Founder – Mohan Milan

कमीशन नहीं मिलने से ग्रामीण बैंक अभिकर्ता नाराज

सुपौल,अंग भारत। बिहार ग्रामीण बैंक के अल्प बचत अभिकर्ताओं (एजेंटों) के सामने इस समय गहरा आर्थिक संकट खड़ा हो गया है, क्योंकि उन्हें पिछले सात महीनों से न तो उनका कमीशन मिल रहा है और न ही सरकार द्वारा निर्धारित मानदेय। इन अभिकर्ताओं का कहना है कि बैंक प्रबंधन की उदासीनता के कारण उनके सामने अब भुखमरी जैसी स्थिति पैदा हो गई है और वे अपने परिवारों का खर्च उठाने में भी पूरी तरह असमर्थ हैं। नाराज अभिकर्ताओं ने अब बैंक प्रशासन के खिलाफ सीधे मोर्चा खोलते हुए उग्र आंदोलन की चेतावनी दी है।

आर्थिक तंगी की मार

अभिकर्ताओं का कहना है कि वित्तीय अनिश्चितता ने उनकी कमर तोड़ दी है। अल्प बचत अभिकर्ता संघ के उपसचिव पंकज मिश्रा ने बताया कि बीते कई महीनों से कमीशन के भुगतान में लगातार देरी हो रही है। इस आर्थिक दबाव का सीधा असर उनके बच्चों की शिक्षा और घर के जरूरी खर्चों पर पड़ रहा है। एक एजेंट जो पूरी ईमानदारी से बैंक की जमा योजनाओं को घर-घर तक पहुँचाता है, आज वही अपनी जीविका चलाने के लिए संघर्ष कर रहा है।

भुगतान में सात महीने की देरी

संघ के सचिव अमरेंद्र प्रसाद ने बताया कि बैंक ने न केवल कमीशन बल्कि अन्य अनुषंगी सुविधाएं भी पूरी तरह से बंद कर दी हैं। समस्या के मुख्य बिंदुओं को इस प्रकार समझा जा सकता है:

  • कमीशन का अभाव: पिछले सात महीनों से किसी भी अभिकर्ता को उनके द्वारा किए गए काम का कमीशन नहीं मिला है।
  • मानदेय पर रोक: सुप्रीम कोर्ट के स्पष्ट निर्देशों के बावजूद 750 रुपये प्रतिमाह का मानदेय नहीं दिया जा रहा है।
  • यात्रा भत्ता बंद: फील्ड में काम करने वाले अभिकर्ताओं को मिलने वाला यात्रा भत्ता पूरी तरह से ठप है।

भेदभाव का आरोप

अभिकर्ताओं की सबसे बड़ी शिकायत बैंक प्रबंधन के दोहरे रवैये को लेकर है। उनका तर्क है कि बैंक के नियमित कर्मचारियों को सभी प्रकार के भत्ते और समय पर भुगतान मिल रहा है, जबकि फील्ड में काम करने वाले अभिकर्ताओं को पूरी तरह उपेक्षित छोड़ दिया गया है। यह भेदभाव न केवल नियमों के खिलाफ है, बल्कि मानवीय संवेदनाओं के भी विपरीत है। कई एजेंटों का कहना है कि उन्होंने बैंक को आगे बढ़ाने में अपना पूरा जीवन झोंक दिया है, लेकिन आज मुसीबत के वक्त बैंक उनके साथ खड़ा होने के बजाय मुंह मोड़ रहा है।

आंदोलन की सीधी चेतावनी

अभिकर्ताओं ने स्पष्ट संदेश दिया है कि अब वे चुप नहीं बैठेंगे। यदि उनकी मांगों पर तत्काल प्रभाव से सकारात्मक निर्णय नहीं लिया गया, तो वे निम्नलिखित कदम उठा सकते हैं:

अनिश्चितकालीन अनशन और बैंक शाखाओं के सामने उग्र प्रदर्शन ही अब एकमात्र रास्ता बचा है। जब तक बकाया राशि का भुगतान नहीं होता, संघर्ष जारी रहेगा।

इस विरोध प्रदर्शन में तपन गुप्ता, जटाशंकर गुप्ता, देवचंद सिंह, सुदीप दास, किशोर गुप्ता और अमीरात मुखर्जी जैसे वरिष्ठ अभिकर्ताओं ने एक मंच पर आकर बैंक प्रबंधन को कड़ी चेतावनी दी है। सभी एजेंट एकजुट हैं और अपनी मेहनत की कमाई वापस पाने के लिए किसी भी हद तक जाने को तैयार हैं।

बैंक की चुप्पी

हैरानी की बात यह है कि इतनी गंभीर स्थिति होने के बावजूद बैंक प्रबंधन की ओर से कोई भी आधिकारिक बयान या स्पष्टीकरण सामने नहीं आया है। इस चुप्पी ने अभिकर्ताओं के गुस्से को और बढ़ा दिया है। जानकारों का मानना है कि यदि बैंक प्रबंधन ने समय रहते इस मामले का निपटारा नहीं किया, तो आगामी दिनों में बिहार के कई हिस्सों में ग्रामीण बैंक की सेवाएं प्रभावित हो सकती हैं।

आगे की राह

फिलहाल पूरा मामला प्रबंधन और अभिकर्ताओं के बीच टकराव के मुहाने पर खड़ा है। जहां एक ओर बैंक के पास धन की कमी या तकनीकी खामियों का तर्क हो सकता है, वहीं दूसरी ओर आम अभिकर्ताओं की जिंदगी का सवाल है। देखना यह होगा कि बैंक प्रबंधन कब अपनी चुप्पी तोड़ता है और इन मेहनती अभिकर्ताओं के परिवारों को आर्थिक तंगी से बाहर निकालने के लिए क्या ठोस कदम उठाता है।

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अंग भारत • रिपोर्टर

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