काठमांडू, अंग भारत। भारत और नेपाल के बीच सीमा प्रबंधन को और अधिक पारदर्शी और सुदृढ़ बनाने के उद्देश्य से सर्वे अधिकारी समिति (एसओसी) की 13वीं बैठक 12 से 14 अगस्त तक लखनऊ में आयोजित की जाएगी। इस महत्वपूर्ण बैठक का मुख्य केंद्र बिंदु सीमा कार्य समूह (बीडब्ल्यूजी) की 7वीं बैठक में लिए गए निर्णयों को जमीन पर उतारना है। इस बैठक में न केवल कार्ययोजना को अंतिम रूप दिया जाएगा, बल्कि आवश्यक बजट आवंटन को भी मंजूरी मिलने की पूरी उम्मीद है, ताकि सीमावर्ती क्षेत्रों में रुके हुए तकनीकी कार्यों को गति दी जा सके।
एसओसी बैठक का महत्व
भारत और नेपाल की सीमा पर शांति और तकनीकी समन्वय बनाए रखने में एसओसी एक अनिवार्य कड़ी है। नापी विभाग के उपमहानिदेशक सुशील डंगोल के नेतृत्व में नेपाली प्रतिनिधिमंडल इस चर्चा में शामिल होगा। यह बैठक इसलिए भी खास है क्योंकि इसमें पिछले तीन वर्षों के कार्यों का लेखा-जोखा लिया जाएगा। हालांकि, यह स्पष्ट करना जरूरी है कि इस तंत्र का अधिकार क्षेत्र सुस्ता और कालापानी जैसे संवेदनशील विवादित क्षेत्रों तक सीमित नहीं है।
बीडब्ल्यूजी की कार्यप्रणाली
बीडब्ल्यूजी का गठन 2014 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की नेपाल यात्रा के दौरान एक द्विपक्षीय तंत्र के रूप में किया गया था। इसका मूल उद्देश्य तकनीकी स्तर पर सीमा के प्रबंधन को व्यवस्थित करना है। इसके मुख्य कार्यों में शामिल हैं:
- दशगजा क्षेत्र को अतिक्रमण से मुक्त कराना।
- नए सीमा स्तंभों (Boundary Pillars) का निर्माण और स्थापना।
- क्षतिग्रस्त स्तंभों की संयुक्त मरम्मत और रखरखाव।
- सीमा पार स्थित नागरिकों की संपत्तियों का रिकॉर्ड अद्यतन करना।
सीमा स्तंभों की वर्तमान स्थिति
नापी विभाग के आंकड़े चिंताजनक तस्वीर पेश करते हैं। सीमा पर कुल 8,554 स्तंभों में से एक बड़ी संख्या खराब हालत में है। यह स्थिति सीमा सुरक्षा और प्रबंधन के लिए चुनौतीपूर्ण है। विवरण नीचे दी गई तालिका में देखा जा सकता है:
| विवरण | संख्या |
|---|---|
| कुल सीमा स्तंभ | 8,554 |
| लापता स्तंभ | 1,325 |
| क्षतिग्रस्त स्तंभ | 1,956 |
देरी के पीछे के कारण
सीमा पर तकनीकी कार्यों को पूरा करने का लक्ष्य मूल रूप से 2015 में रखा गया था, जिसे बाद में 2017 में 2022 तक बढ़ाया गया। लेकिन जमीनी स्तर पर कई बाधाएं आईं। कोविड-19 महामारी ने जहां पूरे वैश्विक तंत्र को रोक दिया, वहीं बजट की कमी और प्रतिकूल मौसम ने भी काम की गति को धीमा कर दिया। 2020 के राजनीतिक मानचित्र विवाद और उसके बाद द्विपक्षीय संबंधों में आई खटास के कारण 2019 के बाद से बीडब्ल्यूजी की बैठकें नहीं हो सकीं, जिससे काम का एक बड़ा हिस्सा लंबित रह गया।
जीपीएस और तकनीकी समीक्षा
इस बार की लखनऊ बैठक में केवल पुराने कामों की समीक्षा ही नहीं होगी, बल्कि भविष्य की तकनीक पर भी जोर दिया जाएगा। नापी विभाग के अधिकारियों के अनुसार, बैठक में ग्लोबल पोजिशनिंग सिस्टम (जीपीएस) बेस स्टेशन के उन्नयन (Upgradation) पर विशेष चर्चा होगी। जीपीएस के इस्तेमाल से सीमा रेखाओं को अधिक सटीक रूप से चिह्नित करना संभव होगा, जिससे भविष्य में स्तंभों के लापता होने या अतिक्रमण की समस्याएं कम होंगी।
शेष कार्ययोजना की चुनौती
निर्धारित समयसीमा के दो साल बीत चुके हैं और अब हाथ में केवल एक साल का समय बचा है। ऐसे में लखनऊ में होने वाली यह बैठक शेष कार्यों को तेजी से निपटाने के लिए एक ‘रोडमैप’ तैयार करेगी। नेपाल द्वारा 2020 में जारी किए गए राजनीतिक मानचित्र ने सीमा मुद्दे को संवेदनशील बना दिया था, लेकिन तकनीकी स्तर पर इस तरह की द्विपक्षीय बातचीत से यह उम्मीद जगती है कि व्यावहारिक समस्याओं का समाधान वार्ता की मेज पर ही संभव है।
लखनऊ में आयोजित होने वाली यह बैठक दोनों देशों के बीच तकनीकी विश्वास को बहाल करने की दिशा में एक अहम कदम है। यदि इस बार बजट और कार्य योजना को लेकर ठोस सहमति बनती है, तो अगले एक साल में सीमा प्रबंधन में बड़ा बदलाव देखने को मिल सकता है, जो दोनों देशों के नागरिकों के लिए सुरक्षा और स्पष्टता का आधार बनेगा।







