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नेपाल की पहली महिला ट्रांसजेंडर सांसद बनी भूमिका श्रेष्ठ

काठमांडू,अंग भारत। भूमिका श्रेष्ठ ने नेपाल की पहली महिला ट्रांसजेंडर सांसद बनकर इतिहास के पन्नों में अपनी जगह पक्की कर ली है। राष्ट्रीय स्वतन्त्र पार्टी द्वारा उन्हें समानुपातिक सूची (Proportional Representation) से सांसद के रूप में नामित किया गया है, जिसकी पुष्टि निर्वाचन आयोग ने अपनी सार्वजनिक सूची के माध्यम से की। यह केवल एक राजनीतिक नियुक्ति नहीं, बल्कि दक्षिण एशिया में मानवाधिकारों और समावेशी राजनीति के लिए एक मील का पत्थर है। नेपाल ने 2008 में सुनिल बाबू पंत को एशिया के पहले समलैंगिक सांसद के रूप में चुनकर विश्व स्तर पर अपनी उदारता दिखाई थी, लेकिन ‘महिला ट्रांसजेंडर’ के रूप में भूमिका का संसद तक पहुँचना लैंगिक पहचान की लड़ाई में एक नया और बड़ा कदम है।

संघर्ष से संसद तक

भूमिका श्रेष्ठ का सफर बेहद चुनौतीपूर्ण रहा है। 1987 में काठमांडू के नैकाप में जन्मीं भूमिका के लिए उनका शुरुआती जीवन संघर्षों से भरा था। जन्म के समय उनका नाम कैलाश था, लेकिन उनकी आंतरिक पहचान और संवेदनाएं हमेशा से एक महिला की थीं। समाज और स्कूल में होने वाले भेदभाव और अपमान के कारण उन्हें नौवीं कक्षा के बाद ही अपनी औपचारिक पढ़ाई बीच में ही छोड़नी पड़ी। यह वह दौर था जब ट्रांसजेंडर समुदाय को समाज में स्वीकार्यता तो दूर, एक बुनियादी पहचान मिलना भी लगभग नामुमकिन था।

कानूनी मान्यता की लड़ाई

भूमिका की कानूनी लड़ाई किसी प्रेरणा से कम नहीं है। उन्होंने 2005 में काठमांडू जिला प्रशासन कार्यालय से ‘कैलाश श्रेष्ठ’ नाम के साथ अपनी नागरिकता हासिल की थी, जिसमें उनका लिंग ‘अन्य’ अंकित था। हालांकि, उन्होंने केवल इसी पर संतोष नहीं किया। उन्होंने अपनी महिला पहचान को कानूनी वैधता दिलाने के लिए सालों तक संघर्ष किया।

  • 5 अप्रैल 2021 को मंत्रिपरिषद ने उनके पक्ष में निर्णय लिया।
  • उनकी नागरिकता में नाम बदलकर ‘भूमिका श्रेष्ठ’ किया गया।
  • लिंग को आधिकारिक रूप से ‘महिला’ के रूप में दर्ज किया गया।

यह नेपाल के कानून में ट्रांसजेंडर अधिकारों के लिए एक ऐतिहासिक बदलाव था। उन्होंने न केवल अपने लिए बल्कि आने वाली पीढ़ी के लिए कानूनी दरवाजे खोले।

ब्लू डायमंड सोसाइटी

भूमिका की सक्रियता का केंद्र ‘ब्लू डायमंड सोसाइटी’ रही है। यहाँ जुड़कर उन्होंने लैंगिक और यौनिक अल्पसंख्यक समुदाय के हक में आवाज बुलंद की। उनकी इसी निडरता और सामाजिक सेवा के कारण, उन्हें एक अंतरराष्ट्रीय संस्था द्वारा दुनिया के शीर्ष 100 प्रभावशाली युवाओं की सूची में भी शामिल किया गया था। उन्होंने अपने जीवन संघर्षों को ‘भूमिका: तेस्रो लिगीको आत्मकथा’ नामक पुस्तक के माध्यम से लिपिबद्ध किया है, जो आज कई लोगों के लिए साहस का प्रतीक है।

संवैधानिक अधिकारों का क्रियान्वयन

संसद पहुँचने के बाद, भूमिका का लक्ष्य स्पष्ट है। वे मानती हैं कि नेपाल के संविधान की धारा 12, 18 और 42 में लैंगिक अल्पसंख्यकों के अधिकारों का जिक्र तो है, लेकिन जमीनी हकीकत आज भी अलग है। उनका कहना है कि कानूनों के होने से ज्यादा जरूरी उनका पूर्ण रूप से कार्यान्वयन है। उनके अनुसार, समाज में अभी भी सोच बदलने की सख्त जरूरत है।

“जब हम खुद निर्णय लेने की जगह पर पहुंचेंगे, तभी हमारे मुद्दे प्रभावी ढंग से उठ पाएंगे।” – भूमिका श्रेष्ठ

सभी वर्गों की आवाज

भूमिका का एजेंडा केवल ट्रांसजेंडर समुदाय तक सीमित नहीं है। उन्होंने स्पष्ट किया है कि वे संसद में मधेसी, मुस्लिम, आदिवासी जनजाति और दिव्यांगों सहित उन सभी वर्गों की आवाज बनेंगी जिन्हें समाज में हाशिये पर धकेल दिया गया है। उनका मानना है कि हर समुदाय के भीतर लैंगिक अल्पसंख्यक मौजूद हैं, और उनकी लड़ाई एक समावेशी समाज के निर्माण की है।

बदलते नेपाल की तस्वीर

भूमिका श्रेष्ठ की नियुक्ति यह साबित करती है कि नेपाल का राजनीतिक परिदृश्य अब अधिक परिपक्व और समावेशी हो रहा है। संसद में उनकी उपस्थिति लैंगिक न्याय के प्रति एक बड़ा भरोसा पैदा करती है। एक ऐसा व्यक्ति जो कभी भेदभाव के कारण स्कूल छोड़ने पर मजबूर था, आज वह देश की नीतियों को दिशा देने वाली कुर्सी पर बैठा है। यह न केवल भूमिका की व्यक्तिगत जीत है, बल्कि नेपाल के लोकतंत्र की एक गौरवशाली उपलब्धि भी है।

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अंग भारत • रिपोर्टर

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