भागलपुर,अंग भारत। विश्व प्रसिद्ध श्रावणी मेले के दौरान सुल्तानगंज से देवघर के बीच बने कच्ची कांवरिया पथ पर इस समय आस्था का एक ऐसा सैलाब उमड़ा है, जिसे देखकर हर कोई हैरान है। सुल्तानगंज की उत्तरवाहिनी गंगा से पवित्र जल उठाकर बाबा बैद्यनाथ धाम की ओर बढ़ने वाले लाखों श्रद्धालुओं के बीच इस बार कोलकाता के काशीपुर से आए शिवभक्तों का एक विशेष जत्था आकर्षण का सबसे बड़ा केंद्र बना हुआ है। इस जत्थे का नेतृत्व कर रहे शिवभक्त रघुनाथ राय और उनके साथी अपने कंधे पर कोई साधारण कांवड़ नहीं, बल्कि उज्जैन के महाकालेश्वर की दिव्य प्रतिमा और 100 लीटर गंगाजल से भरे विशालकाय तिरंगे कलश से सजी 300 किलोग्राम वजनी अनोखी कांवड़ लेकर चल रहे हैं। ‘बोल बम’ और ‘हर-हर महादेव’ के नारों के बीच गुजरती यह कांवड़ न केवल लोगों की धार्मिक आस्था को बढ़ा रही है, बल्कि देशभक्ति के रंग में भी सराबोर कर रही है।
अनोखी कांवड़ का सच
इस अनोखी कांवड़ को देखने के लिए कांवरिया पथ पर श्रद्धालुओं की भारी भीड़ जुट रही है। यह कांवड़ अपनी भव्यता और सुंदर बनावट के कारण इस वर्ष के पूरे श्रावणी मेले की सबसे चर्चित कांवड़ बन चुकी है। कोलकाता के काशीपुर के रहने वाले रघुनाथ राय और उनके करीब 25 से 30 सहयोगियों ने मिलकर इस पूरी योजना को धरातल पर उतारा है। इस कांवड़ को देखने से साफ पता चलता है कि इसे तैयार करने में कितनी गहरी श्रद्धा और बारीक कारीगरी का इस्तेमाल किया गया है।
वजन और निर्माण
इस विशालकाय कांवड़ को तैयार करना कोई आसान काम नहीं था। रघुनाथ राय के मुताबिक, इसे बनाने में बांस, मटकी, मजबूत रस्सी, लोहे के तार और कई अन्य सजावटी सामग्रियों का उपयोग किया गया है। इसके निर्माण से जुड़ी मुख्य बातें इस प्रकार हैं:
- कुल वजन: लगभग 300 किलोग्राम।
- निर्माण समय: इस पूरी कांवड़ को हाथ से तैयार करने में करीब तीन महीने का लंबा वक्त लगा है।
- कलश की क्षमता: इसमें 100 लीटर क्षमता वाला एक विशाल कलश लगाया गया है, जिसमें गंगाजल भरा है।
- असेम्बलिंग की मेहनत: कांवड़ के इस भारी-भरकम ढांचे को खड़ा करने के लिए जत्थे के करीब 20 लोगों ने लगातार तीन दिनों तक कड़ी मेहनत की, तब जाकर यह स्वरूप सामने आया।
कैसे चलती है यात्रा
300 किलो की कांवड़ को लेकर पैदल चलना इंसानी शारीरिक सीमाओं को चुनौती देने जैसा है। सुल्तानगंज से बाबा बैद्यनाथ धाम की दूरी लगभग 105 किलोमीटर है, और यह पूरा मार्ग रेतीला, पथरीला और उतार-चढ़ाव से भरा हुआ है। इस कठिन रास्ते पर इस भारी वजन को संभालना किसी चमत्कार से कम नहीं है।
भक्तों का पूरा दल
इस कठिन यात्रा को सफल बनाने के लिए रघुनाथ राय के साथ कोलकाता से आए 25 से 30 शिवभक्तों की टोली लगातार सक्रिय है। चूंकि कांवड़ का वजन बहुत ज्यादा है, इसलिए इसे कोई एक व्यक्ति अकेले नहीं उठा सकता। इसे उठाने के लिए एक समय में कम से कम चार मजबूत कंधों की जरूरत पड़ती है। जत्थे के सदस्य बारी-बारी से अपने कंधे बदलते हैं ताकि कोई भी थके नहीं और यात्रा बिना रुके आगे बढ़ती रहे। जत्थे के वरिष्ठ सदस्य बबाई ने अपनी पुरानी यादें साझा करते हुए बताया कि वे लोग पिछले 15 सालों से लगातार इस पावन मार्ग पर कांवड़ यात्रा कर रहे हैं। पहले के वर्षों में वे आम श्रद्धालुओं की तरह सामान्य कांवड़ लेकर आते थे। लेकिन साल 2024 में उन्होंने कुछ अलग करने का फैसला किया और इस विशाल कलश वाली कांवड़ यात्रा की शुरुआत की।
आगे का पूरा रूट
इस जत्थे की यात्रा सिर्फ बाबा बैद्यनाथ धाम तक ही सीमित नहीं है, बल्कि इनका पूरा रोडमैप तैयार है। कोलकाता के इन शिवभक्तों ने अपनी यात्रा के हर पड़ाव को बहुत ही सुनियोजित तरीके से तय किया है:
- 10 से 12 अगस्त: जत्थे का मुख्य लक्ष्य इस अवधि के दौरान देवघर पहुंचकर बाबा बैद्यनाथ का पवित्र गंगाजल से जलाभिषेक करना है।
- बासुकीनाथ धाम प्रस्थान: देवघर में पूजा-अर्चना पूरी करने के तुरंत बाद यह पूरा दल बासुकीनाथ धाम के लिए रवाना होगा, जहां वे भगवान शिव के दूसरे रूप के दर्शन करेंगे।
- 15 अगस्त (स्वतंत्रता दिवस): बासुकीनाथ के बाद यह जत्था भूतनाथ पहुंचेगा। वहां से पवित्र जल उठाकर वे बाबा तारकनाथ के दर्शन और जलाभिषेक के लिए अपनी यात्रा को आगे बढ़ाएंगे।
श्रद्धा और राष्ट्रभक्ति का मेल
इस यात्रा का सबसे खूबसूरत और भावुक करने वाला पहलू इसकी थीम है। कांवड़ पर बने 100 लीटर के विशाल कलश को भारतीय राष्ट्रध्वज तिरंगे के रंग में बेहद खूबसूरती से सजाया गया है। इसके पीछे का कारण बताते हुए बबाई और रघुनाथ राय ने कहा कि चूंकि उनकी यात्रा का एक बड़ा हिस्सा और अंतिम चरण 15 अगस्त यानी देश के स्वतंत्रता दिवस के आसपास पड़ रहा है, इसलिए उन्होंने अपनी अगाध शिवभक्ति को राष्ट्रभक्ति के साथ जोड़ने का प्रयास किया है। कांवरिया पथ पर जब यह तिरंगा कलश आगे बढ़ता है, तो वहां मौजूद हर भारतीय का सिर गर्व से ऊंचा हो जाता है। लोग न केवल इस भव्य कांवड़ के साथ तस्वीरें ले रहे हैं, बल्कि इस जत्थे के हौसले और उनकी अनूठी सोच की सराहना भी कर रहे हैं। यह यात्रा साफ संदेश देती है कि धर्म और देश अलग नहीं हैं, बल्कि एक-दूसरे के पूरक हैं।








