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असम में बाढ़ का प्रकोप जारी, सात जिले प्रभावित, तीन और लोगों की मौत

असम में बाढ़ के बाद तबाही का मंजर, पानी में डूबे गांव और गाद साफ करते लोगों के साथ प्रशासन के राहत कार्य की तस्वीर

गुवाहाटी,अंग भारत। असम में भले ही नदियां अब खतरे के निशान से नीचे बह रही हैं, लेकिन बाढ़ का संकट अभी टला नहीं है। राज्य के सात जिले अभी भी बाढ़ की मार झेल रहे हैं, जहां पानी घटने के बाद अब जिंदगी को दोबारा पटरी पर लाने की कठिन जंग शुरू हो चुकी है। हाल ही में गोलाघाट और शिवसागर जिलों में तीन और शव मिलने के बाद इस आपदा में जान गवा चुके लोगों की कुल संख्या बढ़कर 78 हो गई है। ऊपरी असम के शिवसागर, चराईदेव, जोरहाट और गोलाघाट में तबाही सबसे ज्यादा देखी जा रही है। अब जब बाढ़ का पानी धीरे-धीरे उतर रहा है, तो घरों और स्कूलों में जमा घुटनों तक गाद (मिट्टी) लोगों के लिए एक नई और गंभीर मुसीबत बनकर सामने खड़ी हो गई है। लोगों के पास रहने के लिए साफ जगह नहीं बची है और चारों तरफ गंदगी का साम्राज्य फैल गया है।

बाढ़ से भारी नुकसान

असम राज्य आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (ASDMA) के हालिया आंकड़ों के अनुसार, बाढ़ ने ग्रामीण अर्थव्यवस्था और सामान्य जनजीवन को पूरी तरह से झकझोर कर रख दिया है। वर्तमान में चराईदेव, गोलाघाट, शिवसागर, नगांव, बिश्वनाथ, जोरहाट और कामरूप (मेट्रो) जिले सबसे अधिक प्रभावित हैं। इन जिलों के 21 राजस्व मंडलों के करीब 551 गांवों की 3 लाख से ज्यादा आबादी अभी भी जलजले का असर झेल रही है। इसके अलावा, हजारों किसानों की मेहनत पर पानी फिर गया है क्योंकि 21,523.08 हेक्टेयर कृषि भूमि पूरी तरह जलमग्न हो चुकी है, जिससे फसलों को भारी नुकसान पहुंचा है।

नीचे दी गई तालिका से आप प्रभावित क्षेत्रों और जमीन पर सरकारी राहत कार्यों की वास्तविक स्थिति आसानी से समझ सकते हैं:

प्रभावित जिले प्रभावित गांवों की संख्या प्रभावित कुल आबादी जलमग्न कृषि भूमि (हेक्टेयर)
7 (चराईदेव, गोलाघाट, शिवसागर, नगांव, बिश्वनाथ, जोरहाट, कामरूप मेट्रो) 551 3,00,031 21,523.08

गाद बनी बड़ी आफत

नदियों का जलस्तर घटने के साथ ही असली जमीनी चुनौतियां अब खुलकर सामने आने लगी हैं। घरों, रसोइयों, आंगन और बच्चों के स्कूलों के कमरों में घुटनों तक गाद और कीचड़ भर गया है। इस गाद को साफ करना बेहद थका देने वाला और कठिन काम है। जब तक यह कीचड़ पूरी तरह साफ नहीं हो जाता, तब तक लोग अपने घरों में कदम भी नहीं रख सकते। इसके कारण क्षेत्र में संक्रमण फैलने और पीने के साफ पानी के स्रोत दूषित होने का खतरा कई गुना बढ़ गया है। डॉक्टरों का कहना है कि बाढ़ के बाद फैलने वाली बीमारियों जैसे डायरिया, त्वचा रोग और मलेरिया से निपटने के लिए अब युद्ध स्तर पर काम करना होगा।

राहत शिविरों का सहारा

इस संकट के समय में बेघर हुए लोगों को सहारा देने के लिए सरकार और स्थानीय प्रशासन मिलकर काम कर रहे हैं। वर्तमान में कुल 101 राहत केंद्र सुचारू रूप से चलाए जा रहे हैं, जिनमें 71 सक्रिय राहत शिविर और 30 राहत वितरण केंद्र शामिल हैं। इन शिविरों में करीब 16,567 लोगों ने शरण ली है, जहां उन्हें भोजन और बुनियादी सुविधाएं दी जा रही हैं। वहीं, 72,210 ऐसे लोग जो शिविरों में नहीं रह रहे हैं, उन्हें भी इन केंद्रों के जरिए जरूरी राहत सामग्री और सूखा राशन पहुंचाया जा रहा है।

मुस्तैद हैं राहत एजेंसियां

बाढ़ प्रभावित इलाकों में जिंदगी बचाने और लोगों तक मदद पहुंचाने के लिए कई बड़ी एजेंसियां दिन-रात जुटी हुई हैं। राहत और बचाव कार्य में निम्नलिखित दल अपनी सेवाएं दे रहे हैं:

  • सेना और अर्धसैनिक बल
  • राष्ट्रीय आपदा प्रतिक्रिया बल (NDRF) और राज्य आपदा प्रतिक्रिया बल (SDRF)
  • डीडीआरएफ (DDRF) और जिला प्रशासन
  • वायुसेना और स्थानीय पुलिस बल
  • अग्निशमन और आपातकालीन सेवाएं (F&ES)
  • नागरिक सुरक्षा और स्थानीय प्रशिक्षित स्वयंसेवक

इन सभी टीमों के समन्वय से दूरदराज के फंसे हुए इलाकों में लोगों तक जरूरी सामान पहुंचाया जा रहा है। इस अभियान में 20 नावें लगातार फेरे लगा रही हैं ताकि फंसे हुए लोगों को सुरक्षित स्थानों पर लाया जा सके।

स्वास्थ्य और ढांचागत चुनौतियां

बाढ़ के पानी के जाने के बाद महामारियों का हमला सबसे बड़ा खतरा होता है। इसे रोकने के लिए राज्य सरकार ने प्रभावित इलाकों में तुरंत 108 मेडिकल टीमें तैनात की हैं। ये टीमें बीमार लोगों का इलाज कर रही हैं और ब्लीचिंग पाउडर तथा ओआरएस के पैकेट बांट रही हैं। इस आपदा में सड़कों, पुलों और अन्य सरकारी संपत्तियों को भारी नुकसान पहुंचा है। बुनियादी ढांचे की मरम्मत के लिए सरकार लगातार समीक्षा बैठकें कर रही है। स्थिति की गंभीरता का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि असम विधानसभा का बजट सत्र, जो 31 जुलाई तक चलना था, उसे दो दिन पहले ही यानी 29 जुलाई को समाप्त कर दिया गया ताकि पूरा ध्यान राहत कार्यों पर लगाया जा सके।

पुनर्वास की कठिन राह

“बाढ़ का पानी उतरना राहत की बात जरूर है, लेकिन असली परीक्षा अब शुरू होती है जब लोगों को अपना आशियाना फिर से खड़ा करना है और अपनी खोई हुई आजीविका को वापस पाना है।”

खेती की जमीन पर बालू और गाद जमा होने के कारण किसानों के सामने अगली फसलों की तैयारी को लेकर भी गंभीर चिंता बनी हुई है। आने वाले दिनों में प्रशासन को न केवल सड़कों और स्कूलों को दोबारा शुरू करना होगा, बल्कि प्रभावित परिवारों को आर्थिक मदद, मुफ्त बीज और पुनर्वास के लिए अन्य संसाधन भी उपलब्ध कराने होंगे। तभी असम के ये सात जिले फिर से मुख्यधारा में लौट पाएंगे।

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अंग भारत • रिपोर्टर

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