फुल्लीडुमर/बांका/अंगभारत। बांका जिले के फुल्लीडुमर प्रखंड में पथड्डा पंचायत के डिमैई गांव के पास नवनिर्मित चेक डैम का उद्घाटन जिला परिषद सदस्य विश्वजीत दीपांकर द्वारा किया गया। यह चेक डैम पंद्रहवीं वित्त आयोग की निधि से लगभग आठ लाख रुपये की लागत से तैयार हुआ है। इस परियोजना का मुख्य उद्देश्य स्थानीय किसानों के खेतों तक सिंचाई का पानी पहुँचाना और जल संरक्षण को बढ़ावा देना है, जिससे डिमैई और आसपास के क्षेत्रों के हजारों एकड़ कृषि योग्य भूमि को सीधा लाभ मिलेगा।
सिंचाई की बड़ी समस्या
फुल्लीडुमर क्षेत्र का बड़ा हिस्सा अपनी आर्थिक जरूरतों के लिए पूरी तरह से खेती पर निर्भर है। सालों से किसान सिंचाई के लिए बारिश पर आश्रित थे या फिर उन्हें नदी से पानी निकालने के लिए काफी मशक्कत करनी पड़ती थी। जलस्तर नीचे चले जाने के कारण फसलें समय पर नहीं पक पाती थीं, जिससे किसानों को आर्थिक नुकसान झेलना पड़ता था। इस चेक डैम के निर्माण ने उस पुरानी चुनौती को काफी हद तक हल कर दिया है।
चेक डैम के फायदे
- जल संचयन: नदी के बहाव को रोककर पानी को जमा किया जा सकेगा।
- भू-जल रिचार्ज: चेक डैम बनने से आसपास के कुओं और चापाकल का जलस्तर भी ऊपर आएगा।
- सुगम सिंचाई: किसान अब बिना किसी परेशानी के अपने खेतों में पानी ले जा सकेंगे।
- फसल उत्पादन: बेहतर पानी की उपलब्धता से खरीफ और रबी, दोनों फसलों की उत्पादकता में वृद्धि होगी।
स्थानीय विकास का संकल्प
उद्घाटन समारोह के दौरान जिला परिषद अध्यक्ष विश्वजीत दीपांकर ने कहा कि यह परियोजना लंबे समय से लंबित मांग थी। उन्होंने जोर देकर कहा कि ग्रामीण इलाकों का विकास तभी संभव है जब आधारभूत कृषि संरचना मजबूत हो। उन्होंने स्पष्ट किया कि केवल चेक डैम बनाना ही अंतिम लक्ष्य नहीं है, बल्कि भविष्य में सिंचाई की बेहतर तकनीकों को गांव-गांव तक ले जाना उनकी प्राथमिकता बनी रहेगी।
किसानों की नई उम्मीद
चेक डैम के उद्घाटन से इलाके के किसान काफी उत्साहित हैं। स्थानीय ग्रामीणों का कहना है कि अब उन्हें पानी के लिए दूसरों पर निर्भर नहीं रहना पड़ेगा। डिमैई गांव के बहियार में अब रबी फसल की खेती के लिए जल की कमी नहीं होगी। उद्घाटन के दौरान त्रिवेणी झा, प्रकाश झा, मिहिर झा, वरुण कुमार, छोटू झा और रविकांत झा जैसे स्थानीय निवासियों ने भी इस विकास कार्य को कृषि के लिए ‘जीवन रेखा’ बताया।
आर्थिक बदलाव की दिशा
जब सिंचाई की सुविधा सुनिश्चित हो जाती है, तो किसान नई और नकदी फसलों की ओर रुख करते हैं। अब तक जो किसान केवल धान या गेहूं की पारंपरिक खेती करते थे, वे अब कम पानी वाली सब्जियों या अन्य व्यावसायिक फसलों की ओर भी सोच सकते हैं। सरकार की पंद्रहवीं वित्त आयोग की इस छोटी सी पहल ने पूरे इलाके की कृषि अर्थव्यवस्था की तस्वीर बदलने की राह खोल दी है।
आगे का रास्ता
इस चेक डैम की सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि ग्रामीण इसका रखरखाव कैसे करते हैं। सामुदायिक भागीदारी ही ऐसी परियोजनाओं को लंबे समय तक टिकाऊ बनाती है। सिंचाई विभाग और स्थानीय प्रशासन को मिलकर यह सुनिश्चित करना होगा कि आने वाले मानसून के समय इसमें गाद कम जमा हो, ताकि इसकी क्षमता बनी रहे। कृषि आधारित अर्थव्यवस्था वाले क्षेत्रों के लिए ऐसी छोटी-छोटी बुनियादी संरचनाएं ही दीर्घकालिक विकास का आधार बनती हैं।








