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सुपौल सदर अस्पताल में हंगामा: मरीज को मृत घोषित करने पर परिजनों का आरोप,जांच शुरू

सुपौल,अंग भारत। सुपौल सदर अस्पताल के इमरजेंसी वार्ड में बुधवार की रात एक मरीज को मृत घोषित किए जाने के बाद मचे हंगामे ने चिकित्सा व्यवस्था और सुरक्षा के दावों पर कई गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। कणपुर निवासी बम-बम पासवान (पिता– जगदीश पासवान) अपने एक गंभीर रूप से बीमार परिजन को इलाज के लिए इमरजेंसी वार्ड लेकर पहुंचे थे, लेकिन वहां ड्यूटी पर तैनात डॉक्टर रणधीर कुमार (पिता– हरि बल्लभ प्रसाद) ने मरीज की स्थिति की जांच करने के बाद उसे मृत घोषित कर दिया। मौत की खबर सुनते ही परिजन आपा खो बैठे और अस्पताल परिसर में भारी हंगामा शुरू हो गया। अस्पताल के इमरजेंसी वार्ड में अचानक मची इस अफरातफरी के कारण वहां मौजूद अन्य मरीजों और ड्यूटी पर तैनात स्टाफ के बीच दहशत का माहौल बन गया।

अस्पताल में हुआ विवाद

परिजन द्वारा की गई नाराजगी और हंगामे का मुख्य कारण इलाज में बरती गई कथित लापरवाही का आरोप था। बम-बम पासवान और उनके साथ आए अन्य लोगों ने आरोप लगाया कि समय रहते सही इलाज नहीं मिलने के कारण मरीज की जान गई। जैसे ही स्थिति अनियंत्रित होने लगी, अस्पताल प्रशासन ने सुरक्षा प्रोटोकॉल का पालन करते हुए तत्काल सदर थाना को घटना की सूचना दी। साथ ही, आरक्षी अधीक्षक और जिला पदाधिकारी को भी पूरे घटनाक्रम से दूरभाष पर अवगत कराया गया ताकि कानून-व्यवस्था बिगड़ने से पहले उसे संभाला जा सके।

पुलिस की त्वरित कार्रवाई

सूचना मिलते ही सदर थाना अध्यक्ष दलबल के साथ मौके पर पहुंचे। उन्होंने वहां मौजूद परिजनों को शांत कराया और मामले की निष्पक्ष जांच का आश्वासन दिया। थाना अध्यक्ष ने बताया कि मृतक के परिजनों की ओर से एक औपचारिक आवेदन प्राप्त हुआ है, जिसके आधार पर मामले की गहनता से जांच शुरू कर दी गई है। फिलहाल पुलिस टीम यह पता लगाने की कोशिश कर रही है कि क्या वास्तव में अस्पताल की तरफ से कोई चूक हुई थी या घटना के पीछे अन्य कारण जिम्मेदार थे। जांच की प्रक्रिया पूरी होने के बाद ही दोषियों पर कानूनी कार्रवाई तय की जाएगी।

डॉक्टर का पक्ष

दूसरी ओर, ड्यूटी पर तैनात डॉक्टर रणधीर कुमार (पिता– हरि बोल प्रसाद) ने अपने ऊपर लगे लापरवाही के आरोपों को सिरे से खारिज किया है। उन्होंने सदर थाना प्रभारी को लिखित आवेदन देकर इस पूरे मामले की निष्पक्ष जांच की मांग की है। डॉक्टर ने स्पष्ट किया है कि अस्पताल पहुंचने पर मरीज की जो स्थिति थी, उसके अनुसार जीवन रक्षक प्रयास किए गए लेकिन चिकित्सकीय दृष्टि से मरीज को बचाया नहीं जा सका। यह पहला मौका नहीं है जब डॉक्टरों की कार्यप्रणाली पर सवाल उठे हैं, लेकिन इस बार मामला स्वास्थ्य विभाग की उच्च स्तरीय जांच तक पहुंच गया है।

डॉक्टरों में भारी आक्रोश

इस घटना के बाद सदर अस्पताल के डॉक्टरों और स्वास्थ्य कर्मियों के बीच भारी रोष व्याप्त है। अस्पताल के अन्य स्वास्थ्य कर्मियों का तर्क है कि बिना किसी जांच के डॉक्टरों पर शारीरिक या मौखिक हमला करना स्वीकार्य नहीं है। डॉक्टरों के एक समूह ने चेतावनी दी है कि यदि सुरक्षा व्यवस्था पुख्ता नहीं की गई और ऐसी घटनाओं के खिलाफ त्वरित कार्रवाई नहीं हुई, तो वे सामूहिक कार्य बहिष्कार पर जा सकते हैं। इस संभावित हड़ताल से सामान्य स्वास्थ्य सेवाओं पर बड़ा असर पड़ सकता है, जिससे आम मरीजों की मुश्किलें बढ़ सकती हैं।

जांच के प्रमुख बिंदु

  • समय का रिकॉर्ड: मरीज के अस्पताल पहुंचने और डॉक्टर द्वारा जांच करने के सटीक समय का मिलान किया जा रहा है।
  • उपलब्ध सुविधाएं: क्या उस समय इमरजेंसी वार्ड में आवश्यक जीवन रक्षक दवाएं और उपकरण मौजूद थे?
  • सीसीटीवी फुटेज: अस्पताल के इमरजेंसी वार्ड में लगे सीसीटीवी कैमरों की रिकॉर्डिंग को जांच के लिए सुरक्षित रखा गया है।
  • परिजन का बयान: अस्पताल के गेट से वार्ड तक पहुंचने के दौरान मरीज की स्थिति कैसी थी, इसे लेकर गवाहों से पूछताछ की जा रही है।

प्रशासन की भूमिका

मामले की गंभीरता को देखते हुए सिविल सर्जन को भी घटना की पूरी जानकारी दे दी गई है। स्वास्थ्य विभाग के वरिष्ठ अधिकारी अब यह देख रहे हैं कि क्या ड्यूटी के दौरान डॉक्टर ने मानक संचालन प्रक्रिया (SOP) का पालन किया था या नहीं। सुपौल जिला प्रशासन का कहना है कि वे इस मामले को लेकर काफी गंभीर हैं। पुलिस और स्वास्थ्य विभाग की एक संयुक्त टीम इस पूरे प्रकरण का तकनीकी और चिकित्सीय विश्लेषण कर रही है ताकि दूध का दूध और पानी का पानी हो सके। अस्पताल प्रशासन ने यह भी स्पष्ट किया है कि किसी भी प्रकार की हिंसा बर्दाश्त नहीं की जाएगी, लेकिन साथ ही वे जनता के प्रति अपनी जवाबदेही को भी स्वीकार कर रहे हैं।

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अंग भारत • रिपोर्टर

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