सुपौल,अंग भारत। जिला मुख्यालय स्थित टाउन हॉल में आयोजित पंच सम्मेलन में पंचायत जनप्रतिनिधियों को ग्रामीण विकास की कड़ियों को जोड़ने की नई सीख दी गई। इस विशेष बैठक में उप विकास आयुक्त इंद्रवीर कुमार और जिला परिषद अध्यक्ष कमला देवी ने पंचायत प्रतिनिधियों को संबोधित किया। सम्मेलन का मूल उद्देश्य मनरेगा (महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम) जैसी लोक कल्याणकारी योजनाओं को जमीनी स्तर पर प्रभावी बनाना है। इसमें जिले के विभिन्न हिस्सों से आए जनप्रतिनिधियों को मनरेगा के नए नियमों, पारदर्शी भुगतान प्रणाली और आपदा नियंत्रण कार्यों में इसके उपयोग के बारे में विस्तार से प्रशिक्षित किया गया।
ग्रामीण विकास की दिशा में स्थानीय स्वशासन यानी पंचायतों का कामकाज बेहद अहम है। सुपौल जिला लंबे समय से कोसी नदी की बाढ़ और विस्थापन की मार झेलता रहा है। ऐसे में स्थानीय लोगों को स्थानीय स्तर पर ही आजीविका उपलब्ध कराना प्रशासन की पहली प्राथमिकता है। टाउन हॉल में आयोजित इस एक दिवसीय कार्यशाला में प्रशासन ने स्पष्ट किया कि विकास योजनाओं का लाभ सीधे जरूरतमंदों तक पहुंचे, इसके लिए जनप्रतिनिधियों को योजनाओं के तकनीकी पहलुओं की गहरी समझ होनी चाहिए।
मनरेगा और श्रमिक अधिकार
मनरेगा कानून देश के ग्रामीण परिवारों को एक वित्तीय वर्ष में कम से कम 100 दिनों के गारंटीकृत मजदूरी रोजगार की सुरक्षा देता है। इस योजना का एक बड़ा पहलू यह है कि यह श्रमिकों को मांग आधारित रोजगार का अधिकार देती है। जब कोई श्रमिक काम की मांग करता है, तो प्रशासन उसे रोजगार देने के लिए बाध्य है।
सम्मेलन के दौरान उप विकास आयुक्त इंद्रवीर कुमार ने बताया कि मनरेगा के तहत मिलने वाले अधिकारों को और अधिक मजबूत बनाया गया है। इसके तहत कुछ विशेष नियमों का पालन करना अनिवार्य है:
- रोजगार की मांग और प्राप्ति: आवेदन जमा करने के 15 दिनों के भीतर काम उपलब्ध कराना आवश्यक है।
- बेरोजगारी भत्ता: यदि निर्धारित समय सीमा (15 दिन) में रोजगार नहीं मिलता है, तो श्रमिक राज्य सरकार से बेरोजगारी भत्ता पाने का हकदार हो जाता है।
- जॉब कार्ड प्रविष्टि: श्रमिक द्वारा किए गए काम की पूरी जानकारी और दिनों की संख्या उसके जॉब कार्ड में दर्ज की जानी चाहिए।
- पारदर्शी भुगतान: इलेक्ट्रॉनिक माध्यम से सीधे बैंक खातों में मजदूरी भेजी जाती है, जिससे बिचौलियों का हस्तक्षेप समाप्त हो गया है।
पलायन और आपदा प्रबंधन
सुपौल जिले की भौगोलिक स्थिति ऐसी है कि यहाँ बाढ़ और सुखाड़ का प्रभाव बना रहता है। इस वजह से बड़ी संख्या में लोग काम की तलाश में दूसरे राज्यों की ओर पलायन करते हैं। इस पलायन को रोकने के लिए स्थानीय स्तर पर रोजगार सृजन ही एकमात्र टिकाऊ रास्ता है। सम्मेलन में इस बात पर विशेष जोर दिया गया कि ग्रामीण आधारभूत संरचनाओं का निर्माण इस तरह किया जाए जो आपदा के समय भी सहायक सिद्ध हों।
उप विकास आयुक्त इंद्रवीर कुमार ने जनप्रतिनिधियों को सुझाव दिया कि वे अपनी कार्ययोजनाओं में बाढ़ नियंत्रण और जल संचयन जैसे कार्यों को प्राथमिकता दें। कोसी क्षेत्र में तालाबों का जीर्णोद्धार, नहरों की उड़ाही, तटबंधों की मरम्मत और वृक्षारोपण जैसे कार्य मनरेगा के माध्यम से कराए जा सकते हैं। इससे न केवल रोजगार मिलेगा बल्कि पर्यावरण संरक्षण और बाढ़ सुरक्षा को भी बल मिलेगा।
पारदर्शिता और तकनीकी बदलाव
समय के साथ सरकारी योजनाओं के संचालन के तरीके बदल गए हैं। अब मस्टर रोल का ऑनलाइन सत्यापन होता है और कार्यस्थल की जियो-टैगिंग की जाती है। जिला पंचायती राज पदाधिकारी ने जनप्रतिनिधियों को संबोधित करते हुए कहा कि पारदर्शिता ही योजनाओं की सफलता की कुंजी है। जब सभी कार्य ऑनलाइन माध्यम से दर्ज किए जा रहे हैं, तो इसमें किसी भी स्तर पर गड़बड़ी की गुंजाइश नहीं रहती।
पंचायतों में योजनाओं के सुचारू संचालन के लिए जिला प्रशासन ने एक व्यवस्थित रूपरेखा तैयार की है। इसे समझने के लिए नीचे दी गई तालिका का अवलोकन किया जा सकता है:
| योजना का स्तर | मुख्य दायित्व | अपेक्षित परिणाम |
|---|---|---|
| ग्राम पंचायत | श्रमिकों का पंजीकरण, जॉब कार्ड जारी करना, स्थानीय कार्यों की पहचान करना। | स्थानीय स्तर पर रोजगार और पलायन पर रोक। |
| पंचायत समिति | ब्लॉक स्तर पर योजनाओं का समन्वय और ग्राम पंचायतों की योजनाओं का अनुमोदन। | संसाधनों का संतुलित वितरण। |
| जिला परिषद | जिले स्तर पर वृहद योजनाओं का नियोजन, निगरानी और मूल्यांकन। | जिले का समग्र विकास और आधारभूत ढांचा मजबूत करना। |
इस अवसर पर जिला परिषद अध्यक्ष कमला देवी ने कहा कि पंचायत प्रतिनिधि जनता और प्रशासन के बीच की सबसे मजबूत कड़ी हैं। वे सीधे तौर पर ग्रामीण जनता की समस्याओं को देखते हैं। यदि वे योजनाओं के नए नियमों से अच्छी तरह वाकिफ होंगे, तो वे ग्रामीणों को उनके हक के बारे में जागरूक कर पाएंगे। बैठक में उपस्थित जिला जन सूचना पदाधिकारी ने भी सूचनाओं के आदान-प्रदान और योजनाओं के व्यापक प्रचार-प्रसार पर अपनी राय रखी ताकि समाज के अंतिम व्यक्ति तक मनरेगा और ग्रामीण विकास की अन्य योजनाओं का लाभ पहुँच सके।
इस सम्मेलन में भाग लेने वाले मुखिया, वार्ड सदस्य और अन्य पंचायत प्रतिनिधियों ने अपनी व्यावहारिक कठिनाइयों को भी अधिकारियों के समक्ष रखा। इनमें खास तौर पर सामग्री भुगतान में होने वाली देरी और जियो-टैगिंग के समय आने वाली तकनीकी समस्याओं पर चर्चा हुई। अधिकारियों ने भरोसा दिलाया कि इन समस्याओं का समयबद्ध निपटारा किया जाएगा। इस तरह के आयोजनों से न केवल जनप्रतिनिधियों का हौसला बढ़ता है, बल्कि सरकारी तंत्र और जनता के बीच का फासला भी कम होता है।







