शंभूगंज/बांका/अंगभारत। बिहार के बांका जिले के शंभूगंज प्रखंड में सरकारी दावों की हवा निकालते हुए खेतों में मौत का जाल बिछा हुआ है। यहां के बालाचक, गोयडा समेत दो दर्जन से अधिक गांवों में किसान सरकारी बिजली पोल न मिलने के कारण मजबूरी में गीले और कच्चे बांस के सहारे चालू बिजली के नंगे तारों को खींचकर अपने खेतों की सिंचाई कर रहे हैं। कृषि कनेक्शन (Agri Connection) मिलने के बावजूद बुनियादी ढांचा न होने से कभी भी कोई बड़ा हादसा हो सकता है। किसानों ने विभाग से कई बार गुहार लगाई है, लेकिन स्थिति जस की तस बनी हुई है।
हादसों का खुला न्यौता
बांस पर दौड़ती बिजली सिर्फ एक अस्थाई व्यवस्था नहीं है, बल्कि यह सीधे तौर पर जिंदगी से खिलवाड़ है। कृषि कार्य के दौरान खेतों में हमेशा नमी और पानी मौजूद रहता है। बांस, विशेष रूप से जब वह गीला हो या उसमें नमी हो, बिजली का सुचालक बन जाता है। हवा के तेज झोंके या मवेशियों के टकराने से ये बांस कभी भी गिर सकते हैं। स्थानीय लोगों के अनुसार, इन क्षेत्रों में पहले भी करंट लगने की छिटपुट घटनाएं हो चुकी हैं। इसके बावजूद विद्युत विभाग इस जानलेवा लापरवाही को नजरअंदाज कर रहा है।
प्रभावित क्षेत्र और किसान
यह गंभीर समस्या किसी एक टोले या गांव तक सीमित नहीं है। शंभूगंज प्रखंड के कई इलाके इस समस्या से जूझ रहे हैं। प्रभावित क्षेत्रों की सूची काफी लंबी है:
- बालाचक और गोयडा
- कैथा और सहदेवपुर
- विरनौधा और टीना
- महिसौथा और आसपास के अन्य क्षेत्र
इन गांवों के किसान सुरेश सिंह और विपुल सिंह ने बताया कि सरकार सिंचाई के लिए बिजली देने की बात तो करती है, लेकिन बिना पोल के हम खेतों तक लाइन कैसे ले जाएं? मजबूरन हमें खुद के खर्च पर बांस खरीदकर तारों को टांगना पड़ता है। आंधी-पानी के दिनों में तो खेतों की तरफ जाना भी मौत को गले लगाने जैसा होता है। किसानों में इस उपेक्षा को लेकर भारी आक्रोश है।
कागजी विकास की हकीकत
बिहार सरकार हर खेत को पानी और निर्बाध बिजली देने के लिए बड़ी योजनाएं चला रही है। कागजों पर आंकड़े दुरुस्त दिखते हैं कि इतने किसानों को कृषि कनेक्शन आवंटित कर दिए गए। लेकिन बिजली विभाग कनेक्शन देने के बाद अपनी जिम्मेदारी से पल्ला झाड़ लेता है। पोल गाड़ने का काम अक्सर ठेकेदारों के भरोसे छोड़ दिया जाता है, जो महीनों तक काम लटकाए रखते हैं। जब तक ट्रांसफार्मर से लेकर किसान के खेत तक पक्के लोहे या कंक्रीट के पोल नहीं लगेंगे, तब तक इस बिजली का कोई सुरक्षित लाभ नहीं मिल सकता।
विभाग की सुस्ती
“बिजली विभाग के नियम कहते हैं कि कृषि कनेक्शन देने के साथ ही सुरक्षा मानकों का पालन सुनिश्चित करना विभाग की जिम्मेदारी है। बिना पोल के तार खींचना गैर-कानूनी और असुरक्षित है।”
ग्रामीणों का आरोप है कि विभाग के स्थानीय अभियंताओं को इस संबंध में लिखित और मौखिक रूप से कई बार सूचित किया जा चुका है। हर बार सिर्फ आश्वासन ही मिलता है। किसान बिजली का बिल चुका रहे हैं, फिर भी उन्हें अपनी जान जोखिम में डालकर खेती करनी पड़ रही है।
सुरक्षा के जरूरी नियम
खेतों में बिजली के सुरक्षित उपयोग के लिए कुछ कड़े तकनीकी मापदंडों का पालन होना चाहिए, जिन्हें विभाग नजरअंदाज कर रहा है। नीचे दी गई तालिका में सुरक्षित बुनियादी ढांचे की आवश्यकताओं को समझाया गया है:
| भौतिक ढांचा | मानक दूरी | सुरक्षा लाभ |
|---|---|---|
| कंक्रीट पोल (PSC) | अधिकतम 40-50 मीटर | तारों के जमीन पर गिरने का खतरा खत्म होता है |
| गार्डिंग वायर | सड़क और रास्तों के ऊपर | तार टूटने पर बिजली स्वतः कट हो जाती है |
| कवर्ड केबल (AB Cable) | संवेदनशील क्षेत्रों में | शॉर्ट सर्किट और करंट फैलने की गुंजाइश शून्य होती है |
तुरंत उठें कदम
इस विकट समस्या का समाधान केवल फाइलों को आगे बढ़ाने से नहीं होगा। इसके लिए विभाग को कुछ त्वरित कदम उठाने होंगे:
- विशेष अभियान: शंभूगंज प्रखंड के चिन्हित गांवों में विशेष अभियान चलाकर तुरंत कंक्रीट के पोल गाड़े जाएं।
- जवाबदेही तय हो: जिन ठेकेदारों को पोल लगाने का काम मिला था और उन्होंने काम अधूरा छोड़ा, उन पर कार्रवाई की जाए।
- अस्थाई समाधान: जब तक पक्के पोल नहीं लगते, तब तक खेतों में नंगे तारों की जगह कवर्ड केबल का इस्तेमाल अनिवार्य किया जाए।
शंभूगंज के किसान आज भी अपने हक और अपनी सुरक्षा के लिए गुहार लगा रहे हैं। अब देखना यह है कि जिला प्रशासन और विद्युत विभाग किसी बड़ी अनहोनी का इंतजार करता है या समय रहते इन किसानों की सुध लेता है।








