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जेपीएससी सदस्य जमाल अहमद को पदमुक्त करने और एसीबी जांच की मांग, बाबूलाल मरांडी ने सीएम को लिखा पत्र

जेपीएससी सदस्य जमाल अहमद के खिलाफ भ्रष्टाचार के आरोपों और एसीबी जांच की मांग को लेकर बाबूलाल मरांडी द्वारा मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन को लिखा गया पत्र।

रांची,अंग भारत|  विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष बाबूलाल मरांडी ने झारखंड लोक सेवा आयोग (जेपीएससी) के सदस्य जमाल अहमद को उनके पद से तुरंत बर्खास्त करने और उनकी आय से अधिक संपत्ति की भ्रष्टाचार निरोधक ब्यूरो (एसीबी) से जांच कराने की मांग की है। मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन को लिखे एक बेहद कड़े पत्र में मरांडी ने जमाल अहमद पर पद के दुरुपयोग और अकूत बेनामी संपत्ति अर्जित करने के गंभीर आरोप लगाए हैं। इस पत्र के सामने आने के बाद झारखंड के प्रशासनिक और राजनीतिक गलियारों में खलबली मच गई है, क्योंकि यह सीधे तौर पर राज्य की सबसे बड़ी भर्ती परीक्षा आयोजित करने वाली संस्था की विश्वसनीयता से जुड़ा मामला है।

आरोप और मुख्य मांग

बाबूलाल मरांडी ने अपने पत्र में साफ तौर पर लिखा है कि उन्हें कई विश्वसनीय सूत्रों से जमाल अहमद की संपत्ति और उनके कामकाज को लेकर शिकायतें मिली हैं। उनका आरोप है कि जेपीएससी सदस्य बनने के बाद जमाल अहमद ने अपने पद का गलत इस्तेमाल किया और बहुत ही कम समय में करोड़ों रुपये की चल-अचल संपत्ति खड़ी कर ली। मरांडी ने मांग की है कि जांच निष्पक्ष हो, इसके लिए सबसे पहले जमाल अहमद को उनके पद से हटाया जाए। उनका कहना है कि जब तक आरोपी व्यक्ति इतने रसूखदार पद पर बैठा रहेगा, तब तक कोई भी एजेंसी स्वतंत्र रूप से जांच नहीं कर पाएगी।

मरांडी के पत्र में लगाए गए आरोपों के मुख्य बिंदु नीचे दी गई तालिका में देखे जा सकते हैं:

विषय लगाए गए आरोप और विवरण
आलीशान संपत्ति रांची में करीब 3000 से 4000 वर्गफुट का एक बड़ा फ्लैट और दूसरे नए फ्लैट की तलाश।
बेनामी निवेश हजारीबाग जिले में अपने और अपने करीबियों के नाम पर कई गुप्त भूखंड और संपत्तियां।
पुरानी नियुक्तियां साल 2008 में लेक्चरर पद पर हुई उनकी अपनी नियुक्ति वर्तमान में सीबीआई जांच के दायरे में है।
राजनीतिक प्रभाव पूर्व मंत्री आलमगीर आलम के दबाव में नियमों की अनदेखी कर जेपीएससी में एंट्री।

जमाल का सफरनामा

जमाल अहमद का करियर ग्राफ विवादों से पुराना नाता रखता है। वे अपने शुरुआती दिनों में एक प्राथमिक स्कूल में शिक्षक थे। इसके बाद साल 2008 में वे अचानक कॉलेज में लेक्चरर बन गए। इस नियुक्ति प्रक्रिया को लेकर शुरू से ही सवाल उठते रहे हैं और इसकी वैधता की जांच देश की सबसे बड़ी जांच एजेंसी सीबीआई कर रही है। बाबूलाल मरांडी का सीधा तर्क है कि जिस व्यक्ति की खुद की नौकरी और शैक्षणिक योग्यता जांच के घेरे में हो, वह राज्य के हजारों मेधावी युवाओं के भविष्य का फैसला कैसे कर सकता है? जेपीएससी जैसे संवैधानिक आयोग के सदस्य के रूप में ऐसे व्यक्ति की मौजूदगी सीधे तौर पर इस संस्था की छवि धूमिल करती है।

राजनीतिक कनेक्शन

इस पूरे मामले में राजनीतिक रसूख और पैरवी के आरोप भी खुलकर सामने आए हैं। मरांडी ने सीधे आरोप लगाया है कि हेमंत सरकार ने पूर्व ग्रामीण विकास मंत्री आलमगीर आलम के राजनीतिक दबाव में आकर जमाल अहमद को जेपीएससी का सदस्य बनाया था। गौरतलब है कि आलमगीर आलम खुद भी हाल के दिनों में भ्रष्टाचार के गंभीर आरोपों के चलते चर्चा में रहे हैं। विपक्ष का कहना है कि जब सरकार के अंदर बैठे लोग ही भ्रष्टाचार के आरोपियों को संरक्षण देने लगेंगे, तो आम जनता का न्याय प्रणाली पर से भरोसा उठना लाजिमी है।

“यदि भ्रष्टाचार के आरोपों से घिरे व्यक्ति को जेपीएससी जैसी गरिमामयी संस्था में इतनी बड़ी जिम्मेदारी दी जाएगी, तो आयोग की पारदर्शिता पूरी तरह खत्म हो जाएगी।”
– बाबूलाल मरांडी, नेता प्रतिपक्ष

छात्रों का टूटता भरोसा

झारखंड में जेपीएससी की परीक्षाएं हमेशा से ही अदालती मुकदमों, विवादों और पेपर लीक के आरोपों से घिरी रही हैं। राज्य के लाखों गरीब और मध्यमवर्गीय छात्र सालों-साल कमरे किराए पर लेकर, तंगी झेलते हुए तैयारी करते हैं। उनके लिए जेपीएससी केवल एक परीक्षा नहीं बल्कि अपने परिवार की किस्मत बदलने का एक जरिया है। ऐसे में जब आयोग के ही किसी सदस्य पर पद के दुरुपयोग और काली कमाई के आरोप लगते हैं, तो छात्रों का हौसला टूट जाता है। इस तरह के विवादों से पूरी चयन प्रक्रिया पर सवालिया निशान लग जाता है और युवाओं के मन में यह डर बैठ जाता है कि बिना पैसे या पैरवी के उन्हें नौकरी नहीं मिलेगी।

साख का असली सवाल

झारखंड लोक सेवा आयोग जैसी संवैधानिक संस्थाओं को हर तरह के संदेह से परे होना चाहिए। यदि आयोग के भीतर बैठे लोगों की अपनी निष्ठा और ईमानदारी पर उंगली उठने लगे, तो राज्य सरकार को तुरंत कड़े कदम उठाने चाहिए। हालांकि, बाबूलाल मरांडी के इन तीखे आरोपों पर अभी तक राज्य सरकार या खुद जमाल अहमद की तरफ से कोई आधिकारिक बयान जारी नहीं किया गया है। लेकिन इस मुद्दे ने राज्य के भीतर एक बड़ी बहस छेड़ दी है। अब सभी की निगाहें मुख्यमंत्री सचिवालय पर टिकी हैं कि क्या इस मामले को ठंडे बस्ते में डाल दिया जाएगा या फिर इस पर सच में कोई बड़ी कार्रवाई होगी।

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अंग भारत • रिपोर्टर

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