नई दिल्ली,अंग भारत । पश्चिम एशिया में बढ़ते सैन्य तनाव के कारण अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में भारी उछाल आया है। स्ट्रेट ऑफ हॉर्मुज के जरिए होने वाली सप्लाई प्रभावित होने और प्रमुख ओपेक प्लस देशों द्वारा उत्पादन में कटौती के फैसले से ब्रेंट क्रूड की कीमतें 119 डॉलर प्रति बैरल के स्तर को पार कर गई हैं। इस स्थिति ने भारत सहित उन सभी देशों की अर्थव्यवस्था पर दबाव बढ़ा दिया है जो अपनी ऊर्जा जरूरतों के लिए तेल आयात पर निर्भर हैं।
आपूर्ति का संकट
कच्चे तेल की कीमतों में आई यह अचानक वृद्धि केवल एक दिन की घटना नहीं है। पिछले सात दिनों के भीतर क्रूड की कीमतों में 55 प्रतिशत से अधिक का इजाफा दर्ज किया गया है। ओपेक प्लस के सदस्य देश इराक ने अपने तीन प्रमुख दक्षिणी ऑयल फील्ड्स से तेल उत्पादन को 70 प्रतिशत तक घटा दिया है। पहले इन क्षेत्रों से रोजाना 43 लाख बैरल तेल निकाला जाता था, जो अब घटकर केवल 13 लाख बैरल रह गया है।
इसके साथ ही कुवैत ने भी उत्पादन घटाने की घोषणा की है, जिससे वैश्विक बाजार में आपूर्ति की किल्लत और गंभीर हो गई है। बाजार के आंकड़े दर्शाते हैं कि क्रूड की कीमतों में आई तेजी के प्रमुख बिंदु निम्नलिखित हैं:
- ब्रेंट क्रूड: 119.14 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंचा।
- डब्ल्यूटीआई (WTI) क्रूड: 119.48 डॉलर प्रति बैरल के उच्च स्तर को छुआ।
- उत्पादन कटौती: इराक के तीन प्रमुख तेल क्षेत्रों में 30 लाख बैरल प्रतिदिन की कमी।
- वैश्विक असर: 25 प्रतिशत तक की इंट्राडे उछाल।
इंफ्रास्ट्रक्चर पर हमले
कीमतों में उबाल आने का एक बड़ा कारण तेल इंफ्रास्ट्रक्चर पर हो रहे लगातार हमले हैं। सैन्य टकराव के चलते अमेरिका और इजराइल ने तेहरान के तेल डिपो, स्टोरेज टैंकर्स और पेट्रोलियम ट्रांसफर टर्मिनल को निशाना बनाया है। जवाब में ईरान ने संयुक्त अरब अमीरात, कुवैत और बहरीन के तेल प्रतिष्ठानों पर ड्रोन और मिसाइल हमले किए हैं। इन हमलों ने न केवल तेल उत्पादन को बाधित किया है, बल्कि तेल टैंकरों के बीमा प्रीमियम और ढुलाई की लागत में भी अत्यधिक वृद्धि कर दी है।
भू-राजनीतिक तनाव के कारण कच्चे तेल की आपूर्ति श्रृंखला का बाधित होना वैश्विक ऊर्जा सुरक्षा के लिए एक गंभीर चुनौती बन चुका है, जिसका सीधा प्रभाव एशियाई अर्थव्यवस्थाओं पर दिख रहा है।
भारत पर असर
भारत अपनी कुल कच्चे तेल की जरूरत का लगभग 80 प्रतिशत हिस्सा विदेशों से आयात करता है। अंतरराष्ट्रीय कीमतों में तेजी का अर्थ है कि देश का इंपोर्ट बिल सीधा बढ़ जाएगा। जब भारत महंगा कच्चा तेल खरीदता है, तो उसके विदेशी मुद्रा भंडार (फॉरेक्स रिजर्व) पर भारी दबाव पड़ता है और रुपया कमजोर होने की आशंका बढ़ जाती है।
| विवरण | आंकड़ा/प्रभाव |
|---|---|
| भारत की आयात निर्भरता | 80 प्रतिशत |
| जापान की आयात निर्भरता | 90 प्रतिशत (मिडिल ईस्ट से) |
| राजकोषीय घाटा | तेल आयात बिल बढ़ने से बढ़ने की संभावना |
यदि कच्चे तेल की कीमतें लंबे समय तक इसी ऊंचे स्तर पर बनी रहीं, तो भारत में पेट्रोल, डीजल और अन्य पेट्रोलियम उत्पादों की खुदरा कीमतों में बढ़ोतरी होना तय है। हालांकि सरकार ने स्पष्ट किया है कि वर्तमान में देश में पेट्रोलियम का पर्याप्त भंडार मौजूद है, लेकिन अंतरराष्ट्रीय बाजार की अस्थिरता का असर राजकोषीय घाटे और मुद्रास्फीति पर पड़ना अनिवार्य है। चीन ने भी अपनी घरेलू कीमतों को स्थिर रखने के लिए कच्चे तेल के निर्यात में कटौती की है, जिससे वैश्विक स्तर पर तेल का संकट और गहरा गया है। अब पूरी दुनिया की नजरें इस बात पर टिकी हैं कि पश्चिम एशिया का यह तनाव कब तक थमता है और क्या ओपेक प्लस देश आपूर्ति को सामान्य करने के लिए कोई नया कदम उठाते हैं।








