भुवनेश्वर,अंग भारत। राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु ने ओडिशा के सबसे महत्वपूर्ण और पारंपरिक त्योहार ‘रज पर्व’ (Raja Parba) के अवसर पर देशवासियों को शुभकामनाएं देते हुए इसे प्रकृति, मातृत्व और नारी शक्ति का महापर्व करार दिया है। अपने संदेश में उन्होंने स्पष्ट किया कि यह केवल एक उत्सव नहीं, बल्कि धरती माता के प्रति हमारी कृतज्ञता प्रकट करने का एक माध्यम है। मानसून के आगमन से ठीक पहले मनाया जाने वाला यह तीन दिवसीय पर्व ओडिशा की सांस्कृतिक पहचान का आधार है, जो समाज को एकता के सूत्र में बांधता है और विकास की राह पर आगे बढ़ने की प्रेरणा देता है।
रज पर्व का गहरा अर्थ
रज पर्व का सीधा संबंध धरती माता के मासिक चक्र और मानसून के आने से है। ओडिशा में इसे बहुत ही पवित्र माना जाता है। लोक मान्यता के अनुसार, इन तीन दिनों के दौरान धरती माता विश्राम करती हैं। राष्ट्रपति मुर्मु ने अपने संदेश में इसी पहलू पर जोर दिया कि कैसे यह परंपरा हमें प्रकृति के साथ सामंजस्य बनाकर जीने का पाठ पढ़ाती है। जब पूरी दुनिया पर्यावरणीय संकट से जूझ रही है, तब इस तरह के पारंपरिक पर्व हमें याद दिलाते हैं कि प्रकृति का सम्मान करना ही हमारे अस्तित्व की रक्षा का एकमात्र तरीका है।
परंपराएं और सामाजिक जुड़ाव
राष्ट्रपति ने विशेष रूप से उन परंपराओं का जिक्र किया जो रज पर्व को खास बनाती हैं। ये गतिविधियां आज के भागदौड़ भरे जीवन में लोगों को एक-दूसरे के करीब लाती हैं:
- पिठा का स्वाद: इस दौरान घरों में तरह-तरह के पारंपरिक ‘पिठा’ (विशेष प्रकार के व्यंजन) बनाए जाते हैं, जो परिवार और पड़ोसियों के बीच बांटे जाते हैं।
- झूलों की रौनक: गांवों से लेकर शहरों तक, पेड़ों पर झूले डाले जाते हैं। यह न केवल मनोरंजन है, बल्कि उत्सव का प्रतीक भी है।
- पान की मिठास: रज पर्व में विशेष रूप से तैयार किए गए पान के बिना यह त्योहार अधूरा माना जाता है, जो मेहमाननवाजी और आपसी प्रेम का प्रतीक है।
नारी शक्ति का सम्मान
यह पर्व महिलाओं के लिए विशेष महत्व रखता है। राष्ट्रपति मुर्मु ने महिलाओं की भूमिका पर विशेष टिप्पणी की है। उनका मानना है कि रज पर्व नारी शक्ति का उत्सव है। यह पर्व महिलाओं को विश्राम और सम्मान देने का संदेश देता है। जब हम अपनी संस्कृति में महिलाओं को इतना ऊंचा स्थान देते हैं, तो यह सीधे तौर पर एक प्रगतिशील समाज के निर्माण में मदद करता है। यह त्योहार हमें सिखाता है कि जिस प्रकार धरती के बिना जीवन संभव नहीं, उसी प्रकार समाज में महिलाओं के योगदान के बिना विकास की कल्पना नहीं की जा सकती।
विकास और सांस्कृतिक एकता
राष्ट्रपति ने अपने संदेश में सांस्कृतिक मूल्यों को राष्ट्र निर्माण से जोड़ा है। उन्होंने कहा कि भारत की असली ताकत हमारी विविधता और सांस्कृतिक परंपराओं में निहित है। रज पर्व जैसे त्योहार समाज में सकारात्मकता फैलाते हैं और भाईचारे की भावना को मजबूत करते हैं। जब लोग मिलजुलकर ऐसे पर्व मनाते हैं, तो उनके बीच आपसी विश्वास बढ़ता है, जो राष्ट्र के विकास के लिए एक मजबूत नींव का काम करता है।
आज के दौर की प्रासंगिकता
क्या आज की आधुनिक पीढ़ी इन परंपराओं को समझती है? राष्ट्रपति का संदेश स्पष्ट है—संस्कृति को जीवित रखना नई पीढ़ी की जिम्मेदारी है।
“जब हम अपनी जड़ों से जुड़े रहते हैं, तभी हम ऊंचाइयों को छू सकते हैं।”
रज पर्व केवल पुराने रीति-रिवाजों का पालन नहीं है, बल्कि यह एक जीवन शैली है। यह त्योहार हमें सिखाता है कि हमें धरती के संसाधनों का दोहन नहीं, बल्कि उनका संरक्षण करना चाहिए। मानसून के स्वागत में मनाए जाने वाला यह पर्व हमें भविष्य के लिए तैयार रहने और हर स्थिति में प्रसन्न रहने का संदेश भी देता है।
समृद्धि की कामना
अंत में, राष्ट्रपति ने कामना की कि यह रज पर्व सभी के जीवन में सुख, शांति और समृद्धि लेकर आए। उनका यह संदेश पूरे राज्य और देश के लिए एक प्रेरणा है। यदि हम इस त्योहार के वास्तविक संदेश—धरती का सम्मान, महिलाओं का आदर और आपसी सहयोग—को अपने जीवन में उतार लें, तो निश्चित रूप से एक सशक्त और विकसित भारत का निर्माण करना आसान होगा। यह उत्सव हमें याद दिलाता है कि भले ही हम कितना भी तकनीकी विकास क्यों न कर लें, हमारी संस्कृति ही हमारी वास्तविक पूंजी है।








