रांची,अंग भारत। बाल विवाह जैसी सामाजिक बुराई को जड़ से मिटाने के लिए रांची ने अब एक बड़ा कदम उठाया है। मांडर प्रखंड में हाल ही में आयोजित एक महत्वपूर्ण कार्यशाला में जिला प्रशासन और विभिन्न सामाजिक संगठनों ने संयुक्त रूप से वर्ष 2030 तक रांची को पूर्णतः ‘बाल विवाह मुक्त’ बनाने का कड़ा संकल्प लिया है। यह पहल केवल कागजी नहीं, बल्कि जमीनी स्तर पर लड़कियों की सुरक्षा, शिक्षा और उनके मानवाधिकारों को सुरक्षित करने की एक गंभीर कोशिश है।
सामूहिक प्रयास ही एकमात्र रास्ता
बाल विवाह कोई ऐसी समस्या नहीं जिसे केवल सरकारी आदेशों से खत्म किया जा सके। इसके लिए समाज के हर वर्ग को साथ आना होगा। सिंदुआर टोला ग्रामोदय विकास विद्यालय के सचिव राजेन कुमार का स्पष्ट मानना है कि जब तक समाज खुद इस कुप्रथा के खिलाफ खड़ा नहीं होगा, तब तक बदलाव नामुमकिन है। रांची के कोने-कोने में चलाए जा रहे इस अभियान का उद्देश्य लोगों की सोच में परिवर्तन लाना है।
लड़कियों के अधिकारों का सम्मान
मांडर की प्रखंड विकास पदाधिकारी (बीडीओ) चंचला कुमारी ने इस विषय पर बेहद मुखर होकर अपनी बात रखी। उन्होंने बताया कि कम उम्र में विवाह करना सीधे तौर पर लड़की के भविष्य को अंधकार में धकेलने जैसा है।
- शिक्षा का नुकसान: विवाह के बाद अधिकांश लड़कियां स्कूल छोड़ देती हैं।
- स्वास्थ्य जोखिम: कम उम्र में मां बनने से जच्चा और बच्चा दोनों की जान को खतरा रहता है।
- आत्मनिर्भरता में कमी: बाल विवाह लड़कियों को आर्थिक रूप से स्वतंत्र होने के अवसर से वंचित कर देता है।
गरीबी बनाम सामाजिक कुरीतियां
ग्रामीण इलाकों में अक्सर यह तर्क दिया जाता है कि आर्थिक तंगी के कारण लोग बेटियों का हाथ जल्दी पीला कर देते हैं। प्रखंड प्रमुख फिलिप सहाय एक्का ने इस पर गहरी चिंता जताई है। उन्होंने ग्रामीण क्षेत्रों में प्रचलित ‘ढूकु विवाह’ जैसी कुप्रथाओं को समाज के लिए घातक बताया। उनका कहना है कि गरीबी एक मजबूरी हो सकती है, लेकिन इसे आधार बनाकर बेटियों के बचपन को छीनना किसी भी दृष्टि से सही नहीं है।
जमीनी स्तर पर रणनीति
इस लक्ष्य को हासिल करने के लिए प्रशासन ने एक त्रि-स्तरीय रणनीति पर काम शुरू किया है:
- निगरानी: वार्ड सदस्यों और आशा कार्यकर्ताओं को अपने क्षेत्र में सक्रिय रहने का निर्देश दिया गया है।
- सूचना तंत्र: बाल विवाह की कोई भी गुप्त सूचना मिलने पर उसे तुरंत प्रशासन तक पहुंचाने के लिए एक मजबूत नेटवर्क बनाया जा रहा है।
- जन-जागरूकता: गांव-गांव जाकर नुक्कड़ नाटकों और बैठकों के माध्यम से लोगों को कानून और स्वास्थ्य से जुड़ी जानकारी देना।
क्यों जरूरी है यह बदलाव?
आज भी झारखंड के कई हिस्सों में बाल विवाह एक खामोश महामारी की तरह फैला है। जेएसएलपीएस के बीपीएम धीरेंद्र मोहन के अनुसार, बाल विवाह केवल एक व्यक्तिगत मामला नहीं है, बल्कि यह पूरे समाज की प्रगति को रोकने वाली एक बेड़ी है। जब हम एक बच्ची को शिक्षित करते हैं, तो हम एक पूरी पीढ़ी को शिक्षित करते हैं। इसलिए 2030 का लक्ष्य मात्र एक अंक नहीं, बल्कि आने वाली पीढ़ी के लिए एक बेहतर रांची बनाने का वादा है।
शपथ और भविष्य की राह
कार्यशाला के समापन पर सभी अधिकारियों, स्वयंसेवकों और ग्रामीणों ने एक साथ मिलकर बाल विवाह न करने और न होने देने की शपथ ली। इस कार्यक्रम को सफल बनाने में सुगीता टोप्पो और ललिता देवी जैसी क्षेत्रीय कार्यकर्ताओं ने अहम भूमिका निभाई है। अगर आप भी अपने आस-पास ऐसी किसी घटना की जानकारी पाते हैं, तो प्रशासन या स्थानीय पुलिस को सूचित करना आपकी नागरिक जिम्मेदारी है। बदलाव की शुरुआत हमेशा खुद के घर और मोहल्ले से ही होती है।








