नई दिल्ली,अंग भारत। अयोध्या के भव्य राम मंदिर में आने वाले चढ़ावे में कथित वित्तीय हेराफेरी के मामले को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने कड़ा रुख अपनाया है। कोर्ट ने उत्तर प्रदेश सरकार और श्री राम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट को नोटिस जारी कर इस मामले की जांच के लिए गठित विशेष जांच दल (एसआईटी) से जुड़े सभी दस्तावेज और फाइलें तलब की हैं। जस्टिस सूर्यकांत की अगुवाई वाली पीठ इस संवेदनशील याचिका पर सुनवाई कर रही है। अब इस पूरे विवाद पर अगली बड़ी सुनवाई 20 जुलाई को होनी तय हुई है। यह कदम सीधे तौर पर उस जनभावना से जुड़ा है जहां करोड़ों लोग मंदिर को अपनी गाढ़ी कमाई का हिस्सा सौंप रहे हैं।
सीलबंद लिफाफे में स्टेटस रिपोर्ट
कोर्ट रूम में सुनवाई के दौरान केंद्र की ओर से देश के सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने पक्ष रखा। उन्होंने पीठ को साफ किया कि उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा बनाई गई एसआईटी अपनी स्टेटस रिपोर्ट सीधे अदालत के सामने पेश करेगी। यह रिपोर्ट एक सीलबंद लिफाफे में होगी ताकि जांच की गोपनीयता बनी रहे। सुप्रीम कोर्ट ने केवल रिपोर्ट ही नहीं, बल्कि एसआईटी के गठन के पीछे के आधार और उसकी अब तक की पूरी कार्रवाई के कागजात भी दिखाने को कहा है। अदालत यह सुनिश्चित करना चाहती है कि जांच निष्पक्ष हो रही है या नहीं।
याचिकाकर्ताओं की मुख्य मांगें
यह कानूनी लड़ाई दो वकीलों—अजय कुमार राय और दिनेश कुमार यादव—ने शुरू की है। उनकी याचिका में सीधे तौर पर पारदर्शिता की मांग की गई है। याचिकाकर्ताओं ने मांग की है कि मंदिर में आने वाले पैसों की गिनती, उसके रख-रखाव और हर एक रुपये के हिसाब को पूरी तरह पारदर्शी बनाया जाए। याचिका में निम्नलिखित प्रमुख मांगें की गई हैं:
- चढ़ावे की हेराफेरी की जांच सीबीआई (CBI) या किसी स्वतंत्र केंद्रीय एजेंसी से कराई जाए।
- मंदिर ट्रस्ट के खातों का एक स्वतंत्र ऑडिट हो, जिसे सार्वजनिक किया जाए।
- दान पेटियों से पैसे निकालने और बैंक में जमा करने की पूरी प्रक्रिया की वीडियो रिकॉर्डिंग हो।
बिना एफआईआर जांच पर सवाल
याचिकाकर्ताओं ने उत्तर प्रदेश पुलिस और प्रशासन की कार्यप्रणाली पर एक गंभीर कानूनी सवाल खड़ा किया है। उनका कहना है कि सरकार ने जांच के लिए एसआईटी तो बना दी, लेकिन इसके लिए कोई औपचारिक एफआईआर (FIR) दर्ज नहीं की गई। बिना किसी आपराधिक मामले के दर्ज हुए इतनी बड़ी जांच कैसे शुरू हो सकती है? यह प्रक्रियात्मक खामी कोर्ट के सामने उठाई गई है। याचिका में साफ कहा गया है कि इस तरह की अधूरी प्रक्रिया से जांच कमजोर पड़ सकती है, जिससे असली दोषियों को बचने का मौका मिल सकता है। इसलिए एक विशेषज्ञ आर्थिक जांच एजेंसी का इसमें शामिल होना जरूरी है।
एसआईटी टीम में कौन शामिल?
इस हाई-प्रोफाइल मामले की जांच के लिए उत्तर प्रदेश सरकार ने तीन बड़े अधिकारियों की एक विशेष टीम (SIT) बनाई है। इस टीम में शामिल अधिकारियों के नाम और उनके पद इस प्रकार हैं:
| अधिकारी का नाम | विभाग और पद |
|---|---|
| विजय विश्वास पंत | मंडलायुक्त, लखनऊ |
| किरण एस | आईजी (पुलिस महानिरीक्षक) |
| नील रतन | विशेष सचिव, वित्त विभाग |
यह टीम प्रशासन, पुलिस और वित्त तीनों क्षेत्रों के अनुभवों को समेटे हुए है। अब इनकी जांच की निष्पक्षता सुप्रीम कोर्ट की कसौटी पर कसी जाएगी।
श्रद्धालुओं की आस्था का सवाल
राम मंदिर केवल एक ढांचा नहीं है, बल्कि यह देश-विदेश के करोड़ों रामभक्तों की सदियों की प्रतीक्षा का फल है। 22 जनवरी 2024 को प्राण प्रतिष्ठा के बाद से हर दिन लाखों लोग अयोध्या पहुंच रहे हैं। कोई अपनी बचत से तो कोई अपनी पेंशन से मंदिर में गुप्त दान और चढ़ावा चढ़ा रहा है। ऐसे में वित्तीय हेराफेरी की छोटी सी अफवाह भी लोगों के भरोसे को हिला देती है। याचिका में यही बात कही गई है कि चाहे ये आरोप सच हों या गलत, इनका सच सामने आना बेहद जरूरी है ताकि भक्तों का मंदिर प्रबंधन पर भरोसा बना रहे।
पहले भी उठी जांच की मांग
यह पहली बार नहीं है जब राम मंदिर के पैसों को लेकर विवाद खड़ा हुआ है। इससे पहले वकील अनूप अवस्थी ने भी सुप्रीम कोर्ट को पत्र भेजकर इस मुद्दे पर ध्यान देने की अपील की थी। वर्ष 2020 में सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक फैसले के बाद ही इस ट्रस्ट का गठन हुआ था। जब सरकारी और कोर्ट के आदेश से बनी संस्था पर सवाल उठते हैं, तो जिम्मेदारी और बढ़ जाती है। अब 20 जुलाई की तारीख बेहद अहम होने वाली है। उसी दिन साफ होगा कि क्या सुप्रीम कोर्ट इस जांच को सीबीआई को सौंपता है या यूपी सरकार की एसआईटी को ही अपनी जांच पूरी करने की हरी झंडी देता है। देश भर के भक्तों की नजरें अब देश की सबसे बड़ी अदालत पर टिक गई हैं।








