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मुख्यमंत्री ने सीआरपीएफ के शौर्य को किया नमन, बाढ़ प्रभावितों की मदद के लिए जवानों की सराहना

असम में आई विनाशकारी बाढ़ के दौरान बाढ़ प्रभावित लोगों को सुरक्षित बचाते हुए सीआरपीएफ के जांबाज जवान और उनके साहस को सलाम करते मुख्यमंत्री हिमंत बिस्व सरमा।

गुवाहाटी,अंग भारत। असम के मुख्यमंत्री डॉ. हिमंत बिस्व सरमा ने हाल ही में केंद्रीय रिजर्व पुलिस बल (सीआरपीएफ) के 85वें स्थापना दिवस के मौके पर बल के जांबाज जवानों के साहस और उनके मानवीय दृष्टिकोण को सलाम किया है। यह दिन केवल एक बल के इतिहास को याद करने का नहीं, बल्कि उन अनगिनत हाथों को नमन करने का है जो देश की आंतरिक सुरक्षा के साथ-साथ आपदाओं के समय नागरिकों के जीवन रक्षक बन जाते हैं। मुख्यमंत्री ने विशेष रूप से असम में बाढ़ जैसी विभीषिका के दौरान सीआरपीएफ द्वारा किए गए बचाव कार्यों की प्रशंसा की। जब राज्य की नदियां रौद्र रूप धारण करती हैं, तब यही जवान नावों और रस्सियों के सहारे लोगों की जान बचाते हैं, जो यह साबित करता है कि सीआरपीएफ का दायित्व केवल बंदूक थामने तक सीमित नहीं है, बल्कि मानवता की सेवा में भी सर्वोपरि है।

सुरक्षा का मजबूत आधार

सीआरपीएफ की नींव 27 जुलाई 1939 को ‘क्राउन रिप्रेजेंटेटिव्स पुलिस’ के तौर पर रखी गई थी, लेकिन 28 दिसंबर 1949 को इसे भारत के एक स्वायत्त और सबसे बड़े अर्धसैनिक बल के रूप में एक नई पहचान मिली। यह बल दशकों से भारत की आंतरिक सुरक्षा व्यवस्था का सबसे भरोसेमंद स्तंभ रहा है। इसकी कार्यकुशलता के पीछे दशकों का कड़ा अनुशासन और कठिन ट्रेनिंग है।

  • देश के दुर्गम इलाकों में नक्सल विरोधी अभियानों का संचालन।
  • लोकतांत्रिक प्रक्रिया को मजबूत करने के लिए चुनावों में सुरक्षा प्रदान करना।
  • सांप्रदायिक दंगों या कानून-व्यवस्था बिगड़ने पर शांति बहाल करना।
  • वीआईपी सुरक्षा और महत्वपूर्ण सरकारी प्रतिष्ठानों की रक्षा करना।

बाढ़ में मसीहा बने जवान

असम के संदर्भ में सीआरपीएफ की भूमिका बेहद अहम हो जाती है। राज्य के निचले इलाकों में मानसून के दौरान हर साल लोग बेघर होते हैं। मुख्यमंत्री ने अपने संबोधन में बताया कि कैसे सीआरपीएफ की टीमें बिना किसी झिझक के उफनती ब्रह्मपुत्र की लहरों के बीच जाकर फंसे हुए परिवारों को बाहर निकालती हैं। इनका काम सिर्फ लोगों को बचाना ही नहीं, बल्कि बाढ़ राहत शिविरों में भोजन और दवाइयां पहुंचाना भी होता है। ये जवान अपनी जान जोखिम में डालकर उस अंतिम व्यक्ति तक मदद पहुंचाते हैं, जहां प्रशासन की पहुंच भी कठिन होती है।

“सीआरपीएफ के जवानों का साहस केवल हथियारों में नहीं, बल्कि उन लोगों की मुस्कान में दिखता है जिन्हें वे आपदा के समय सुरक्षित स्थान पर पहुंचाते हैं।”

वीरता, अनुशासन और राष्ट्रसेवा की मिसाल: सीआरपीएफ

भारतीय इतिहास में सीआरपीएफ के बलिदानों की लंबी फेहरिस्त है। संसद भवन पर हुए आतंकी हमले को नाकाम करने से लेकर घने जंगलों में छिपे दुश्मनों को धूल चटाने तक, सीआरपीएफ ने हमेशा शौर्य का परिचय दिया है। इनके जवानों का अनुशासन न केवल देश के भीतर शांति सुनिश्चित करता है, बल्कि यह युवाओं के लिए एक मिसाल भी है। वे शून्य तापमान वाली चोटियों से लेकर तपते हुए रेगिस्तानों तक, हर कठिन परिस्थिति में डटे रहने का हौसला रखते हैं।

जवानों के प्रति आभार

डॉ. सरमा का संदेश स्पष्ट है कि एक सैनिक जब अपने घर और परिवार से हजारों मील दूर तैनात रहता है, तब हम अपने घरों में चैन की नींद सो पाते हैं। सैनिकों की ये निःस्वार्थ सेवा ही भारत की लोकतांत्रिक जड़ों को सींचती है। उनकी अटूट निष्ठा पर पूरे राष्ट्र को गर्व है और यही कारण है कि स्थापना दिवस जैसे अवसर पर पूरा देश उनके साथ खड़ा दिखाई देता है।

बदलते दौर की चुनौतियां

सुरक्षा का परिदृश्य तेजी से बदल रहा है। अब केवल शारीरिक बल ही काफी नहीं है, बल्कि तकनीकी रूप से भी सक्षम होना आवश्यक है। सीआरपीएफ अब साइबर खतरों और ड्रोन जैसी आधुनिक तकनीक के इस्तेमाल से उत्पन्न समस्याओं का सामना करने के लिए खुद को लगातार अपडेट कर रही है। बल को आधुनिक हथियारों और संचार प्रणालियों से लैस करना अब प्राथमिकता बन चुका है।

भविष्य का मार्ग

आने वाले समय में सीआरपीएफ की जिम्मेदारी और भी बढ़ने वाली है। देश में सुरक्षा की जो नई चुनौतियां सामने आ रही हैं, उनके लिए बल के जवानों को लगातार नई रणनीतियां सीखने की जरूरत है। सरकार भी इनके कल्याण के लिए प्रतिबद्ध है, चाहे वह बेहतर स्वास्थ्य सुविधाएं हों या उनके परिवारों के लिए आवास व्यवस्था। अंततः, देश का गौरव इन्हीं वर्दीधारी नायकों से है, जो अपनी सीमाओं की रक्षा के साथ-साथ समाज की सेवा में भी सदैव अग्रसर रहते हैं।

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अंग भारत • रिपोर्टर

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