गुवाहाटी/नई दिल्ली/अंग भारत। असम और नगालैंड के बीच दशकों से विवादित सीमावर्ती इलाकों में अब ऊर्जा सुरक्षा और विकास की एक नई इबारत लिखी जाएगी। गुरुवार को केंद्र सरकार, असम और नगालैंड के बीच एक ऐतिहासिक त्रिपक्षीय समझौते (MoU) पर हस्ताक्षर किए जा रहे हैं, जिसका सीधा उद्देश्य इन क्षेत्रों में दबे कच्चे तेल और प्राकृतिक गैस के भंडारों को खोजकर देश की अर्थव्यवस्था में शामिल करना है। यह समझौता न केवल तकनीकी और औद्योगिक स्तर पर महत्वपूर्ण है, बल्कि दोनों राज्यों के बीच विश्वास बहाली की दिशा में एक साहसी कदम माना जा रहा है।
अमित शाह की मौजूदगी
नई दिल्ली में आयोजित इस औपचारिक कार्यक्रम की शोभा केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह बढ़ाएंगे। शाम 6:30 बजे गृह मंत्रालय के कार्यालय में होने वाले इस आयोजन में असम के मुख्यमंत्री डॉ. हिमंत बिस्व सरमा और नगालैंड के मुख्यमंत्री नेफ्यू रियो अपनी उपस्थिति दर्ज कराएंगे। साथ ही, केंद्रीय गृह सचिव गोविंद मोहन और दोनों राज्यों के शीर्ष प्रशासनिक अधिकारी इस प्रक्रिया को गति देने के लिए मौजूद रहेंगे। वरिष्ठ नेताओं की मौजूदगी यह साबित करती है कि केंद्र सरकार इस प्रोजेक्ट को लेकर कितनी गंभीर है और इसे राष्ट्रीय प्राथमिकता में रखा गया है।
संसाधनों के दोहन का अवसर
असम-नगालैंड का सीमावर्ती क्षेत्र भौगोलिक रूप से हाइड्रोकार्बन का खजाना माना जाता है। वर्षों तक सीमा विवाद और प्रशासनिक अनिश्चितताओं के कारण इन बेशकीमती संसाधनों का दोहन रुका रहा, जिससे न केवल राजस्व का नुकसान हुआ बल्कि स्थानीय स्तर पर रोजगार के अवसर भी सीमित रहे। अब इस समझौते के जरिए उन बाधाओं को हटाया जा रहा है जो विकास की राह में रोड़ा बनी हुई थीं। वैज्ञानिक सर्वेक्षणों के अनुसार, इन क्षेत्रों में तेल और गैस के पर्याप्त भंडार मौजूद हैं, जो सही तकनीक और निवेश मिलने पर भारत की ऊर्जा निर्भरता को कम करने में बड़ी भूमिका निभा सकते हैं।
पारदर्शी संस्थागत ढांचा
इस समझौते की सबसे बड़ी विशेषता इसका एक व्यवस्थित और पारदर्शी ढांचा है। इसके मुख्य बिंदु निम्नलिखित हैं:
- संयुक्त निगरानी तंत्र: दोनों राज्य और केंद्र मिलकर एक ऐसी संस्था बनाएंगे जो परियोजनाओं के संचालन और निगरानी पर नजर रखेगी।
- राजस्व का बंटवारा: लाभ को लेकर किसी भी तरह के विवाद से बचने के लिए स्पष्ट फॉर्मूला तय किया गया है, ताकि दोनों राज्यों को उनका उचित हक मिल सके।
- निवेश को बढ़ावा: निवेश की स्पष्ट नियमावली से बड़ी कंपनियों के लिए काम करना आसान हो जाएगा।
सीमा पर शांति का मंत्र
किसी भी विकास परियोजना के लिए कानून-व्यवस्था की रीढ़ मजबूत होना जरूरी है। इस समझौते में सुरक्षा व्यवस्था को भी केंद्र में रखा गया है। तेल और गैस निकालने वाली कंपनियों को सुरक्षा का एक अभेद्य कवच दिया जाएगा ताकि खनन प्रक्रिया में कोई बाधा न आए। जानकारों का मानना है कि यदि यह मॉडल सफल रहा, तो उत्तर-पूर्व के अन्य सीमा विवादों को सुलझाने के लिए यह एक ‘रोल मॉडल’ बन सकता है, जहां विवाद की जगह विकास को तरजीह दी जाएगी।
सहकारी संघवाद की मिसाल
यह पहल सिर्फ तेल और गैस के बारे में नहीं है, यह भारत के ‘सहकारी संघवाद’ (Cooperative Federalism) का एक जीवंत उदाहरण है। जब दो पड़ोसी राज्य एक मंच पर आकर एक साथ काम करने का संकल्प लेते हैं, तो न केवल राजनीति बदलती है, बल्कि स्थानीय जनता के लिए विकास के द्वार भी खुलते हैं।
“ऊर्जा आत्मनिर्भरता और आपसी सहयोग ही पूर्वोत्तर के विकास का असली इंजन है। यह समझौता उस दिशा में एक ऐतिहासिक मील का पत्थर साबित होगा,” – एक सरकारी सूत्र का मानना है।
आने वाले समय में, अगर ये परियोजनाएं धरातल पर तेजी से उतरती हैं, तो यह न केवल असम और नगालैंड की अर्थव्यवस्था को रफ्तार देगी, बल्कि रोजगार के नए अवसर पैदा कर क्षेत्रीय युवाओं की उम्मीदों को भी पूरा करेगी। केंद्र की नजरें अब इस बात पर टिकी हैं कि जमीनी स्तर पर इसका क्रियान्वयन कितनी जल्दी शुरू होता है।








