भुवनेश्वर, अंग भारत। ओडिशा में रविवार को पारंपरिक ‘पहिली रज’ के साथ बहुप्रतीक्षित रज पर्व की शुरुआत हो गई। यह तीन दिनों तक चलने वाला एक अनूठा उत्सव है, जो न केवल आषाढ़ माह के आगमन का संकेत देता है, बल्कि मानसून का स्वागत करने का एक भव्य तरीका भी है। असल में, यह पर्व धरती माता की उर्वरता और कृषि चक्र के प्रति हमारे गहरे सम्मान को दर्शाता है। इस दौरान ओडिशा का जन-जीवन पूरी तरह से उत्सव के रंग में रंग जाता है, जहाँ प्रकृति के प्रति आभार और सामुदायिक खुशियां सबसे ऊपर होती हैं।
पर्व का गहरा महत्व
रज पर्व के पीछे की मान्यताएं काफी दिलचस्प हैं। ओडिशा की लोक संस्कृति के अनुसार, इस दौरान धरती माता मासिक धर्म (रजस्वला) की अवस्था में होती हैं। इसलिए, इन तीन दिनों तक कृषि संबंधी कोई भी कार्य, जैसे कि खुदाई या जुताई, पूरी तरह से वर्जित रहता है। इसे धरती को आराम देने का एक तरीका माना जाता है, ताकि वह आने वाली फसल के लिए फिर से तैयार हो सके। यह पर्यावरण और प्रकृति के प्रति संवेदनशीलता का एक अद्भुत उदाहरण है, जो आधुनिक समय में भी उतना ही प्रासंगिक है जितना सदियों पहले था।
युवाओं में खास उत्साह
‘पहिली रज’ के दिन राज्यभर में एक अलग ही रौनक देखने को मिली। सुबह होते ही युवतियों और महिलाओं ने पारंपरिक वस्त्र धारण किए और खुद को पारंपरिक आभूषणों व मेहंदी से सजाया। ग्रामीण इलाकों में तो सजी-धजी युवतियों की टोलियां गलियों में घूमती दिखाई दीं। शहरों में भी आधुनिकता के बीच पारंपरिक परिधानों की चमक कम नहीं हुई। परिवारों में बड़े-बुजुर्गों का आशीर्वाद लेने की रस्म और आपस में मेल-मिलाप इस दिन की खूबसूरती को कई गुना बढ़ा देता है।
पारंपरिक झूलों का आनंद
रज पर्व की सबसे बड़ी पहचान इसके ‘दोलि’ (झूले) हैं। गाँवों के बरगद और इमली के पेड़ों पर रस्सी के झूले डाले जाते हैं। इन झूलों पर झूलते हुए युवतियों द्वारा गाए जाने वाले पारंपरिक लोकगीत वातावरण को पूरी तरह से संगीतमय बना देते हैं। इन झूलों के साथ जुड़ी कुछ खास बातें हैं:
- झूलों का उपयोग केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि एक-दूसरे के साथ सामाजिक जुड़ाव का साधन है।
- युवतियां लोक गीतों के माध्यम से अपनी संस्कृति को अगली पीढ़ी तक पहुंचाती हैं।
- पारंपरिक खेलों जैसे ‘बगुड़ी’ के अलावा ताश और लूडो का दौर भी चलता है।
- यह समय पुराने दोस्तों और परिवार के सदस्यों के साथ दोबारा जुड़ने का होता है।
स्वाद से भरा उत्सव
ओडिशा के इस पर्व में खान-पान का एक विशेष स्थान है। रज पर्व का नाम सुनते ही हर किसी के मन में ‘पोडा पीठा’ का स्वाद आने लगता है। मिट्टी के चूल्हे पर धीमी आंच में पकाया गया यह गुड़ और नारियल का स्वाद वाला पकवान इस त्योहार की आत्मा है। पीठा बनाने के अलावा यहाँ और भी कई व्यंजन बनते हैं:
| व्यंजन का नाम | प्रमुख सामग्री |
|---|---|
| पोडा पीठा | चावल का आटा, गुड़, नारियल, पनीर |
| चकुली पीठा | दाल और चावल का घोल |
| अरिसा पीठा | चावल का आटा और गुड़ |
| रज पान | मसालेदार और मीठे मसालों का मिश्रण |
पीढ़ियों का संगम
रज पर्व के बहाने आज भी गांव और शहर के लोग अपनी जड़ों की ओर लौटते हैं। यह त्योहार केवल एक छुट्टी नहीं है, बल्कि एक मौका है जब हम एक-दूसरे के करीब आते हैं। जब घरों में पारंपरिक पकवानों की खुशबू फैलती है और हंसी-ठिठोली की आवाजें सुनाई देती हैं, तो लगता है कि हमारी संस्कृति आज भी उतनी ही जीवंत है। यह उत्सव नई पीढ़ी को सिखाता है कि कैसे प्रकृति के हर बदलाव का स्वागत खुशी और कृतज्ञता के साथ करना चाहिए। आने वाले दिनों में यह उमंग और भी बढ़ेगी, क्योंकि ओडिशा का हर कोना इस उत्सव के उल्लास में डूबने के लिए तैयार है।








