानीय युवाओं का पलायन रुकेगा, तकनीकी विकास होगा। |
| आईआईएम (IIM) | प्रबंधन शिक्षा | औद्योगिक निवेश और स्टार्टअप संस्कृति को बढ़ावा मिलेगा। |
| एम्स (AIIMS) | विश्वस्तरीय चिकित्सा | गरीब मरीजों को गंभीर बीमारियों का मुफ्त/सस्ता इलाज मिलेगा। |
| पटना हाई कोर्ट बेंच | सुलभ न्याय प्रणाली | पटना की दूरी और खर्च बचेगा, त्वरित न्याय संभव होगा। |
जमीनी स्तर की चुनौतियां
पप्पू यादव के इस कदम की स्थानीय लोगों और सामाजिक कार्यकर्ताओं ने खुले दिल से सराहना की है। सीमांचल का इलाका हर साल कोसी और महानंदा जैसी नदियों की बाढ़ से तबाह होता है। कृषि पर निर्भर इस क्षेत्र में कोई बड़ा उद्योग नहीं है। ऐसे में केवल सरकारी और शैक्षणिक संस्थान ही इस इलाके की अर्थव्यवस्था को जीवित रख सकते हैं। ग्राउंड जीरो पर काम करने वाले एक्सपर्ट्स का भी मानना है कि यदि सरकार इन मांगों पर गंभीरता से विचार करती है, तो यह इलाका शिक्षा और स्वास्थ्य के क्षेत्र में आत्मनिर्भर बन सकता है। अब देखना यह है कि केंद्र सरकार इस उपेक्षित सीमांचल की आवाज पर क्या रुख अपनाती है।








