काठमांडू,अंग भारत| नेपाल के राष्ट्रपति रामचंद्र पौडेल ने संवैधानिक परिषद (संशोधन) अध्यादेश को मंगलवार को आधिकारिक मंजूरी दे दी है, जिसके बाद देश की उच्च स्तरीय नियुक्तियों की प्रक्रिया में बड़ा बदलाव आने वाला है। पहले इस अध्यादेश को राष्ट्रपति भवन से पुनर्विचार के लिए सरकार के पास लौटा दिया गया था, लेकिन सरकार ने अपनी सिफारिशों को अडिग रखते हुए इसे बिना किसी बदलाव के दोबारा राष्ट्रपति के पास भेजा, जिसके बाद अब इसे कानूनी रूप से लागू कर दिया गया है।
अध्यादेश की पृष्ठभूमि
सरकार द्वारा हाल ही में आठ अलग-अलग अध्यादेशों का एक समूह राष्ट्रपति के पास मंजूरी के लिए भेजा गया था। इनमें से सात अध्यादेशों पर राष्ट्रपति रामचंद्र पौडेल ने तुरंत सहमति दे दी थी, लेकिन संवैधानिक परिषद से संबंधित अध्यादेश पर उन्होंने अपनी आपत्ति दर्ज कराई थी। राष्ट्रपति का मानना था कि संवैधानिक परिषद की निर्णय प्रक्रिया में बदलाव संविधान की मूल भावना, विशेषकर ‘बहुमत प्रणाली’ के खिलाफ जा सकता है। उन्होंने यह भी संकेत दिया था कि संसद के विधायी कार्यों और सरकारी अध्यादेशों के बीच एक संतुलन होना चाहिए।
क्यों लौटाया गया था
राष्ट्रपति रामचंद्र पौडेल ने शुरुआती आपत्तियों में यह तर्क दिया था कि संवैधानिक परिषद के निर्णयों में सर्वसम्मति की संस्कृति को प्राथमिकता दी जानी चाहिए। सरकार द्वारा सुझाया गया नया बदलाव परिषद के कामकाज में ‘बहुमत’ को अधिक महत्व देता है, जिसे लेकर राष्ट्रपति कार्यालय को संवैधानिक विरोधाभासों की चिंता थी। हालांकि, सोमवार को हुई मंत्रिपरिषद की बैठक में सरकार ने स्पष्ट किया कि संवैधानिक रिक्तियों को भरने और शासन को गति देने के लिए इस अध्यादेश को लागू करना अपरिहार्य है।
बैठक के नए नियम
नए अध्यादेश के आने के बाद, अब संवैधानिक परिषद की बैठकों के लिए कोरम (गणपूर्ति) के नियमों में बदलाव आया है। अब परिषद की बैठक तभी वैध मानी जाएगी जब कम से कम चार सदस्य उपस्थित हों। इससे पहले की व्यवस्था में कई बार सदस्यों की अनुपस्थिति के कारण महत्वपूर्ण बैठकें टल जाती थीं, जिससे संवैधानिक संस्थाओं में नियुक्तियां अटक जाती थीं।
परिषद की संरचना
नेपाल की संवैधानिक परिषद में कुल छह सदस्य होते हैं, जिनकी भूमिका देश की न्यायपालिका, चुनाव आयोग और अन्य महत्वपूर्ण निकायों के प्रमुखों को नियुक्त करने में होती है:
- प्रधानमंत्री (परिषद के अध्यक्ष)
- प्रतिनिधि सभा के अध्यक्ष
- राष्ट्रीय सभा के अध्यक्ष
- प्रधान न्यायाधीश
- प्रमुख विपक्षी दल के नेता
- प्रतिनिधि सभा के उपाध्यक्ष
प्रधानमंत्री की सफाई
नेपाल के प्रधानमंत्री बालेंद्र शाह ने राष्ट्रपति को लिखे पत्र में इस अध्यादेश की आवश्यकता को विस्तार से समझाया है। उन्होंने आश्वासन दिया है कि परिषद की बैठकें तभी बुलाई जाएंगी जब सभी सदस्यों के पद भरे हुए हों। यदि सभी सदस्यों के पद पर होने के बावजूद बैठक में पर्याप्त सदस्य उपस्थित नहीं होते, तभी चार सदस्यों की उपस्थिति का प्रावधान लागू होगा। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि ‘तत्काल बहाल’ जैसे अस्पष्ट शब्दों को हटा दिया गया है ताकि कानूनी व्याख्या को लेकर कोई संशय न रहे।
निर्णय में अध्यक्ष की शक्ति
इस अध्यादेश का सबसे महत्वपूर्ण पहलू ‘बराबर मतों’ की स्थिति से निपटना है। चूंकि परिषद में सदस्यों की संख्या छह है, इसलिए मतों का बराबर होना एक स्वाभाविक संभावना है। नए अध्यादेश के तहत:
- यदि मतदान में मतों की संख्या बराबर हो जाती है, तो अध्यक्ष यानी प्रधानमंत्री का मत निर्णायक माना जाएगा।
- यह प्रावधान सुनिश्चित करता है कि निर्णय प्रक्रिया में गतिरोध न आए।
- सरकार का मानना है कि सर्वसम्मति के प्रयास विफल होने पर, बहुमत का निर्णय ही व्यावहारिक विकल्प है।
निष्कर्ष
सरकार की दलील है कि संवैधानिक परिषद में अटकी हुई नियुक्तियों को सुचारू बनाने के लिए यह संशोधन अनिवार्य था। हालांकि राष्ट्रपति ने पहले इस पर गंभीर सवाल उठाए थे, लेकिन कैबिनेट के दोबारा प्रस्ताव भेजने के बाद संवैधानिक गरिमा के अनुरूप इसे मंजूरी मिल गई है। अब देखना यह होगा कि इस नई व्यवस्था के बाद संवैधानिक पदों पर नियुक्तियों की रफ्तार कितनी तेज होती है और राजनीतिक दलों के बीच इसे लेकर क्या प्रतिक्रिया रहती है।








