नई दिल्ली,अंग भारत। संसद का बजट सत्र शनिवार को दोनों सदनों के अनिश्चितकाल के लिए स्थगन के साथ संपन्न हो गया। यह सत्र न केवल विधायी कामकाज की दृष्टि से महत्वपूर्ण रहा, बल्कि राजनीतिक रूप से भी काफी गहमागहमी भरा था। बजट सत्र का समापन होते ही देश के आगामी राजनीतिक और आर्थिक एजेंडे पर एक स्पष्ट बहस शुरू हो गई है। लंबे समय तक चले इस सत्र में कई बार समय सीमा को आगे बढ़ाया गया, ताकि लंबित मामलों पर चर्चा पूरी की जा सके।
महिला आरक्षण की चुनौती
इस पूरे बजट सत्र के दौरान संविधान (131वां संशोधन) विधेयक, 2026 सबसे ज्यादा सुर्खियों में रहा। महिलाओं को 33 प्रतिशत आरक्षण देने और परिसीमन से जुड़ी व्यवस्थाओं वाले इस विधेयक को लेकर काफी उम्मीदें थीं। हालांकि, सदन के भीतर जब वोटिंग हुई, तो स्थिति उम्मीद के मुताबिक नहीं रही।
- विपक्ष और सत्ता पक्ष के बीच आम सहमति का अभाव दिखा।
- कुल 298 वोट विधेयक के पक्ष में डाले गए।
- विरोध में 230 वोट दर्ज किए गए।
- संवैधानिक संशोधन के लिए आवश्यक दो-तिहाई बहुमत यानी 352 मतों का आंकड़ा नहीं मिल पाया।
इस परिणाम ने स्पष्ट कर दिया कि बड़े सुधारों के लिए राजनीतिक दलों के बीच और अधिक संवाद की आवश्यकता है।
लोकसभा का कामकाज
लोकसभा अध्यक्ष ॐ बिरला ने सदन की कार्यप्रणाली का विवरण देते हुए बताया कि 18वीं लोकसभा का सातवां सत्र काफी उत्पादक रहा। 31 बैठकों के दौरान सदन ने कुल 151 घंटे 42 मिनट का समय बिताया। इसकी कार्य-उत्पादकता 93 प्रतिशत तक पहुंच गई, जो सदन की गंभीरता को दर्शाती है।
| विवरण | आंकड़े |
|---|---|
| कुल बैठकें | 31 |
| बजट चर्चा पर समय | 13 घंटे |
| पारित विधेयक | 9 |
| लोक महत्व के मुद्दे | 326 |
बजट सत्र में केवल संख्याएं ही नहीं, बल्कि विविध विषयों पर गंभीर विमर्श भी हुआ। केंद्रीय बजट 2026-27 पर 63 सांसदों ने अपने विचार रखे, जिससे वित्तीय नीतियों की बारीकियों को समझने का मौका मिला।
विधायी और भाषाई विविधता
सत्र के दौरान 12 सरकारी विधेयक पेश किए गए, जिनमें से 9 को मंजूरी मिली। इसके साथ ही संसद की कार्यप्रणाली में भाषाई समावेशिता का एक बेहतरीन उदाहरण देखने को मिला। 18 भारतीय भाषाओं में 181 वक्तव्य दिए गए, जिनका तत्काल अनुवाद किया गया। यह दर्शाता है कि भारतीय लोकतंत्र अपनी जड़ों के प्रति कितना सजग है। सत्र में पश्चिम एशिया की भू-राजनीतिक स्थिति और वामपंथी उग्रवाद जैसे चुनौतीपूर्ण विषयों पर भी विस्तार से चर्चा हुई, जो राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए बेहद अहम है।
राज्यसभा का प्रदर्शन
राज्यसभा ने इस बार उत्पादकता के मामले में लोकसभा को भी पीछे छोड़ दिया। सभापति सी. पी. राधाकृष्णन के अनुसार, उच्च सदन की उत्पादकता 109.87 प्रतिशत दर्ज की गई। 157 घंटे 40 मिनट चले इस सत्र में गंभीर बहस देखने को मिली:
- राष्ट्रपति के अभिभाषण पर विस्तृत चर्चा।
- भारत-अमेरिका व्यापार समझौते के आर्थिक निहितार्थ।
- मंत्रालयों की कार्यप्रणाली की गहन समीक्षा।
राज्यसभा में 50 निजी विधेयक पेश किए गए और 446 बार शून्यकाल का उपयोग किया गया, जो लोकतंत्र में विपक्ष और व्यक्तिगत सदस्यों की सक्रिय भागीदारी को दर्शाता है। उपसभापति हरिवंश का निर्विरोध पुनर्निर्वाचन सदन की एक और उल्लेखनीय घटना रही।
सत्र का समग्र प्रभाव
बजट सत्र का समापन ‘वंदे मातरम्’ की धुन के साथ हुआ, लेकिन इसके पीछे की चर्चाएं आने वाले महीनों में नीति-निर्माण का आधार बनेंगी। महिला आरक्षण पर बनी असमर्थता भले ही एक झटके जैसी हो, लेकिन इसने इस विषय को सार्वजनिक बहस के केंद्र में ला खड़ा किया है। 2089 दस्तावेजों का पटल पर रखा जाना और 73 संसदीय समितियों की रिपोर्ट पेश करना यह साबित करता है कि शासन की प्रक्रिया निरंतर और गहन है। कुल मिलाकर, यह सत्र विधायी उपलब्धियों और भविष्य के सुधारों के बीच का एक संतुलन बिंदु साबित हुआ है।








