रांची, अंग भारत। झारखंड उच्च न्यायालय ने एक ऐतिहासिक फैसले में कामाख्या नारायण तिवारी को दहेज के आरोप से पूरी तरह बरी कर दिया है, जिन्हें गढ़वा की निचली अदालत ने साल 2004 में छह महीने जेल की सजा सुनाई थी। न्यायमूर्ति अरुण कुमार राय की अदालत ने साफ किया कि जिस कानून के तहत यह सजा सुनाई गई थी, वह घटना के वक्त (साल 1984 में) लागू ही नहीं था। भारतीय संविधान का अनुच्छेद 20(1) किसी भी व्यक्ति को ऐसे कानून के तहत दोषी ठहराने से रोकता है जो अपराध के समय अस्तित्व में नहीं था। इस फैसले ने न केवल 21 साल पुरानी सजा को पलट दिया, बल्कि देश में आपराधिक कानूनों के पूर्वव्यापी (retrospective) प्रभाव को लेकर कानून की स्थिति भी पूरी तरह साफ कर दी है।
निचली अदालत का फैसला
यह मामला झारखंड के गढ़वा जिले का है। साल 2004 में वहां की निचली अदालत ने कामाख्या नारायण तिवारी को दहेज निषेध अधिनियम की धारा-4 के तहत दोषी ठहराया था। तब कोर्ट ने उन्हें 6 महीने की कैद और 5,000 रुपये के जुर्माने की सजा दी थी। तिवारी ने इस फैसले को हाई कोर्ट में चुनौती दी थी। निचली अदालत ने पाया था कि महिला को प्रताड़ित किया गया था, हालांकि कोर्ट ने तिवारी को हत्या के गंभीर आरोपों से पहले ही बरी कर दिया था। फिर भी, दहेज की मांग के आरोप में उन्हें सजा भुगतनी पड़ रही थी, जिसे अब हाई कोर्ट ने पूरी तरह अनुचित मानते हुए रद्द कर दिया है।
शादी के बाद की मांग
इस पूरे मामले की जड़ें साल 1979 में हुई एक शादी से जुड़ी हैं। शादी के पांच साल बाद, यानी 1984 में विवाहिता शशि कुमारी से कथित तौर पर एक मोटरसाइकिल की मांग की गई थी। ससुराल वालों पर आरोप था कि मांग पूरी न होने पर शशि को मानसिक और शारीरिक रूप से प्रताड़ित किया गया, जिसके बाद उसकी मौत हो गई। जब यह मामला अदालत पहुंचा, तो गवाहों ने गवाही दी। गवाहों के बयानों में एक बात बिल्कुल साफ थी—मोटरसाइकिल की मांग शादी के बाद की गई थी। शादी से पहले या शादी के फेरों के समय दहेज की कोई मांग नहीं की गई थी।
कानून में बड़ा बदलाव
दहेज निषेध अधिनियम की धारा-4 में समय के साथ बदलाव हुए हैं, जिन्हें समझना बेहद जरूरी है। साल 1984 में, जब यह घटना घटी, तब कानून के तहत केवल शादी से पहले या शादी के समय की गई दहेज की मांग को ही इस धारा के तहत अपराध माना जाता था। लेकिन सरकार ने 19 नवंबर 1986 को इस कानून में एक बड़ा संशोधन किया। इस संशोधन के बाद धारा-4 में “विवाह के बाद किसी भी समय” की गई दहेज की मांग को भी शामिल कर लिया गया।
यहीं पर सारा पेंच फंसा। कामाख्या नारायण तिवारी के मामले में कथित मांग 1984 की थी, जबकि नया सख्त कानून 1986 में लागू हुआ। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि 1986 के इस संशोधन को पीछे की तारीख से लागू नहीं किया जा सकता।
संविधान का अनुच्छेद 20(1)
झारखंड हाई कोर्ट ने अपने फैसले को कानूनी आधार देने के लिए भारतीय संविधान के अनुच्छेद 20(1) का सहारा लिया। यह अनुच्छेद देश के हर नागरिक को एक बुनियादी सुरक्षा देता है। इसके अनुसार:
- किसी भी व्यक्ति को तब तक दोषी नहीं ठहराया जा सकता, जब तक उसने काम करते समय लागू किसी कानून का उल्लंघन न किया हो।
- अपराध के समय जो सजा तय थी, किसी भी व्यक्ति को उससे ज्यादा सजा नहीं दी जा सकती।
- बाद में बने नए सख्त कानून के आधार पर पुरानी घटनाओं के लिए किसी को सजा देना पूरी तरह गैर-संवैधानिक है।
न्यायमूर्ति अरुण कुमार राय ने कहा कि चूंकि 1986 का संशोधन पूर्वव्यापी प्रभाव नहीं रखता, इसलिए 1984 में हुई घटना पर इसे थोपना कानून का सीधा उल्लंघन है।
गवाहों के बयान का सच
हाई कोर्ट ने निचली अदालत के रिकॉर्ड और गवाहों के बयानों को दोबारा गहराई से देखा। कोर्ट ने पाया कि अभियोजन पक्ष यह साबित करने में पूरी तरह नाकाम रहा कि दहेज की मांग शादी के समय या उससे पहले हुई थी। गवाहों ने खुद स्वीकार किया कि मोटरसाइकिल की मांग शादी के सालों बाद उठी थी। क्योंकि 1984 के मूल कानून में शादी के बाद की मांग धारा-4 के दायरे में नहीं आती थी, इसलिए कानूनी तौर पर कोई अपराध बनता ही नहीं था। कोर्ट ने कहा कि जब बुनियाद ही कमजोर हो, तो सजा को बरकरार रखना न्याय के सिद्धांतों के खिलाफ होगा।
अदालत का अंतिम आदेश
इन सभी कानूनी पहलुओं को देखने के बाद हाई कोर्ट ने कामाख्या नारायण तिवारी की अपील को स्वीकार कर लिया। कोर्ट ने निचली अदालत द्वारा साल 2004 में सुनाई गई दोषसिद्धि और सजा के आदेश को पूरी तरह खारिज कर दिया। इसके साथ ही आरोपी को मिली जमानत राशि और बांड को भी समाप्त कर दिया गया। यह मामला दिखाता है कि न्याय मिलने में भले ही दो दशक का समय लग गया, लेकिन अंततः कानून की सही व्याख्या ने एक व्यक्ति को उस सजा से बचा लिया जो संवैधानिक रूप से गलत थी।







