तेहरान/वाशिगटन,अंग भारत। ईरान और इजराइल के बीच जारी खूनी संघर्ष आज 13वें दिन में प्रवेश कर चुका है, जिसने न केवल पश्चिम एशिया की भौगोलिक सीमाओं को बल्कि वैश्विक स्थिरता को भी हिलाकर रख दिया है। इस गंभीर संकट को थामने के लिए ईरानी राष्ट्रपति मसूद पेजेशकियन ने अंतरराष्ट्रीय मंच पर तीन प्रमुख शर्तें पेश की हैं, जो इस युद्ध की दिशा तय करने में निर्णायक हो सकती हैं। ये शर्तें हैं: ईरान के कानूनी अधिकारों को पूर्ण मान्यता, युद्ध से हुए नुकसान की भरपाई और भविष्य में किसी भी प्रकार के सैन्य हमले न होने की पुख्ता अंतरराष्ट्रीय गारंटी। यदि इन शर्तों पर सहमति बनती है, तो ईरान तत्काल प्रभाव से युद्धविराम के लिए तैयार है, हालांकि इस स्थिति को ईरान की कमजोरी समझने की भूल करना विनाशकारी साबित हो सकता है।
युद्ध का वर्तमान परिदृश्य
फारस की खाड़ी के देशों तक फैल चुका यह संघर्ष अब एक खतरनाक मोड़ पर है। पिछले दो सप्ताहों में दोनों तरफ से हुए ताबड़तोड़ हमलों ने मध्य पूर्व में मानवीय और आर्थिक संकट पैदा कर दिया है। क्षेत्र के हालात बदतर होते जा रहे हैं और वैश्विक शक्तियों की चिंताएं बढ़ती जा रही हैं। कूटनीतिक गलियारों में बातचीत की कोशिशें हो रही हैं, लेकिन जमीनी हकीकत कुछ और ही बयां कर रही है।
ट्रंप का सख्त रुख
केंटकी में एक जनसभा को संबोधित करते हुए अमेरिका के नवनिर्वाचित राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने अपने तेवर साफ कर दिए हैं। ट्रंप ने स्पष्ट किया कि ईरान के साथ जारी इस जंग में अमेरिका फिलहाल जीत की स्थिति में है, लेकिन उनका ‘मिशन’ तब तक पूरा नहीं माना जाएगा जब तक कि अंतिम लक्ष्य हासिल नहीं हो जाता। उनके बयानों से यह संकेत मिलता है कि फिलहाल युद्ध रुकने की संभावना बेहद कम है। अमेरिका का यह तल्ख रुख शांति वार्ता की राह में सबसे बड़ी बाधा बना हुआ है।
ईरान की तीन शर्तें
अल जजीरा न्यूज चैनल की रिपोर्ट के अनुसार, राष्ट्रपति मसूद पेजेशकियन ने अपनी इन शर्तों को शांति का एकमात्र रास्ता बताया है। इन शर्तों का विवरण निम्नलिखित है:
- कानूनी अधिकारों की मान्यता: ईरान अपनी संप्रभुता और क्षेत्रीय अधिकारों को लेकर कोई समझौता करने को तैयार नहीं है।
- नुकसान की भरपाई: युद्ध के कारण ईरान की अर्थव्यवस्था और बुनियादी ढांचे को जो नुकसान हुआ है, उसकी जवाबदेही तय होनी चाहिए।
- सुरक्षा की गारंटी: भविष्य में दोबारा ऐसी आक्रामकता न हो, इसके लिए एक अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बाध्यकारी सुरक्षा गारंटी आवश्यक है।
युद्ध की भारी कीमत
युद्ध केवल जान-माल का नुकसान नहीं करता, बल्कि यह राष्ट्रों की अर्थव्यवस्थाओं को भी खोखला कर देता है। अमेरिकी रक्षा विभाग, पेंटागन द्वारा अमेरिकी संसद को दी गई जानकारी के अनुसार, इस संघर्ष के पहले छह दिनों में ही अमेरिका को भारी वित्तीय बोझ उठाना पड़ा है।
| खर्च का विवरण | राशि (अनुमानित) |
|---|---|
| कुल खर्च (शुरुआती 6 दिन) | 11.3 अरब डॉलर |
| हथियार और गोला-बारूद | 5 अरब डॉलर |
उपरोक्त आंकड़े दर्शाते हैं कि केवल हथियारों के जखीरे को चालू रखने में 45 हजार करोड़ रुपये से अधिक की राशि पानी की तरह बहा दी गई। कुल मिलाकर 1 लाख करोड़ रुपये का खर्च महज छह दिनों के भीतर होना इस बात का प्रमाण है कि यह युद्ध कितनी भीषण तबाही की ओर बढ़ रहा है।
क्या शांति संभव है?
राष्ट्रपति मसूद पेजेशकियन का कहना है कि बातचीत की मेज पर वापस लौटना ईरान की कमजोरी नहीं है, बल्कि यह जिम्मेदारी का अहसास है। हालांकि, जब तक डोनाल्ड ट्रंप का ‘मिशन पूरा होने’ वाला रुख बरकरार है, तब तक कूटनीति के लिए बहुत कम जगह बचती है। दुनिया के तमाम देश अब इस बात पर नजर गड़ाए हुए हैं कि क्या अमेरिका और ईरान इन शर्तों पर किसी बीच का रास्ता ढूंढ पाएंगे या फिर पश्चिम एशिया में अस्थिरता का यह दौर और लंबा खिंचेगा। फिलहाल, आम जनता इस विनाशकारी खेल में पिस रही है और शांति की उम्मीदें बेहद धुंधली दिखाई दे रही हैं।








