असम,अंग भारत। आगामी असम विधानसभा चुनाव 2026 की बिसात बिछ चुकी है और यूनाइटेड पीपल्स पार्टी लिबरल (यूपीपीएल) ने अपने 7 प्रमुख उम्मीदवारों की घोषणा करके राजनीतिक पारा बढ़ा दिया है। 9 अप्रैल को होने वाले इस चुनावी दंगल में पार्टी अध्यक्ष प्रमोद बोड़ो के तामुलपुर सीट से मैदान में उतरने के फैसले ने राज्य की राजनीति में नई चर्चाएं शुरू कर दी हैं। यह सूची पार्टी की केंद्रीय कार्यसमिति और कोर समिति की गहन समीक्षा के बाद जारी की गई है, जो पार्टी की जमीनी मजबूती को दर्शाती है।
उम्मीदवारों का चयन
यूपीपीएल के महासचिव (प्रशासन) राजू कुमार नार्ज़ारी द्वारा जारी आधिकारिक अधिसूचना के अनुसार, पार्टी ने अपने दिग्गज चेहरों को चुनावी मैदान में उतारा है। पार्टी की रणनीति स्पष्ट है: बोडोलैंड क्षेत्र की महत्वपूर्ण सीटों पर अपना प्रभाव कायम रखना।
- अनिदा बासुमतारी: 1 नंबर गोसाईगांव
- राजू कुमार नार्ज़ारी: 2 नंबर दोतमा (एसटी)
- लॉरेंस इस्लारी: 3 नंबर कोकराझार (एसटी)
- प्रमोद बोड़ो: 43 नंबर तामुलपुर (एसटी)
- नेरस्वन बोड़ो: 45 नंबर भेरगांव
- दिपेन बोड़ो: 46 नंबर उदलगुरी (एसटी)
- कमलसिह नार्ज़ारी: 20 नंबर बिजनी
एनडीए से अलगाव?
राजनीतिक गलियारों में सबसे बड़ी चर्चा यूपीपीएल के एनडीए से अलग होने की अटकलों को लेकर है। 15 मार्च को कोकराझार में हुई कोर समिति की बैठक के बाद से ही इस बात ने जोर पकड़ लिया है कि क्या यूपीपीएल एनडीए का साथ छोड़ देगी। यूपीपीएल नेतृत्व का आरोप है कि 10 मार्च को भाजपा प्रदेश अध्यक्ष को लिखे गए पत्र पर कोई ठोस प्रतिक्रिया न मिलने से पार्टी में असंतोष बढ़ा है।
“पार्टी की कोर समिति ने गठबंधन से बाहर निकलने के विकल्पों पर विस्तृत चर्चा की है। हम जनभावनाओं को सर्वोपरि मानते हैं और अंतिम निर्णय जनता की इच्छा के अनुरूप ही लिया जाएगा।” – राजू कुमार नार्ज़ारी, महासचिव (प्रशासन), यूपीपीएल।
रणनीति और चुनौतियां
प्रमोद बोड़ो का अकेले विधानसभा चुनाव लड़ने का निर्णय एनडीए के लिए एक बड़ा सिरदर्द साबित हो सकता है। भाजपा ने अतीत में प्रमोद बोड़ो को राज्यसभा भेजने और उनकी जीत सुनिश्चित करने में बड़ी भूमिका निभाई थी, लेकिन अब विधानसभा चुनाव में अलग राह चुनना एक बड़े राजनीतिक बदलाव का संकेत है।
जमीनी स्तर पर पकड़
पार्टी महासचिव राजू कुमार नार्ज़ारी के अनुसार, यूपीपीएल अब पूरे बोडोलैंड प्रादेशिक क्षेत्र (बीटीआर) में सघन रोड रैलियां कर रही है। उनका तर्क है कि जब जनता अपने स्थानीय प्रतिनिधियों (MCLA) के काम से संतुष्ट नहीं होती, तो वे उम्मीद की नजर से विधायकों की ओर देखती है। इसी सोच के साथ पार्टी जनता के बीच अपनी पैठ बनाने की कोशिश कर रही है।
राजनीतिक समीकरण
भारत निर्वाचन आयोग द्वारा आदर्श आचार संहिता लागू होने के बाद, चुनावी माहौल पूरी तरह से बदल चुका है। जहां एक ओर यूपीपीएल अपनी स्वतंत्र पहचान बनाने की कवायद में है, वहीं एनडीए के लिए यह सीट शेयरिंग का पेच सुलझाना चुनौतीपूर्ण होगा। यदि यूपीपीएल गठबंधन से अलग होती है, तो यह आगामी चुनाव में वोटों के ध्रुवीकरण को एक नई दिशा दे सकता है।
आने वाले दिन असम की राजनीति के लिए बेहद निर्णायक होंगे। क्या प्रमोद बोड़ो अपने दम पर जीत हासिल कर पाएंगे, या एनडीए के साथ उनके संबंध सुधारने की कोई गुंजाइश बाकी है? इसका जवाब तो 9 अप्रैल की वोटिंग और उसके बाद आने वाले परिणामों से ही स्पष्ट होगा, लेकिन वर्तमान में यूपीपीएल का यह कदम असम के सियासी नक्शे को बदलने की ताकत रखता है।








