नई दिल्ली, अंग भारत। कारगिल विजय दिवस के अवसर पर आज पूरा देश उन जांबाज सैनिकों को याद कर रहा है जिन्होंने साल 1999 में लद्दाख की दुर्गम पहाड़ियों में तिरंगा लहराया था। इस बार का विजय दिवस बेहद खास है क्योंकि हर साल दिल्ली में होने वाला मुख्य कार्यक्रम इस बार सीधे रणभूमि यानी लद्दाख के द्रास स्थित कारगिल वॉर मेमोरियल में आयोजित किया गया है। राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु, प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह सहित देश के शीर्ष नेतृत्व ने इस अवसर पर शहीदों को श्रद्धांजलि अर्पित की है। यह दिन केवल सेना की जीत का नहीं, बल्कि हर भारतीय के उस स्वाभिमान का प्रतीक है जिसे हमारे वीर जवानों ने अपनी शहादत देकर बचाया था।
द्रास में मुख्य आयोजन
इस साल देश ने अपनी परंपरा में एक बड़ा और सार्थक बदलाव किया है। अमूमन मुख्य समारोह नई दिल्ली के नेशनल वॉर मेमोरियल में होता था, लेकिन इस बार इसे सीधे उसी जगह ले जाया गया जहां जवानों ने अपना खून बहाया था। द्रास के कारगिल वॉर मेमोरियल पर रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने युद्ध की पूर्व संध्या पर पहुंचकर शहीदों को नमन किया। द्रास दुनिया के सबसे ठंडे बसे हुए इलाकों में से एक है, और वहां जाकर शहीदों को याद करना इस बात का सबूत है कि देश अपनी सीमाओं पर तैनात जवानों के साथ हर पल खड़ा है।
नेतृत्व ने क्या कहा
देश के शीर्ष नेताओं ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स (पहले ट्विटर) के जरिए अपने जज्बात साझा किए। उनके संदेशों में केवल औपचारिकता नहीं, बल्कि उन परिवारों के प्रति गहरी संवेदना थी जिन्होंने देश के लिए अपने बेटों को खोया है।
“कारगिल विजय दिवस पर मातृभूमि की रक्षा के लिए प्राणों की आहुति देने वाले वीर योद्धाओं को मैं विनम्र श्रद्धांजलि अर्पित करती हूं। उनका अद्वितीय पराक्रम हमारी सेना की गौरवशाली परंपरा का उदाहरण है।”
– राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु
प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने जवानों की दृढ़ता को याद करते हुए लिखा कि बेहद मुश्किल हालात में भी हमारे सैनिकों का अदम्य साहस हमेशा देश के लिए प्रेरणा बना रहेगा। गृहमंत्री अमित शाह ने उस दौर को याद किया जब 1999 में हिमालय की बर्फीली चोटियों पर पाकिस्तान ने धोखे से कब्जा कर लिया था और भारतीय सेना ने उन्हें घुटने टेकने पर मजबूर कर दिया। जम्मू-कश्मीर के उपराज्यपाल मनोज सिन्हा और उपराष्ट्रपति सीपी राधाकृष्णन ने भी शहीदों की वीरता और उनके परिवारों के त्याग को नमन किया।
ऑपरेशन विजय का सच
साल 1999 की सर्दियों में जब दोनों देशों की सेनाएं आपसी समझौते के तहत अपनी चौकियों से नीचे आ जाती थीं, तब पाकिस्तानी सैनिकों और घुसपैठियों ने भारतीय चौकियों पर अवैध कब्जा कर लिया था। जब मई 1999 में इसका पता चला, तो भारतीय सेना ने फौरन ‘ऑपरेशन विजय’ शुरू किया। वहीं, भारतीय वायुसेना ने भी ‘ऑपरेशन सफेद सागर’ के जरिए आसमान से दुश्मनों पर जमकर प्रहार किया।
यह लड़ाई बिल्कुल भी आसान नहीं थी। दुश्मन बहुत ऊंचाई पर बंकर बनाकर बैठा था और हमारे जवानों को सीधे उनकी गोलियों के सामने चढ़ाई करनी थी। तापमान माइनस डिग्री से नीचे था और हवा में ऑक्सीजन की भारी कमी थी, लेकिन भारतीय जांबाज पीछे नहीं हटे।
वे तीन अहम चोटियां
भारतीय सैनिकों ने जिन प्रमुख चौकियों को वापस छीना, उनमें तीन चोटियां सबसे महत्वपूर्ण थीं। इन पर कब्जा करना ही भारत की जीत की चाबी साबित हुआ:
- तोलोलिंग (Tololing): यह इस युद्ध का पहला सबसे बड़ा टर्निंग पॉइंट था। इस चोटी पर कब्जा करने के बाद भारतीय सेना का मनोबल सातवें आसमान पर पहुंच गया और जीत का रास्ता खुला।
- टाइगर हिल (Tiger Hill): इस चोटी पर कब्जे के लिए भारतीय जवानों को सीधी खड़ी चट्टान पर चढ़ना पड़ा। कैप्टन विक्रम बत्रा और ग्रेनेडियर योगेंद्र सिंह यादव जैसे वीरों ने यहां बहादुरी की नई इबारत लिखी थी।
- प्वाइंट 4875 (Point 4875): इस चोटी को आज ‘बत्रा टॉप’ के नाम से भी जाना जाता है। इसे बचाने और दुश्मन के चंगुल से छीनने में हमारे कई जवानों ने देश के लिए सर्वोच्च बलिदान दिया।
कारगिल युद्ध के आंकड़े
युद्ध की भयावहता और भारत की शानदार जीत को समझने के लिए इन प्रमुख आंकड़ों पर नजर डालना जरूरी है:
| विषय | मुख्य विवरण |
|---|---|
| युद्ध की अवधि | मई 1999 से 26 जुलाई 1999 (लगभग 60 दिन) |
| थल सेना का अभियान | ऑपरेशन विजय (Operation Vijay) |
| वायु सेना का अभियान | ऑपरेशन सफेद सागर (Operation Safed Sagar) |
| प्रमुख रणक्षेत्र | द्रास, कारगिल, बटालिक और तुर्तुक सेक्टर |
| जीत की तारीख | 26 जुलाई 1999 (सभी चौकियों पर तिरंगा वापस फहराया गया) |
युद्ध से क्या सीखा
कारगिल की लड़ाई ने भारत को कई कड़े सबक दिए। इसके बाद देश ने अपनी खुफिया व्यवस्था और सैटेलाइट निगरानी को मजबूत किया। साथ ही सीमा पर सर्दियों में भी चौकियों को खाली न करने का फैसला लिया गया। आज जब हम कारगिल विजय दिवस मनाते हैं, तो यह सिर्फ बीते हुए कल की जीत का जश्न नहीं है, बल्कि यह आने वाले कल के लिए हमारी मुस्तैदी का संकल्प भी है। देश की सीमाएं आज पहले से कहीं अधिक सुरक्षित और मजबूत हैं।







