नई दिल्ली,अंग भारत। लोकसभा ने विपक्षी सदस्यों के भारी हंगामे और शोर-शराबे के बीच ‘कराधान और अन्य कानून (संशोधन) विधेयक-2026’ को बिना किसी विस्तृत चर्चा के ध्वनि मत से मंजूरी दे दी है। इस नए कानून का सीधा असर आपके डिजिटल पेमेंट के तरीकों पर पड़ सकता है, क्योंकि यह ‘पेमेंट एंड सेटलमेंट सिस्टम्स एक्ट, 2007’ में संशोधन का मार्ग प्रशस्त करता है, जिससे भविष्य में यूनिफाइड पेमेंट इंटरफेस (UPI) पर मर्चेंट डिस्काउंट रेट (MDR) लगाने का रास्ता साफ हो सकता है। इसके अतिरिक्त, इस विधेयक में विदेशी निवेशकों को टैक्स रियायत देने वाले जून के अध्यादेश को वापस लेने, ‘फाइनेंस एक्ट 2026’ और ‘इनकम टैक्स एक्ट 2025’ में महत्वपूर्ण संशोधन करने का प्रस्ताव भी शामिल किया गया है।
यूपीआई पर एमडीआर चार्ज
आज के समय में भारत की एक बहुत बड़ी आबादी रोजमर्रा के लेन-देन के लिए पूरी तरह यूपीआई पर निर्भर है। अभी तक यह सेवा उपभोक्ताओं और छोटे दुकानदारों के लिए लगभग पूरी तरह मुफ्त रही है। लेकिन ‘पेमेंट एंड सेटलमेंट सिस्टम्स एक्ट, 2007’ में बदलाव होने के बाद यह स्थिति बदल सकती है।
सरल शब्दों में कहें तो मर्चेंट डिस्काउंट रेट (MDR) वह शुल्क होता है जो डिजिटल लेन-देन को प्रोसेस करने के लिए बैंकों और पेमेंट कंपनियों द्वारा वसूला जाता है। अब तक सरकार ने डिजिटल भुगतान को बढ़ावा देने के लिए इसे शून्य कर रखा था। नए संशोधनों के जरिए सरकार को यह कानूनी अधिकार मिल जाएगा कि वह इस शुल्क को दोबारा व्यवस्थित या लागू कर सके। हालांकि, इस बात को लेकर अभी बाजार में संशय है कि क्या इसका सीधा बोझ आम ग्राहकों की जेब पर पड़ेगा या फिर इसे केवल बड़े व्यापारियों तक ही सीमित रखा जाएगा। छोटे व्यापारियों के बीच इसे लेकर चिंता स्वाभाविक है, क्योंकि इससे उनके मुनाफे पर सीधा असर पड़ सकता है।
कानून के प्रमुख प्रावधान
इस कराधान विधेयक में केवल डिजिटल पेमेंट ही नहीं, बल्कि देश के पूरे टैक्स और निवेश ढांचे को प्रभावित करने वाले कई प्रावधान शामिल हैं। नीचे दी गई तालिका से आप इस विधेयक के मुख्य उद्देश्यों और परिवर्तनों को आसानी से समझ सकते हैं:
| संबंधित कानून और विषय | प्रस्तावित संशोधन और प्रभाव |
|---|---|
| पेमेंट एंड सेटलमेंट सिस्टम्स एक्ट, 2007 | यूपीआई ट्रांजैक्शन पर मर्चेंट डिस्काउंट रेट (MDR) की व्यवस्था को कानूनी आधार देना। |
| जून का अध्यादेश (रद्दीकरण) | विदेशी निवेशकों को टैक्स में दी गई अस्थाई छूट को वापस लेना और इसे मुख्य कानून में शामिल करना। |
| इनकम टैक्स एक्ट 2025 | टैक्स के पुराने नियमों को सुसंगत बनाना ताकि करदाता और विभाग के बीच विवाद कम हों। |
| फाइनेंस एक्ट 2026 | उभरते हुए डिजिटल क्षेत्रों और इलेक्ट्रॉनिक्स विनिर्माण के लिए नई प्रोत्साहन योजनाएं लागू करना। |
विदेशी निवेश पर असर
विधेयक के पारित होने से जून में जारी किया गया वह अध्यादेश समाप्त हो जाएगा, जिसने विदेशी निवेशकों को टैक्स में विशेष रियायतें प्रदान की थीं। सरकार का इरादा किसी भी अस्थाई अध्यादेश के बजाय एक सुव्यवस्थित और स्थाई टैक्स पॉलिसी के माध्यम से विदेशी फंडों का प्रबंधन करने का है।
इस बदलाव के कारण विदेशी संस्थागत निवेशकों (FIIs) की कर देनदारियों में कुछ बदलाव देखने को मिल सकते हैं। वित्त मंत्रालय का मानना है कि इससे टैक्स प्रणाली अधिक पारदर्शी बनेगी, जिससे विदेशी कंपनियां बिना किसी कानूनी अनिश्चितता के लंबे समय के लिए भारत में अपना निवेश सुरक्षित रख सकेंगी।
सरकार का मुख्य उद्देश्य
केंद्रीय वित्त मंत्री सीतारमण ने मंगलवार को जब इस विधेयक को लोकसभा के पटल पर रखा, तो उन्होंने इसके पीछे छिपे आर्थिक विजन को साफ तौर पर साझा किया था। उनके अनुसार, देश की अर्थव्यवस्था को नई दिशा देने के लिए कर प्रणाली में सुधार करना बेहद जरूरी था।
“सरकार का ‘कराधान और अन्य कानून (संशोधन) विधेयक-2026’ लाने का मकसद देश के कर प्रणाली में बड़े बदलाव का प्रस्ताव है। इसका उद्देश्य विनिर्माण को बढ़ावा देना, विदेशी निवेश आकर्षित करना एवं इलेक्ट्रॉनिक्स विनिर्माण और डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर जैसे उभरते सेक्टर को सपोर्ट करना है। इसके साथ ही फंड मैनेजमेंट के नियमों को आसान बनाना, टैक्स इंसेंटिव बढ़ाना और कुछ खास विदेशी संस्थाओं को छूट देना भी इसके मूल उद्देश्यों में शामिल है।”
सरकार का ध्यान इस बात पर है कि भारत को इलेक्ट्रॉनिक्स और डिजिटल मैन्युफैक्चरिंग का वैश्विक हब बनाया जाए। टैक्स इंसेंटिव और आसान फंड मैनेजमेंट के जरिए घरेलू उद्योगों को वैश्विक बाजार में प्रतिस्पर्धा करने की ताकत मिलेगी।
विपक्ष का भारी हंगामा
इस विधेयक के पारित होने की प्रक्रिया संसद में काफी हंगामेदार रही। विपक्षी दलों का तर्क था कि इतने महत्वपूर्ण विधेयक को बिना किसी गंभीर संसदीय बहस के पारित करना ठीक नहीं है। विपक्ष ने मांग की थी कि यूपीआई पर शुल्क लगाने से जुड़े प्रावधानों पर विस्तार से चर्चा होनी चाहिए, क्योंकि यह सीधे तौर पर देश के गरीब और मध्यम वर्ग को प्रभावित करता है।
सदन में विपक्षी सदस्यों द्वारा लाए गए कई संशोधनों के प्रस्तावों को सत्तापक्ष ने खारिज कर दिया और विधेयक को ध्वनि मत से पारित करा लिया। विपक्ष के विरोध के बावजूद, सरकार का मानना है कि यह संशोधन देश के कर ढांचे को भविष्य की चुनौतियों के अनुकूल बनाने के लिए बहुत जरूरी था।








