कोलकाता,अंग भारत। तृणमूल कांग्रेस के नाम, चुनाव चिह्न और संगठनात्मक नियंत्रण को लेकर चल रहा राजनीतिक घमासान आज एक अत्यंत निर्णायक मोड़ पर पहुंच गया है, जहां भारत निर्वाचन आयोग की पूर्ण पीठ इस विवाद पर अपनी अहम सुनवाई कर रही है। ऋतब्रत बनर्जी के नेतृत्व वाला बागी गुट आज नई दिल्ली में आयोग के समक्ष अपने दावे प्रस्तुत कर रहा है, जिसका सीधा असर पार्टी की भविष्य की दिशा और पश्चिम बंगाल के राजनीतिक भविष्य पर पड़ने वाला है। यह मामला केवल एक प्रशासनिक विवाद नहीं है, बल्कि पार्टी के भीतर सत्ता परिवर्तन की एक बड़ी कोशिश है जिसके तहत बागी खेमा खुद को असली उत्तराधिकारी साबित करने की जद्दोजहद में जुटा है।
सुनवाई का आधार
बागी गुट के नेताओं ने स्पष्ट कर दिया है कि वे केवल मौखिक दलीलों पर निर्भर नहीं हैं। उन्होंने दावा किया है कि पार्टी के नाम, चुनाव चिह्न और कोष पर अपना हक जताने के लिए उन्होंने आयोग को पुख्ता दस्तावेज और संगठनात्मक प्रस्ताव सौंप दिए हैं। ऋतब्रत बनर्जी की अगुवाई में 10 विधायकों का प्रतिनिधिमंडल पहले ही नई दिल्ली पहुंच चुका है। आयोग के सामने मुख्य चुनौती यह तय करना है कि क्या पार्टी के संविधान के भीतर हुए बदलाव वैधानिक हैं या नहीं।
विवाद की जड़
तृणमूल कांग्रेस में दरार 22 जून के उस घटनाक्रम के बाद चौड़ी हो गई, जिसने राजनीतिक गलियारों में हलचल मचा दी थी। उस दिन बागी गुट ने अपनी समानांतर ताकत दिखाते हुए निम्नलिखित कदम उठाए थे:
- 30 सदस्यीय एक नई राष्ट्रीय कार्यकारिणी का गठन किया गया।
- 10 सदस्यीय उपसमिति बनाकर संगठनात्मक ढांचे में बदलाव किया गया।
- ममता बनर्जी को राष्ट्रीय अध्यक्ष पद से हटाने का विवादास्पद प्रस्ताव पेश किया गया।
- वरिष्ठ विधायक अरूप राय को नया राष्ट्रीय अध्यक्ष घोषित किया गया।
बहुमत का गणित
बागी गुट ने इस लड़ाई को पूरी तरह से ‘संख्या बल’ का खेल बना दिया है। उनके द्वारा पेश किए गए आंकड़ों पर नजर डालें तो स्थिति काफी दिलचस्प हो जाती है:
- कुल विधायक: बागी गुट के अनुसार उनके साथ 60 से अधिक विधायक हैं।
- प्रतिद्वंदी गुट: ममता बनर्जी के खेमे में केवल 20 विधायकों के होने का दावा किया गया है।
- वोट शेयर: बागी खेमे का दावा है कि उनके समर्थन वाले विधायकों के पास कुल 48 लाख वोट हैं, जो किसी भी पार्टी के दावे को कानूनी रूप से मजबूत बनाने के लिए निर्वाचन आयोग के मापदंडों से अधिक है।
आयोग की भूमिका
निर्वाचन आयोग की पूर्ण पीठ इस मामले में बेहद सावधानी बरत रही है। चुनाव चिन्ह आदेश (Election Symbols Order), 1968 के तहत आयोग को यह अधिकार है कि वह पार्टी के भीतर दो गुटों के बीच विवाद होने पर यह तय करे कि असली पार्टी कौन सी है। आयोग के सामने पेश होने वाले दस्तावेज, पार्टी का संविधान और संगठनात्मक चुनाव की प्रक्रिया सबसे महत्वपूर्ण साक्ष्य माने जाएंगे। यह प्रक्रिया समय लेने वाली होती है, इसलिए किसी भी अंतिम नतीजे की तुरंत घोषणा होने की संभावना कम है।
राजनीतिक प्रभाव
भले ही आज की सुनवाई से तुरंत कोई फैसला न आए, लेकिन इसके दूरगामी परिणाम होंगे। यदि आयोग बागी गुट के पक्ष में जाता है, तो ममता बनर्जी के लिए अपने राजनीतिक अस्तित्व को बचाना चुनौतीपूर्ण होगा। वहीं, यदि आयोग वर्तमान नेतृत्व को ही मान्यता देता है, तो बागी गुट का भविष्य अधर में लटक सकता है। पश्चिम बंगाल की राजनीति के लिए यह दिन एक ऐसी लकीर खींचने वाला है जो आने वाले समय में चुनावी गठबंधनों और जनता की धारणा को पूरी तरह बदल सकती है।
आगे का रास्ता
कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि इस तरह के मामलों में आयोग की प्रक्रिया लंबी होती है। दोनों पक्षों को अपने दावों को साबित करने के लिए अतिरिक्त साक्ष्य देने का मौका दिया जा सकता है। फिलहाल, दिल्ली में जमा हुई भीड़ और आयोग के दफ्तर में हलचल इस बात का प्रमाण है कि तृणमूल कांग्रेस के भीतर का यह घमासान अब आर-पार की लड़ाई बन चुका है।







