नई दिल्ली,अंग भारत। उच्चतम न्यायालय के चीफ जस्टिस सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ ने राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान और प्रशिक्षण परिषद (एनसीईआरटी) की कक्षा 8 की पाठ्यपुस्तक में न्यायपालिका को लेकर प्रकाशित विवादित सामग्री के मामले में कड़ा रुख अपनाया है। कोर्ट ने स्पष्ट रूप से कहा है कि पाठ्यक्रम में न्यायपालिका के विरुद्ध भ्रष्टाचार जैसे शब्दों का प्रयोग सोची-समझी साजिश का हिस्सा था, जो छात्रों के मन में संस्था के प्रति नकारात्मक छवि बनाता है। इस गंभीर चूक के लिए जिम्मेदार तीन व्यक्तियों, प्रोफेसर मिशेल डैनिनो, दिवाकर और आलोक प्रसन्ना कुमार को उनके सरकारी पदों या जिम्मेदारियों से तत्काल प्रभाव से हटाने का निर्देश दिया गया है।
न्यायालय का कड़ा रुख
न्यायमूर्ति सूर्यकांत की पीठ ने इन लोगों की भूमिका पर सवाल उठाते हुए कहा कि या तो इन्हें देश की न्यायपालिका की कार्यप्रणाली का बुनियादी ज्ञान नहीं है, या फिर इन्होंने जानबूझकर गलत तथ्यों को परोसा है। आठवीं कक्षा के बच्चे अभी सीखने की शुरुआती अवस्था में होते हैं और ऐसी भ्रामक जानकारी उनके मानसिक विकास पर बुरा असर डाल सकती है। कोर्ट ने यह भी माना कि यह सामग्री किसी भूलवश नहीं, बल्कि एक व्यवस्थित योजना के तहत तैयार की गई थी ताकि न्यायिक संस्थाओं की विश्वसनीयता कम की जा सके। वरिष्ठ वकील कपिल सिब्बल और अभिषेक मनु सिघवी ने इस मामले की गंभीरता को देखते हुए न्यायालय के समक्ष 25 फरवरी को इसे विशेष रूप से उल्लेखित किया था।
सख्ती और दिशा-निर्देश
न्यायालय ने इस मामले में कड़ी कानूनी कार्रवाई के संकेत दिए हैं। इससे पहले 26 फरवरी को ही न्यायालय ने इस किताब के वितरण पर पूरी तरह से रोक लगाने का आदेश दे दिया था। कोर्ट के सख्त आदेशों के प्रमुख बिंदु निम्नलिखित हैं:
- पुस्तक वापसी: एनसीईआरटी और केंद्र सरकार को निर्देश दिया गया कि वे बाजार और स्कूलों से पुस्तक की सभी प्रतियां तुरंत वापस लें।
- वितरण पर रोक: ऑनलाइन प्लेटफॉर्म या फिजिकल रूप में इस सामग्री को साझा करने पर पूरी तरह से पाबंदी लगा दी गई है।
- अवमानना कार्रवाई: किसी भी स्तर पर इन आदेशों का उल्लंघन होने पर इसे सीधे तौर पर अदालत की अवमानना माना जाएगा।
- अनुपालन रिपोर्ट: सरकार और परिषद को यह साबित करने के लिए एक विस्तृत रिपोर्ट देनी होगी कि आदेश का अक्षरशः पालन हुआ है।
न्यायालय ने स्पष्ट किया है कि किसी भी व्यक्ति या संस्था को न्यायपालिका की छवि खराब करने की छूट नहीं दी जा सकती। संवैधानिक संस्थाओं की गरिमा बनाए रखना हम सभी की सामूहिक जिम्मेदारी है।
बदनामी के पीछे साजिश
कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि स्कूली पाठ्यक्रम में इस प्रकार की नकारात्मक बातों का समावेश करना एक गंभीर वैचारिक हेरफेर है। अदालत ने माना कि यह महज एक शैक्षिक सामग्री नहीं थी, बल्कि इसमें छिपी हुई मंशा संस्था को बदनाम करने की थी। अब केंद्र सरकार और एनसीईआरटी को यह सुनिश्चित करना होगा कि भविष्य में किसी भी पाठ्यपुस्तक को तैयार करते समय तथ्यों की बारीकी से जांच हो। जब तक किताब की सभी प्रतियां पूरी तरह से बाजार और शिक्षण संस्थानों से हटा नहीं ली जातीं, तब तक न्यायालय की निगरानी बनी रहेगी।
| संबंधित पक्ष | न्यायालय का निर्देश |
|---|---|
| एनसीईआरटी | सभी प्रतियों को वापस लेकर रिपोर्ट सौंपना |
| केंद्र सरकार | अनुपालन सुनिश्चित करना और निगरानी रखना |
| प्रोफेसर मिशेल डैनिनो, दिवाकर, आलोक प्रसन्ना कुमार | जिम्मेदार पदों से हटाना |
इस पूरी कार्यवाही ने एक नजीर पेश की है कि देश की महत्वपूर्ण शैक्षणिक संस्थाओं को भी संविधान के प्रति जवाबदेह होना होगा। शिक्षा के माध्यम से बच्चों को सही जानकारी देना अनिवार्य है, न कि उन्हें किसी एजेंडे का हिस्सा बनाना। चीफ जस्टिस की अध्यक्षता वाली पीठ ने यह भी स्पष्ट किया है कि कानून अपना काम करेगा और इस साजिश में शामिल अन्य लोगों की पहचान कर उन पर भी उचित कानूनी प्रक्रिया अपनाई जाएगी।








