सुपौल,अंग भारत। सुपौल के बीएसएस कॉलेज में प्रोफेसरों ने बकाया पारिश्रमिक न मिलने के कारण उत्तर पुस्तिकाओं के मूल्यांकन कार्य का पूरी तरह बहिष्कार कर दिया है। रविवार को आयोजित एक आपात बैठक में शिक्षकों ने सर्वसम्मति से यह निर्णय लिया कि जब तक उनके पिछले सत्र के कार्यों का भुगतान सुनिश्चित नहीं होता, तब तक वे किसी भी नई कॉपी को हाथ नहीं लगाएंगे। यह कदम शिक्षकों की ओर से अपने अधिकारों और आर्थिक हितों के लिए उठाया गया एक कड़ा विरोध है, जिसका सीधा प्रभाव विश्वविद्यालय के शैक्षणिक कैलेंडर और छात्रों के भविष्य पर पड़ रहा है।
विवाद की जड़
प्रोफेसरों के इस आक्रोश के पीछे मुख्य कारण पिछले लंबे समय से अटका हुआ भुगतान है। शिक्षकों का तर्क है कि उन्होंने पूरी निष्ठा के साथ अपना उत्तरदायित्व निभाया, लेकिन विश्वविद्यालय प्रशासन ने उनकी मेहनत को नजरअंदाज किया। प्रो. शिव नन्दन यादव ने साफ कहा कि बार-बार विभाग और प्रशासन को सूचित करने के बावजूद सिर्फ आश्वासन ही हाथ लगे हैं। ऐसी स्थिति में शिक्षकों के पास काम रोकने के अलावा कोई रास्ता नहीं बचा है।
- मूल्यांकन कार्य का महीनों से अटका हुआ पारिश्रमिक।
- विश्वविद्यालय प्रशासन द्वारा लगातार की जा रही अनदेखी।
- शिक्षकों में उपेक्षा महसूस होने के कारण उपजा आक्रोश।
- लिखित शिकायतों के बाद भी समस्या का समाधान न निकलना।
छात्रों पर असर
कॉपी जांच रुकने का सीधा खामियाजा छात्रों को भुगतना पड़ रहा है। आमतौर पर परीक्षा खत्म होने के कुछ हफ्तों के भीतर परिणाम की उम्मीद होती है, लेकिन अब रिजल्ट में देरी होना लगभग तय है। यह स्थिति उन छात्रों के लिए चिंताजनक है जो आगे की पढ़ाई या किसी प्रतियोगी परीक्षा की तैयारी कर रहे हैं।
अभिभावकों की चिंता
अभिभावक अब इस बात को लेकर डरे हुए हैं कि सत्र विलंब होने से उनके बच्चों का कीमती समय बर्बाद हो जाएगा। कॉलेज के भीतर शैक्षणिक माहौल पहले ही तनावपूर्ण है। यदि कॉलेज प्रशासन और शिक्षक संघ के बीच कोई मध्यस्थता नहीं होती है, तो यह गतिरोध और लंबा खिंच सकता है, जिससे आगामी सत्र के प्रवेश पर भी असर पड़ेगा।
प्रशासन की भूमिका
फिलहाल, कॉलेज प्रशासन ने इस पर आधिकारिक चुप्पी साध रखी है। हालांकि, अंदरूनी सूत्रों की मानें तो विश्वविद्यालय के उच्च अधिकारियों के साथ बातचीत के प्रयास चल रहे हैं। शिक्षक संघ ने सरकार और विश्वविद्यालय प्रशासन को स्पष्ट चेतावनी दे दी है कि यदि समय रहते भुगतान की स्पष्ट रूपरेखा पेश नहीं की गई, तो वे अपना आंदोलन और तेज करने पर मजबूर होंगे।
“शिक्षकों की मेहनत का सम्मान होना चाहिए। यदि उन्हें उनका हक नहीं मिलेगा, तो शैक्षणिक कार्य सुचारू रूप से नहीं चल सकते। यह केवल पैसे का मामला नहीं, बल्कि शिक्षकों के स्वाभिमान का भी है।”
आगे क्या होगा?
आने वाले दिनों में यह विवाद और अधिक गहराने की आशंका है। यदि शिक्षक अपने स्टैंड पर अडिग रहते हैं, तो कॉपियों के बंडल यूं ही धूल फांकते रहेंगे। छात्रों के भविष्य को सुरक्षित रखने के लिए जरूरी है कि विश्वविद्यालय प्रशासन जल्द से जल्द बजट जारी करे। अब गेंद पूरी तरह से विश्वविद्यालय प्रशासन के पाले में है कि वे कब तक शिक्षकों के धैर्य की परीक्षा लेते हैं।
| मुद्दा | स्थिति |
|---|---|
| कॉपी मूल्यांकन | पूर्ण बहिष्कार |
| शिक्षक | भुगतान के बिना काम करने से इनकार |
| छात्रों का भविष्य | रिजल्ट में देरी की पूरी संभावना |
इस पूरे प्रकरण ने एक बार फिर शिक्षा व्यवस्था में प्रशासनिक लापरवाही और शिक्षकों के आर्थिक शोषण के मुद्दे को सबके सामने लाकर खड़ा कर दिया है। जब तक प्रणाली में पारदर्शिता और समयबद्ध भुगतान की व्यवस्था नहीं होगी, तब तक इसी तरह के विरोध प्रदर्शनों का सिलसिला चलता रहेगा।








