मुजफ्फरपुर,अंग भारत। बिहार के मुजफ्फरपुर जिले के गायघाट थाना अंतर्गत चोरनी गांव में हुई हिंसक झड़प और मौत के मामले में पुलिस प्रशासन ने बेहद सख्त रुख अख्तियार किया है। इस गंभीर कांड में निष्पक्ष जांच का भरोसा देते हुए मुजफ्फरपुर के एसएसपी कांतेश कुमार मिश्रा ने बड़ी कार्रवाई की है। उन्होंने छापेमारी दल में शामिल रहे गायघाट थानाध्यक्ष राजा सिंह समेत कुल आठ पुलिसकर्मियों को तुरंत प्रभाव से लाइन हाजिर कर दिया है। इसके साथ ही आरोपी थानाध्यक्ष और अन्य पुलिसकर्मियों के खिलाफ सीधे हत्या का मुकदमा दर्ज किया गया है, जिसने इस पूरे मामले को बेहद संवेदनशील बना दिया है। दूसरी तरफ, पुलिस पर हमला करने के आरोप में गांव के दो नामजद और 15 अज्ञात लोगों पर भी केस दर्ज हुआ है। इस दोतरफा कानूनी कार्रवाई ने पूरे इलाके में हड़कंप मचा दिया है और अब जांच की कमान सीआईडी और मजिस्ट्रेट के हाथों में सौंपने की तैयारी है।
कैसे शुरू हुआ विवाद?
यह पूरी घटना उस वक्त शुरू हुई जब पुलिस की एक टीम रात के वक्त चोरनी गांव में छापेमारी करने पहुंची थी। ग्रामीण इलाकों में अक्सर रात के समय पुलिस की धमक से लोग सहम जाते हैं। इस मामले में भी ऐसा ही हुआ। छापेमारी के दौरान पुलिस और ग्रामीणों के बीच बहस शुरू हुई, जो देखते ही देखते हिंसक झड़प में बदल गई। इस हंगामे के बीच एक व्यक्ति की मौत हो गई, जिसके बाद ग्रामीणों का गुस्सा भड़क उठा। स्थानीय लोगों का आरोप है कि पुलिस की बर्बरता के कारण ही जान गई। वहीं पुलिस का कहना है कि उन पर जानलेवा हमला किया गया और सरकारी काम में रोड़ा अटकाया गया। इस हिंसक मोड़ ने पुलिस की कार्यप्रणाली को कटघरे में खड़ा कर दिया है।
पुलिस पर हत्या का केस
बिहार पुलिस के इतिहास में ऐसे मामले कम ही आते हैं जहां ड्यूटी पर तैनात पुलिसकर्मियों के खिलाफ सीधे हत्या का मुकदमा दर्ज हो। एसएसपी कांतेश कुमार मिश्रा ने साफ कर दिया है कि वर्दी की आड़ में किसी भी तरह की मनमानी बर्दाश्त नहीं होगी। थानाध्यक्ष राजा सिंह और उनके साथ गए सात पुलिसकर्मियों पर हत्या का मामला दर्ज होना यह दिखाता है कि प्रशासन पर जनता का दबाव कितना भारी था। लेकिन कहानी का दूसरा पहलू भी है। ग्रामीणों के खिलाफ भी जवाबी कार्रवाई हुई है। पुलिस टीम पर पथराव और सरकारी काम में बाधा डालने के आरोप में दो नामजद और कई अज्ञात ग्रामीणों पर प्राथमिकी दर्ज की गई है। गांव में तनाव को देखते हुए अतिरिक्त पुलिस बल तैनात किया गया है।
जांच में सीआईडी की एंट्री
इस संवेदनशील मामले की तह तक जाने के लिए सिर्फ स्थानीय पुलिस की जांच पर भरोसा नहीं किया जा रहा है। मामले की गंभीरता को देखते हुए अब इसमें सीआईडी की एंट्री हो चुकी है। मुजफ्फरपुर पुलिस ने तकनीकी साक्ष्यों, कॉल डिटेल्स और घटनास्थल के फॉरेंसिक विश्लेषण के लिए सीआईडी से विशेष मंतव्य मांगा है। इसके अलावा, जांच को पूरी तरह पारदर्शी रखने के लिए निम्नलिखित कदम उठाए जा रहे हैं:
- सीआईडी की मदद: पुलिस ने तकनीकी और फॉरेंसिक पहलुओं पर सीआईडी से राय मांगी है ताकि वैज्ञानिक साक्ष्य जुटाए जा सकें।
- मजिस्ट्रेटी जांच: निष्पक्षता के लिए जिलाधिकारी से मजिस्ट्रेट की निगरानी में जांच कराने का लिखित अनुरोध किया गया है।
- एसपी की रिपोर्ट: ग्रामीण पुलिस अधीक्षक राजेश सिंह प्रभाकर की जांच रिपोर्ट के आधार पर ही दोषी पुलिसकर्मियों की अंतिम जवाबदेही तय होगी।
अफवाहों पर कड़ा पहरा
आज के डिजिटल दौर में किसी भी हिंसक घटना के बाद सबसे बड़ा खतरा सोशल मीडिया पर फैलने वाली अफवाहों से होता है। चोरनी गांव की घटना के बाद भी इंटरनेट पर कई तरह के भ्रामक वीडियो और झूठी खबरें फैलाई जाने लगीं। पुलिस ने इस पर तुरंत एक्शन लिया है। एसएसपी कांतेश कुमार मिश्रा के निर्देश पर लगभग आधा दर्जन से अधिक सोशल मीडिया अकाउंट्स और हैंडलर्स के खिलाफ केस दर्ज किया गया है। ये लोग माहौल बिगाड़ने की कोशिश कर रहे थे। पुलिस की आईटी सेल लगातार इन हैंडल्स पर नजर रख रही है। एसएसपी ने जिले के लोगों से अपील की है कि वे किसी भी असत्यापित खबर को शेयर न करें, क्योंकि एक छोटी सी अफवाह बड़े विवाद का रूप ले सकती है।
कानून सबके लिए बराबर
पुलिस और जनता के बीच का भरोसा ही किसी भी समाज में कानून व्यवस्था की बुनियाद होता है। जब कानून के रखवाले ही आरोपों के घेरे में आ जाएं, तो यह भरोसा दरकने लगता है। एसएसपी कांतेश कुमार मिश्रा का यह बयान बहुत मायने रखता है कि चाहे वह पुलिस पदाधिकारी हो या कोई आम नागरिक, कानून को हाथ में लेने का अधिकार किसी को नहीं है। इस कार्रवाई से यह संदेश देने की कोशिश की गई है कि वर्दी पहनने से किसी को कानून से ऊपर होने का अधिकार नहीं मिल जाता। अब सबकी निगाहें मजिस्ट्रेट जांच और सीआईडी की रिपोर्ट पर टिकी हैं। चोरनी गांव में फिलहाल शांति है, लेकिन यह शांति न्याय की उम्मीद पर टिकी है।








