सहरसा,अंग भारत। बिहार सरकार के समाज कल्याण विभाग द्वारा सहरसा के स्थानीय प्रेक्षा गृह में आयोजित प्रमंडल स्तरीय विचार गोष्ठी में बच्चों के अधिकारों की रक्षा और उनके पुनर्वास को लेकर एक बड़ा प्रशासनिक संदेश दिया गया है। कोशी प्रमंडल के आयुक्त राजेश कुमार की अध्यक्षता में आयोजित इस विशेष संवेदीकरण कार्यक्रम का मुख्य उद्देश्य बाल संरक्षण कानूनों, जैसे किशोर न्याय अधिनियम और विभिन्न सरकारी योजनाओं की जानकारी को जमीनी स्तर पर काम करने वाले हर हितधारक तक पहुंचाना है ताकि संकटग्रस्त बच्चों को तुरंत मदद मिल सके। इस कार्यक्रम में कोशी प्रमंडल के तीनों जिलों—सहरसा, मधेपुरा और सुपौल—के शीर्ष प्रशासनिक, पुलिस और न्यायिक अधिकारियों ने मिलकर बच्चों के सुरक्षित भविष्य के लिए एक ठोस रोडमैप तैयार करने पर चर्चा की।
अधिकारियों की महाबैठक
इस प्रमंडल स्तरीय बैठक में कोशी प्रमंडल के प्रमुख नीति-निर्माताओं और कानून लागू करने वाले अधिकारियों ने हिस्सा लिया। कार्यक्रम की शुरुआत प्रमंडलीय आयुक्त राजेश कुमार, जिलाधिकारी सहरसा दीपेश कुमार, जिलाधिकारी सुपौल सावन कुमार, जिलाधिकारी मधेपुरा अभिषेक रंजन, पुलिस अधीक्षक सहरसा हिमांशु, पुलिस अधीक्षक सुपौल शरथ आर. एस., पुलिस अधीक्षक मधेपुरा डॉ. संदीप सिंह, उप विकास आयुक्त सहरसा गौरव कुमार, अपर समाहर्ता निशांत और किशोर न्याय परिषद के माननीय न्यायाधीश ने संयुक्त रूप से दीप जलाकर की।
सभागार में मौजूद अधिकारियों की यह बड़ी उपस्थिति यह साफ दर्शाती है कि शासन स्तर पर बच्चों की सुरक्षा और उनके अधिकारों को कितनी प्राथमिकता दी जा रही है। बाल संरक्षण कोई ऐसा काम नहीं है जिसे कोई एक विभाग अकेले संभाल सके। इसके लिए पुलिस, प्रशासन और न्यायपालिका को एक ही पटरी पर आकर काम करना होगा, और यही इस बैठक का मुख्य आधार था।
आयुक्त राजेश कुमार का निर्देश
कार्यक्रम की अध्यक्षता कर रहे कोशी प्रमंडल के प्रमंडलीय आयुक्त राजेश कुमार ने अधिकारियों और मैदानी कार्यकर्ताओं को सीधे तौर पर सचेत किया। उन्होंने कहा कि बाल संरक्षण से जुड़े जितने भी कानूनी प्रावधान हैं, उनकी जानकारी सिर्फ कागजों तक सीमित नहीं रहनी चाहिए। यह जानकारी समाज के हर उस व्यक्ति तक पहुंचनी चाहिए जो बच्चों के कल्याण से सीधे जुड़ा हुआ है।
आयुक्त ने इस बात पर जोर दिया कि इस संवेदीकरण कार्यक्रम में जो भी तकनीकी और कानूनी जानकारियां दी जा रही हैं, उसे सभी अधिकारी केवल एक औपचारिक प्रशिक्षण न समझें। उन्होंने निर्देश दिया कि सभी अधिकारी समय-समय पर इन नियमों और प्रावधानों का खुद अध्ययन करें और अपने-अपने क्षेत्रों में इनका कड़ाई से पालन करवाएं। उनके अनुसार, समाज कल्याण विभाग का यह प्रयास तभी सफल होगा जब जमीन पर बदलाव दिखेगा।
जिलाधिकारी सहरसा का विजन
सहरसा के जिलाधिकारी दीपेश कुमार ने बच्चों के प्रति संवेदनशील रवैया अपनाने की बात कही। उन्होंने साफ तौर पर कहा कि जो बच्चे बेसहारा, अनाथ या संकट में हैं, उन्हें सिर्फ सहानुभूति की नहीं बल्कि ठोस सहारे की जरूरत है। ऐसे बच्चों की उचित देखरेख करना और उन्हें मुख्यधारा में लाकर एक बेहतर भविष्य के लिए प्रेरित करना हम सभी का सामूहिक दायित्व है।
जिलाधिकारी ने आगे कहा कि जब तक हम अपने बच्चों को सुरक्षित और स्वस्थ माहौल नहीं देंगे, तब तक एक विकसित राष्ट्र की कल्पना करना बेमानी है। बाल संरक्षण कानून जटिल होते हैं, इसलिए इस तरह के आयोजनों के जरिए जब अधिकारियों को कानूनों की सीधी जानकारी मिलती है, तो वे बच्चों से जुड़े मामलों को संवेदनशीलता और तेजी से निपटाने में सक्षम बनते हैं।
आपसी तालमेल की जरूरत
इस सेमिनार में सबसे ज्यादा चर्चा विभागों के बीच आपसी तालमेल पर हुई। अक्सर देखा जाता है कि पुलिस विभाग, अनुमंडल प्रशासन और बाल संरक्षण इकाइयों के बीच समन्वय की कमी के कारण पीड़ित बच्चों को समय पर मदद नहीं मिल पाती। इस गोष्ठी में इस खाई को पाटने की कोशिश की गई।
- पुलिस की भूमिका: थानों में तैनात बाल कल्याण पुलिस अधिकारी (CWPO) को कानूनन बच्चों के मामलों में बेहद संवेदनशील होना पड़ता है। पुलिस अधीक्षक सहरसा हिमांशु, पुलिस अधीक्षक सुपौल शरथ आर. एस. और पुलिस अधीक्षक मधेपुरा डॉ. संदीप सिंह की मौजूदगी में इस बात पर चर्चा हुई कि जब भी किसी बच्चे को रेस्क्यू किया जाए, तो पुलिस तुरंत बाल कल्याण समिति (CWC) के साथ मिलकर काम करे।
- न्यायिक सक्रियता: किशोर न्याय परिषद के न्यायाधीशों की उपस्थिति ने इस बात को बल दिया कि कानूनी प्रक्रिया में बच्चों के अधिकारों का हनन न हो। किशोर न्याय अधिनियम के तहत बच्चों के मामलों की सुनवाई बिना किसी डर के माहौल में होनी चाहिए।
- प्रशासनिक मुस्तैदी: सहरसा, सुपौल और मधेपुरा के जिलाधिकारियों ने अपने-अपने जिलों में बाल संरक्षण इकाइयों को और अधिक सक्रिय करने की प्रतिबद्धता जताई।
समेकित बाल संरक्षण योजना
बिहार सरकार के समाज कल्याण विभाग द्वारा चलाई जा रही विभिन्न योजनाओं की जानकारी भी इस सत्र में विस्तार से दी गई। गोष्ठी में बताया गया कि संकटग्रस्त बच्चों के लिए स्पॉन्सरशिप योजना और फोस्टर केयर जैसे विकल्प मौजूद हैं। जो बच्चे अनाथ हैं या जिनके माता-पिता उनकी परवरिश करने में असमर्थ हैं, उन्हें वित्तीय मदद दी जाती है ताकि वे अपनी पढ़ाई और जीवनयापन जारी रख सकें।
अधिकारियों को बताया गया कि वे अपने स्तर पर इन योजनाओं का व्यापक प्रचार-प्रसार करें। कई बार जानकारी के अभाव में जरूरतमंद बच्चे इन सरकारी योजनाओं का लाभ नहीं उठा पाते। ऐसे में यह स्थानीय प्रशासन की जिम्मेदारी बनती है कि वे अंतिम पायदान पर खड़े बच्चे तक इन योजनाओं को पहुंचाएं।
सुरक्षित बचपन का संकल्प
इस पूरे आयोजन का निचोड़ यह रहा कि बाल अधिकार केवल कानून की किताबों का हिस्सा नहीं हैं, बल्कि यह समाज के जीवित मूल्य होने चाहिए। कोशी प्रमंडल के तीनों जिलों के शीर्ष प्रशासनिक और पुलिस अधिकारियों का एक मंच पर आना यह उम्मीद जगाता है कि आने वाले दिनों में सहरसा, सुपौल और मधेपुरा में बच्चों से जुड़े अपराधों और उनकी समस्याओं पर प्रशासन अधिक संवेदनशीलता से कार्रवाई करेगा।
इस संवेदीकरण कार्यक्रम ने यह साफ कर दिया कि कोशी प्रमंडल में बाल संरक्षण को लेकर एक नई कार्य संस्कृति की शुरुआत हो रही है, जहां बच्चों के अधिकारों की रक्षा को सबसे ऊपर रखा जाएगा।








