गुवाहाटी,अंग भारत। असम में इस समय रंगाली बिहू का पर्व पूरे उल्लास के साथ मनाया जा रहा है। इसका पहला दिन ‘गोरू बिहू’ के रूप में समर्पित है, जिसमें असमिया समुदाय अपने पशुधन यानी गोधन की विशेष पूजा-अर्चना करता है। कृषि प्रधान राज्य असम के लिए यह केवल एक त्योहार नहीं, बल्कि प्रकृति, पशुओं और धरती के प्रति आभार व्यक्त करने का एक पवित्र माध्यम है। आज के दिन राज्य भर के किसान अपने मवेशियों को नजदीकी नदियों और जलाशयों में ले जाकर स्नान कराते हैं, ताकि आने वाले कृषि सत्र के लिए वे स्वस्थ और समृद्ध रहें।
गोरू बिहू का महत्व
असमिया संस्कृति में कृषि और पशुपालन एक-दूसरे के पूरक हैं। रंगाली बिहू की शुरुआत ही इस विश्वास के साथ होती है कि यदि पशु स्वस्थ रहेंगे, तो खेती बेहतर होगी। गोरू बिहू के दिन कुछ विशेष परंपराएं निभाई जाती हैं:
- मवेशियों को नदी या तालाब में ले जाकर हल्दी और बेसन के लेप से नहलाया जाता है।
- पशुओं को नई रस्सी (पगा) पहनाई जाती है।
- उन्हें लौकी, बैंगन और अन्य मौसमी सब्जियों का विशेष भोजन कराया जाता है।
- पशुओं के स्वास्थ्य के लिए नीम और हल्दी जैसी औषधीय जड़ी-बूटियों का प्रयोग किया जाता है।
कृषि और संस्कृति का मिलन
यह त्योहार चैत संक्रांति से जुड़ता है, जो असमिया नववर्ष की शुरुआत का प्रतीक है। रंगाली बिहू जिसे ‘बहाग बिहू’ भी कहा जाता है, वसंत ऋतु के आगमन और बुवाई के मौसम की खुशी मनाता है। ढोल, पेपा और गगना की थाप पर पूरी घाटी झूम उठती है। यह समय है जब प्रकृति अपना रूप बदलती है और किसान आने वाली अच्छी फसल की उम्मीद में अपने खेतों को तैयार करते हैं।
बिहुवान का अनूठा महत्व
बिहू के दौरान ‘बिहुवान’ यानी पारंपरिक गमछा भेंट करना आपसी प्रेम और सम्मान की एक सुंदर परंपरा है। यह सिर्फ एक कपड़ा नहीं है, बल्कि यह असमिया पहचान का प्रतीक है। लोग एक-दूसरे को बिहुवान देकर नए साल की शुभकामनाएं देते हैं। यह छोटी सी भेंट सामाजिक रिश्तों को और गहरा बनाती है।
क्रमवार बिहू उत्सव
रंगाली बिहू का उत्सव कई दिनों तक चलता है, जिसमें हर दिन का अपना एक विशेष अर्थ होता है:
| दिन | नाम | मुख्य परंपरा |
|---|---|---|
| पहला दिन | गोरू बिहू | पशुधन की पूजा और स्नान |
| दूसरा दिन | मानुह बिहू | बड़ों का आशीर्वाद और सामाजिक मिलन |
| अगले दिन | विभिन्न आयोजन | सांस्कृतिक कार्यक्रम और बिहू नृत्य |
मानुह बिहू की तैयारी
गोरू बिहू के अगले दिन ‘मानुह बिहू’ मनाया जाता है। इस दिन लोग नहा-धोकर नए कपड़े पहनते हैं और बड़ों के पैर छूकर उनका आशीर्वाद लेते हैं। यह दिन अपनों के साथ वक्त बिताने और पुरानी कड़वाहटों को भुलाकर एक नई शुरुआत करने का दिन होता है। पूरे असम के गांवों में लोग पारंपरिक बिहू गीतों और नृत्य के माध्यम से अपनी खुशी का इजहार करते हैं।
आधुनिकता और परंपरा
समय के साथ जीवन शैली में बदलाव आया है, लेकिन बिहू की जड़ों में कोई कमी नहीं आई है। आज के दौर में शहरों में भी लोग उसी निष्ठा से बिहू मना रहे हैं जैसे गांवों में। आधुनिकता के रंग ने इसे अधिक भव्य बनाया है, मगर इसकी सादगी और प्रकृति से जुड़ाव आज भी वही है। रंगाली बिहू का हर एक क्षण यह संदेश देता है कि खुशियां बांटने और परंपराओं को सहेजने से ही समाज मजबूत होता है। असम का यह उत्सव आने वाले कई दिनों तक सांस्कृतिक आयोजनों के साथ जारी रहेगा, जो पूरे राज्य को एक सूत्र में बांधे रखता है।








