नई दिल्ली,अंग भारत। कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे ने पूर्वोत्तर भारत के अरुणाचल प्रदेश, असम, मेघालय और सिक्किम में आई भयावह बाढ़ और भीषण भूस्खलन को लेकर गंभीर चिंता जताई है। यह प्राकृतिक आपदा केवल एक मौसमी घटना नहीं, बल्कि लाखों लोगों के जीवन और उनकी आजीविका पर एक गहरा प्रहार है। खरगे ने इस संकट में अपनी जान गंवाने वाले लोगों के प्रति शोक व्यक्त करते हुए कहा कि प्रभावित परिवारों के जख्म बहुत गहरे हैं और उन्हें इस समय सरकारी सहायता के साथ-साथ समाज के समर्थन की सख्त जरूरत है। उन्होंने न केवल केंद्र सरकार को जमीनी हकीकत का आईना दिखाया, बल्कि राहत और पुनर्वास के लिए पीएम केयर्स फंड के सही इस्तेमाल की मांग भी उठाई है।
बाढ़ का स्थाई समाधान
हर साल पूर्वोत्तर में बाढ़ का आना एक रस्म-अदायगी जैसा बन गया है। खरगे का मानना है कि सरकारों ने इस समस्या को हमेशा एक अस्थायी आपदा के रूप में ही देखा है। उनका सीधा आरोप है कि विजन डॉक्यूमेंट और कागजी योजनाओं में बाढ़ मुक्त राज्यों के जो सपने दिखाए गए थे, वे आज पूरी तरह विफल साबित हुए हैं।
- असम के लिए 2016 में जारी किए गए विजन डॉक्यूमेंट के वादों का क्या हुआ?
- बाढ़ नियंत्रण के लिए आवंटित बजट का जमीन पर कितना असर दिखा?
- नदी प्रबंधन और तटबंधों की मजबूती के लिए ठोस नीतियां क्यों नहीं बनीं?
पीएम केयर्स का उपयोग
कांग्रेस अध्यक्ष ने स्पष्ट किया कि वर्तमान में प्रभावित परिवारों को केवल फौरी राहत की नहीं, बल्कि बड़े पैमाने पर आर्थिक पैकेज की आवश्यकता है। उन्होंने पीएम केयर्स फंड से धन जारी करने की पुरजोर मांग की है ताकि:
- खोए हुए घरों को फिर से बनाया जा सके।
- किसानों की बर्बाद हुई फसलों का उचित मुआवजा दिया जाए।
- बेघर हुए लोगों के लिए पुनर्वास की स्थाई व्यवस्था हो।
केवल दिखावे की मदद से आम आदमी का जीवन पटरी पर नहीं लौट सकता। इसके लिए सरकार को अपनी तिजोरी खोलनी होगी और पारदर्शिता के साथ राहत राशि उन तक पहुंचानी होगी जो वास्तव में इस आपदा की मार झेल रहे हैं।
राहत दलों की भूमिका
सशस्त्र सेना, एनडीआरएफ (NDRF) और एसडीआरएफ (SDRF) के जवानों के जज्बे की खरगे ने खुले दिल से सराहना की। अपनी जान की बाजी लगाकर ये टीमें दुर्गम क्षेत्रों में फंसे लोगों को सुरक्षित निकाल रही हैं। हालांकि, उन्होंने सरकार को आगाह भी किया कि मानवीय संकट का दायरा बहुत बड़ा है। संसाधनों की कमी के कारण बचाव कार्य कहीं-कहीं धीमे पड़ रहे हैं, जिसे तत्काल दुरुस्त करने की जरूरत है।
“राहत कार्यों में तेजी लाने के लिए अतिरिक्त कर्मियों की तैनाती और बेहतर उपकरणों का उपयोग समय की मांग है। जवानों का मनोबल बढ़ाने के साथ-साथ उन्हें आधुनिक तकनीक मुहैया कराना जरूरी है।”
कार्यकर्ताओं से अपील
विपक्षी दल के नाते कांग्रेस अध्यक्ष ने अपनी पार्टी के कार्यकर्ताओं को निर्देश दिया है कि वे राजनीति से ऊपर उठकर बाढ़ प्रभावित क्षेत्रों में ‘जन सेवा’ का काम करें। उन्होंने आह्वान किया है कि:
- राहत शिविरों में जरूरतमंदों तक खाना और दवाई पहुंचाएं।
- स्थानीय प्रशासन के साथ तालमेल बिठाकर बचाव कार्यों में मदद करें।
- पीड़ित परिवारों को सरकारी सहायता दिलाने के लिए उनकी आवाज बनें।
भूस्खलन का खतरा
पूर्वोत्तर के पहाड़ी राज्यों में भूस्खलन की घटनाएं लगातार बढ़ रही हैं। पर्यावरण के बदलते मिजाज और अनियंत्रित निर्माण कार्यों के कारण यह खतरा और भी गंभीर होता जा रहा है। खरगे की यह टिप्पणी न केवल वर्तमान आपदा के संदर्भ में है, बल्कि यह सरकार को एक चेतावनी भी है कि यदि जल्द ही जलवायु-अनुकूल नीतियां नहीं अपनाई गईं, तो आने वाले समय में यह संकट और भी भयावह रूप ले लेगा।
अंत में, यह कहना प्रासंगिक होगा कि पूर्वोत्तर भारत के लोग हर साल प्रकृति के इस कहर के सामने असहाय महसूस करते हैं। मल्लिकार्जुन खरगे का यह बयान सरकार पर एक बड़ा दबाव बनाता है कि वह चुनावी वादों से हटकर एक ठोस और दीर्घकालिक ‘बाढ़ नियंत्रण नीति’ को लागू करे, ताकि हर मानसून में राज्यों को तबाही न झेलनी पड़े।







