रांची,अंग भारत। झारखंड विधानसभा के बजट सत्र के 13वें दिन शुक्रवार को सदन में जमीन म्यूटेशन, भू-राजस्व प्रणाली और सरकारी अस्पतालों की दयनीय स्थिति पर तीखी बहस हुई। खिजरिया के विधायक राजेश कच्छप ने सदन में वह मुद्दा उठाया जो राज्य के हजारों आम नागरिकों की नींद उड़ाए हुए है। उन्होंने सवाल किया कि दिसंबर 2000 से पहले जमीन खरीदने वाले लोग आज भी अपने म्यूटेशन (दाखिल-खारिज) के लिए क्यों दर-दर भटक रहे हैं? सरकार के पास ऐसे लंबित मामलों के समाधान के लिए आखिर क्या ठोस कार्ययोजना है?
म्यूटेशन की जटिल प्रक्रिया
राजस्व एवं भूमि सुधार मंत्री दीपक बिरुआ ने इस पर अपना पक्ष रखते हुए कहा कि अब सिस्टम बदल चुका है। उन्होंने स्पष्ट किया कि वर्तमान में रजिस्ट्री के बाद जमीन का ब्योरा ऑटो-जेनरेटेड प्रक्रिया से सीधे रजिस्ट्री ऑफिस से अंचल कार्यालय (CO ऑफिस) पहुंच जाता है। यदि फिर भी किसी का म्यूटेशन नहीं हो पाया है, तो उन लोगों को भूमि उप समाहर्ता (एलआरडीसी) के पास विधिवत आवेदन करना होगा। विभाग जांच के बाद ही आगे की कार्रवाई करेगा।
अंचल कार्यालयों की हकीकत
विधायक राजेश कच्छप ने मंत्री के इस जवाब पर गहरी नाराजगी जताई। उन्होंने दो टूक शब्दों में कहा कि जमीनी स्तर पर स्थित अंचल कार्यालयों की स्थिति भयावह है। उन्होंने आरोप लगाया कि वहां अधिकारियों द्वारा जनता की समस्याओं को अनसुना करना एक आम बात हो गई है। विधायक ने यहां तक कहा कि यदि वे खुद किसी काम के लिए अधिकारियों को फोन करते हैं, तब भी काम होने की गारंटी नहीं रहती। यह टिप्पणी स्पष्ट करती है कि प्रशासनिक जवाबदेही का स्तर कितना नीचे गिर चुका है।
भ्रष्टाचार और अवैध वसूली
नेता प्रतिपक्ष बाबूलाल मरांडी ने इस बहस में नया मोड़ लाते हुए भ्रष्टाचार का काला चेहरा उजागर किया। उन्होंने आरोप लगाया कि आम आदमी जब अपनी जमीन की रसीद कटवाने जाता है, तो उससे खुलेआम पैसे की मांग की जाती है। बाबूलाल मरांडी ने उदाहरण देते हुए बताया कि उनके क्षेत्र के एक व्यक्ति ने रांची में जमीन खरीदी थी, लेकिन म्यूटेशन के बदले उस व्यक्ति से 50 हजार रुपये की रिश्वत मांगी गई। यह घटना दिखाती है कि सरकारी कार्यालयों में सुशासन का दावा कितना खोखला है।
ऑनलाइन रिकॉर्ड का संकट
हटिया के विधायक नवीन जायसवाल ने एक व्यावहारिक सुझाव देते हुए कहा कि वर्ष 2015-16 से पहले रसीदें मैन्युअल रूप से काटी जाती थीं। उन्होंने सरकार को सलाह दी कि:
- पंचायत स्तर पर विशेष कैंप आयोजित किए जाएं।
- पुराने डेटा को डिजिटल करने के लिए मिशन मोड में अभियान चलाया जाए।
- आम नागरिकों को ऑनलाइन प्रक्रिया के लिए शिक्षित किया जाए।
दखल-दिहानी का मुद्दा
विधायक अमित यादव ने एक गंभीर मामला उठाते हुए बताया कि सोमा मुंडा के नाम से जमीन की दखल-दिहानी का आदेश 17 मार्च 2011 को ही पारित हो चुका था। लेकिन 13 साल बीत जाने के बाद भी उस पर कार्रवाई शून्य है। मंत्री दीपक बिरुआ ने आश्वासन दिया कि वे मामले को फिर से सुनेंगे, जिस पर विधायक ने कड़ी आपत्ति जताई। उनका कहना था कि जब कानूनी आदेश पहले ही पारित हो चुका है, तो फिर पुन: सुनवाई का अर्थ केवल समय की बर्बादी है।
तोरपा अस्पताल की दुर्दशा
सदन में स्वास्थ्य सेवाओं की पोल खोलते हुए विधायक सुदीप गुड़िया ने तोरपा रेफरल अस्पताल का मुद्दा उठाया। उन्होंने बताया कि अस्पताल में अल्ट्रासाउंड मशीन धूल फांक रही है और एनेस्थीसिया विशेषज्ञ नदारद हैं। इसका सबसे बड़ा खामियाजा गर्भवती महिलाओं को भुगतना पड़ रहा है, जिन्हें प्रसव के लिए मजबूरन दूसरे शहरों का रुख करना पड़ता है।
मंत्री का आश्वासन और तंज
स्वास्थ्य मंत्री इरफान अंसारी ने स्वीकार किया कि तोरपा अस्पताल से तीन डॉक्टरों को डेपुटेशन पर भेजा गया है, जिससे वहां डॉक्टरों की भारी कमी हो गई है। उन्होंने सदन में वादा किया कि एक महीने के भीतर:
- स्त्री रोग विशेषज्ञ की तैनाती सुनिश्चित की जाएगी।
- अल्ट्रासाउंड मशीन चलाने के लिए तकनीकी विशेषज्ञ रखे जाएंगे।
- गर्भवती महिलाओं को स्थानीय स्तर पर बेहतर स्वास्थ्य सुविधाएं मिलेंगी।
इस आश्वासन पर विधायक सीपी सिंह ने कटाक्ष करते हुए कहा कि मंत्री जी पहले पटना से डॉक्टर बुलाने की बात कर रहे थे, अब उसी डॉक्टर को तोरपा रेफरल अस्पताल भेजकर दिखाएं। यह पूरी चर्चा राज्य के सरकारी तंत्र में व्याप्त प्रशासनिक सुस्ती और भ्रष्टाचार को आईना दिखाती है।








