नई दिल्ली,अंग भारत। संसद के उच्च सदन में शुक्रवार को एक ऐतिहासिक घटनाक्रम हुआ, जिसमें हरिवंश नारायण सिंह को लगातार तीसरी बार राज्यसभा का उपसभापति निर्विरोध चुन लिया गया। इस बार की सबसे बड़ी खबर यह रही कि विपक्ष ने उनके खिलाफ कोई भी उम्मीदवार मैदान में नहीं उतारा, जिससे यह चुनाव एक औपचारिकता बनकर रह गया। यह घटना न केवल हरिवंश के व्यक्तिगत कद को दर्शाती है, बल्कि संसदीय राजनीति में आम सहमति की एक दुर्लभ मिसाल भी पेश करती है।
तीसरी बार ऐतिहासिक जीत
हरिवंश का राज्यसभा उपसभापति पद पर लगातार तीसरी बार चुना जाना भारतीय संसदीय इतिहास में एक दुर्लभ रिकॉर्ड है। इससे पहले बहुत कम ही ऐसा हुआ है कि किसी सदस्य को इस महत्वपूर्ण जिम्मेदारी के लिए लगातार तीन बार चुना गया हो। उनका निर्विरोध निर्वाचन यह साबित करता है कि सदन के भीतर सभी राजनीतिक धड़ों के बीच उनके व्यक्तित्व और कार्यशैली को लेकर एक तरह की स्वीकार्यता बनी हुई है।
- सदन में सर्वसम्मति की जीत।
- उपसभापति पद की निरंतरता।
- राजनीतिक संतुलन का प्रतीक।
नड्डा और खरगे की भूमिका
जब हरिवंश के नाम का प्रस्ताव रखा गया, तो सदन में एक सुखद नज़ारा देखने को मिला। सदन के नेता जगत प्रकाश नड्डा और विपक्ष के नेता मल्लिकार्जुन खरगे, दोनों ने मिलकर हरिवंश को उनके आसन तक पहुंचाया। यह क्षण लोकतंत्र की उस खूबसूरती को दिखाता है जहाँ वैचारिक मतभेद के बावजूद, संसदीय गरिमा को प्राथमिकता दी जाती है। इस औपचारिक प्रक्रिया के बाद हरिवंश ने उपसभापति की कुर्सी संभाली और कार्यवाही आगे बढ़ाई।
पीएम और विपक्ष की बधाई
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इस अवसर पर हरिवंश के पिछले कार्यकालों के दौरान उनके संयम और अनुभव की जमकर तारीफ की। उन्होंने कहा कि सदन चलाने में हरिवंश की सूझबूझ हमेशा काम आई है। वहीं, विपक्ष के नेता मल्लिकार्जुन खरगे ने भी उन्हें शुभकामनाएं दीं। खरगे का रुख स्पष्ट था—उन्होंने उम्मीद जताई कि उपसभापति के पद पर बैठा व्यक्ति निष्पक्ष रहेगा और विपक्ष को अपनी बात रखने के लिए पर्याप्त समय और मंच उपलब्ध कराएगा।
लोकतांत्रिक संतुलन की मांग
खरगे ने बधाई के साथ-साथ एक बड़ा मुद्दा भी सदन के पटल पर रखा। उन्होंने याद दिलाया कि लोकसभा में उपाध्यक्ष का पद वर्ष 2019 से खाली पड़ा है। उन्होंने सरकार को घेरा कि संवैधानिक पदों का इस तरह लंबे समय तक रिक्त रहना स्वस्थ लोकतांत्रिक परंपराओं के अनुकूल नहीं है। उनका यह बयान बताता है कि सत्ता और विपक्ष के बीच का यह रिश्ता कितना पेचीदा है, जहाँ बधाई देने के साथ-साथ सरकार से जवाब मांगने का मौका भी नहीं छोड़ा जाता।
भविष्य की बड़ी चुनौतियां
सदन की गरिमा और परंपरा को बचाए रखना आने वाले दिनों में हरिवंश के लिए सबसे बड़ी चुनौती होगी। आज की राजनीति में सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच का तनाव अक्सर सदन की कार्यवाही को ठप कर देता है। ऐसे में एक उपसभापति की भूमिका सिर्फ आसन पर बैठने तक सीमित नहीं रह जाती, बल्कि उसे एक ‘सहमति निर्माता’ (Consensus builder) की भूमिका भी निभानी पड़ती है।
“संसदीय लोकतंत्र की असली मजबूती इसी बात में है कि सदन का हर सदस्य अपनी बात रख सके, और उपसभापति का पद इस अभिव्यक्ति को सुरक्षित रखने का मुख्य आधार है।”
निष्पक्षता और सदन संचालन
राजनीतिक जानकारों का मानना है कि हरिवंश की कार्यशैली काफी शांत और गंभीर है, जो राज्यसभा जैसे सदन के लिए बहुत जरूरी है। राज्यसभा, जिसे हाउस ऑफ एल्डर्स कहा जाता है, वहाँ शोर-शराबे की तुलना में तार्किक चर्चा को ज्यादा तवज्जो दी जाती है। आने वाले समय में, जब देश के महत्वपूर्ण बिलों पर चर्चा होगी, तो हरिवंश की परीक्षा इसी बात से होगी कि वे कितनी कुशलता से सत्ता और विपक्ष के बीच की खाई को पाट पाते हैं।
अंत में, यह चुनाव केवल एक पद की नियुक्ति नहीं, बल्कि एक भरोसा है जो सदन ने उन पर फिर से जताया है। अब देखना यह होगा कि क्या वे अपने इस कार्यकाल में सदन की कार्यवाही को और अधिक सार्थक और उत्पादक बना पाते हैं या नहीं।








