रायपुर,अंग भारत। राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू आज यानी गुरुवार को दिल्ली स्थित राष्ट्रपति भवन में छत्तीसगढ़ के ‘बस्तर पंडुम-2026’ के विजेताओं और बस्तर की पारंपरिक जनजातीय नेतृत्व व्यवस्था से जुड़े प्रतिनिधियों को राष्ट्रीय सम्मान से नवाजेंगी। छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय की अगुवाई में राज्य का एक विशाल 164 सदस्यीय प्रतिनिधिमंडल इस गौरवशाली क्षण का गवाह बनने देश की राजधानी पहुंचा है। इस खास दल में राज्य के उपमुख्यमंत्री विजय शर्मा और संस्कृति मंत्री राजेश अग्रवाल भी शामिल हैं। बस्तर की अनूठी लोक संस्कृति और पारंपरिक स्वशासन प्रणाली को राष्ट्रीय स्तर पर पहचान दिलाने की दिशा में यह एक अभूतपूर्व और बड़ा ऐतिहासिक कदम है।
बस्तर का ऐतिहासिक सम्मान
यह आयोजन केवल एक पुरस्कार वितरण समारोह नहीं है, बल्कि यह देश के सबसे पिछड़े माने जाने वाले क्षेत्रों में से एक की समृद्ध विरासत को मुख्यधारा में सम्मान देने की एक गंभीर पहल है। सोचिए, जिन आदिवासियों ने सदियों से बस्तर के जंगलों में अपनी अनूठी परंपराओं को सहेज कर रखा है, आज वे देश के प्रथम नागरिक के मेहमान बनकर राष्ट्रपति भवन में खड़े होंगे। इस मौके पर पारंपरिक नेताओं और पद्मश्री से सम्मानित राज्य की महान विभूतियों के सम्मान में राष्ट्रपति भवन में एक विशेष भोज (स्टेट फीस्ट) का भी आयोजन किया गया है। यह बस्तर के स्वाभिमान को पूरे देश के सामने स्थापित करने जैसा है।
प्रतिनिधिमंडल की खास बातें
इस ऐतिहासिक यात्रा पर गए छत्तीसगढ़ के प्रतिनिधिमंडल में प्रशासनिक अधिकारियों के साथ-साथ बस्तर के जमीनी स्तर के पारंपरिक अगुआ भी शामिल हैं। सरकार का मकसद इन पारंपरिक प्रमुखों को यह अहसास दिलाना है कि देश की लोकतांत्रिक व्यवस्था में उनकी भूमिका कितनी महत्वपूर्ण है।
| मुख्य नेतृत्व | प्रमुख प्रतिनिधि | विशेष भागीदारी |
|---|---|---|
| मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय | परगना मांझी और मांझी | पद्मश्री पुरस्कार विजेता |
| उपमुख्यमंत्री विजय शर्मा | चालकी (पारंपरिक सहायक) | सांस्कृतिक विजेता कलाकार |
| संस्कृति मंत्री राजेश अग्रवाल | स्थानीय जनजातीय मुखिया | संभागीय लोक कलाकार |
बस्तर पंडुम का सफर
आखिर ‘बस्तर पंडुम’ क्या है और यह इतना महत्वपूर्ण क्यों हो गया है? पंडुम का सीधा मतलब त्योहार या उत्सव होता है। साल 2025 में जब छत्तीसगढ़ सरकार ने पहली बार इसका आयोजन किया, तो इसने अपनी भव्यता और अनूठे स्वरूप से सबको चौंका दिया था। इस महोत्सव को विश्व के सबसे बड़े जनजातीय सांस्कृतिक आयोजन के रूप में ‘गोल्डन बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड्स’ में जगह मिली थी। साल 2026 में इसके प्रभाव को और अधिक व्यापक बनाया गया। पहले जहां इस प्रतियोगिता में केवल सात विधाएं शामिल थीं, वहीं इस साल इनकी संख्या बढ़ाकर 12 कर दी गई। बस्तर संभाग के 7 जिलों के 32 विकासखंडों से आए लगभग 54,750 कलाकारों ने इसमें हिस्सा लिया। यह कोई छोटा आंकड़ा नहीं है। 10 जनवरी से शुरू होकर 9 फरवरी 2026 तक चले इस महीने भर के उत्सव ने पूरे क्षेत्र को उत्साह से भर दिया था।
“बस्तर की संस्कृति केवल नाचने-गाने तक सीमित नहीं है। यह प्रकृति के साथ जीने की एक अद्भुत कला है, जिसे दुनिया को सीखना बाकी है।”
12 सांस्कृतिक विधाएं
इस महोत्सव में शामिल की गई 12 विधाएं बस्तर के दैनिक जीवन, उनके खान-पान और उनकी कलात्मकता को गहराई से दर्शाती हैं:
- पारंपरिक जनजातीय नृत्य: मांदरी, ककसाड़ और डंडारी जैसे नृत्यों का जीवंत प्रदर्शन।
- लोकगीत और लोकनाट्य: मौखिक इतिहास को बयां करते गीत और स्थानीय नाटक।
- पारंपरिक वाद्ययंत्र: तोड़ी, मोहरी और मांदर जैसे दुर्लभ वाद्ययंत्रों की धुनें।
- वेशभूषा और आभूषण: कौड़ियों, पंखों और पीतल से सजे पारंपरिक परिधान।
- शिल्पकला और चित्रकला: बस्तर का विश्वप्रसिद्ध ढोकरा आर्ट, लौह शिल्प और भित्ति चित्र।
- पारंपरिक पेय और व्यंजन: सल्फी, लांदा और बस्तर के जंगलों से मिलने वाले अनूठे स्थानीय स्वाद।
- आंचलिक साहित्य और वन-औषधि: सदियों पुराना जड़ी-बूटियों का ज्ञान और स्थानीय बोलियों का समृद्ध साहित्य।
पारंपरिक स्वशासन का सम्मान
बस्तर की पारंपरिक व्यवस्था बेहद लोकतांत्रिक और मजबूत है। यहां ‘परगना मांझी’, ‘मांझी’ और ‘चालकी’ जैसे पदों पर आसीन व्यक्ति केवल रस्मी मुखिया नहीं होते, बल्कि वे समाज के भीतर आपसी विवादों को सुलझाने, वनों के संरक्षण और त्योहारों के आयोजन में मुख्य भूमिका निभाते हैं। ब्रिटिश काल से लेकर आज तक इन पारंपरिक नेताओं ने बस्तर के सामाजिक ताने-बाने को टूटने से बचाया है। राष्ट्रपति भवन में इन्हें सम्मानित करना इस बात का सीधा प्रमाण है कि देश अब अपनी जड़ों की ओर लौट रहा है और पारंपरिक प्रशासनिक प्रणालियों की उपयोगिता को स्वीकार कर रहा है।
बदलता बस्तर, नई उम्मीदें
इस राष्ट्रीय सम्मान के बहुत गहरे मायने हैं। बस्तर को अक्सर केवल संघर्ष और अशांति के चश्मे से ही देखा जाता रहा है। लेकिन बस्तर पंडुम जैसी पहलों और इस राष्ट्रीय सम्मान से बस्तर की एक नई, सकारात्मक छवि उभरकर सामने आई है। जब देश के सर्वोच्च पद पर बैठी राष्ट्रपति इन लोक कलाकारों का हौसला बढ़ाती हैं, तो यह सीधे बस्तर के सुदूर जंगलों में बैठे उस युवा कलाकार तक पहुंचता है जो अपनी संस्कृति को खोने के डर से जूझ रहा था। यह सम्मान बस्तर के लोगों को यह भरोसा दिलाएगा कि देश उनके साथ खड़ा है और उनकी अनूठी जीवनशैली ही उनकी सबसे बड़ी ताकत है।







