नई दिल्ली,अंग भारत। पश्चिम एशिया में पिछले दो हफ्तों से अमेरिका और ईरान के बीच चल रही भीषण जंग पर अचानक ब्रेक लगने से वैश्विक बाजार को बड़ी राहत मिली है। दोनों देशों की तरफ से बमबारी रोके जाने के बाद अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में भारी गिरावट दर्ज की गई है। इस बड़ी भू-राजनीतिक राहत के कारण ब्रेंट क्रूड और वेस्ट टेक्सास Intermediate (WTI) की कीमतें अचानक धड़ाम हो गईं। ब्रेंट क्रूड फिसलकर 91 डॉलर प्रति बैरल के पास आ गया, जबकि डब्ल्यूटीआई क्रूड भी तेजी से नीचे गिरते हुए 85 डॉलर के करीब पहुंच गया। युद्ध की आशंकाएं कम होने से निवेशकों ने राहत की सांस ली है, जिसका सीधा असर तेल बाजार के सेंटिमेंट पर दिखा।
कीमतों में रिकॉर्ड गिरावट
वैश्विक बाजार में कच्चे तेल की कीमतें पिछले कई दिनों से लगातार बढ़ रही थीं। अमेरिकी हमलों और ईरानी जवाबी कार्रवाई के कारण दुनिया भर के व्यापारियों को लग रहा था कि तेल की सप्लाई ठप हो जाएगी। लेकिन जैसे ही दोनों देशों ने हवाई हमले रोकने का ऐलान किया, बाजार की दिशा पूरी तरह बदल गई। दोनों पक्षों द्वारा एक-दूसरे के ठिकानों पर सैन्य कार्रवाई बंद करने के फैसले से तेल की कीमतों में एक ही दिन में सात प्रतिशत से भी अधिक की रिकॉर्ड गिरावट आई। इस तेज बिकवाली के चलते ब्रेंट क्रूड लुढ़ककर 91.33 डॉलर प्रति बैरल के निचले स्तर पर आ गया। वहीं, अमेरिकी बेंचमार्क माना जाने वाला डब्ल्यूटीआई क्रूड भी बुरी तरह टूटकर 84.07 डॉलर प्रति बैरल के स्तर तक फिसल गया।
तनाव घटने की मुख्य वजह
इस पूरे घटनाक्रम के पीछे दोनों देशों के बीच पिछले 14 दिनों से चल रहा तनाव जिम्मेदार था। दरअसल, सीजफायर खत्म होने के ठीक बाद अमेरिका और ईरान ने एक-दूसरे के सैन्य ठिकानों पर ताबड़तोड़ हवाई हमले शुरू कर दिए थे। लगभग दो हफ्तों तक दोनों ओर से लगातार भारी गोलाबारी होती रही। इस तनाव से वैश्विक तेल सप्लाई चेन पूरी तरह बाधित होने का गंभीर खतरा पैदा हो गया था। इसी डर से कच्चे तेल की कीमतें 100 डॉलर प्रति बैरल के मनोवैज्ञानिक स्तर को पार कर गई थीं। अब जब दोनों बड़ी ताकतों ने अपने कदम पीछे खींच लिए हैं और हवाई हमलों को रोक दिया है, तो तेल की कीमतें तुरंत सामान्य होने की दिशा में बढ़ चली हैं।
ब्रेंट क्रूड का पूरा आंकड़ा
अंतरराष्ट्रीय बाजार में कारोबार की शुरुआत से ही ब्रेंट क्रूड पर भारी दबाव देखा गया। ब्रेंट क्रूड ने आज के कारोबारी सत्र में 6.04 डॉलर प्रति बैरल यानी करीब 6.55 प्रतिशत की बड़ी गिरावट के साथ 91.94 डॉलर प्रति बैरल के स्तर से शुरुआत की थी। इसके बाद बाजार में बिकवाली का दौर और तेज हो गया। बिकवाली के दबाव में ब्रेंट क्रूड की कीमत 7.05 डॉलर प्रति बैरल यानी लगभग 7.16 प्रतिशत गिरकर 91.33 डॉलर प्रति बैरल के स्तर तक पहुंच गई। हालांकि, निचले स्तर पर आने के बाद बाजार में थोड़ी रिकवरी भी देखी गई। भारतीय समयानुसार सुबह 9:15 बजे ब्रेंट क्रूड 5.71 डॉलर प्रति बैरल यानी 5.80 प्रतिशत की कमजोरी के साथ 92.67 डॉलर प्रति बैरल के आसपास ट्रेंड कर रहा था।
डब्ल्यूटीआई में भारी उथल-पुथल
ब्रेंट क्रूड की ही तरह वेस्ट टेक्सास इंटरमीडिएट (WTI) क्रूड के भाव में भी भारी उठापटक देखने को मिली। डब्ल्यूटीआई क्रूड ने आज के कारोबार में 5.76 डॉलर प्रति बैरल यानी लगभग 6.37 प्रतिशत की मंदी के साथ 84.71 डॉलर के स्तर पर शुरुआत की। बाजार खुलते ही बिकवाली हावी हो गई और इसकी कीमतें 6.40 डॉलर प्रति बैरल यानी 7.07 प्रतिशत की भारी गिरावट के साथ 84.07 डॉलर के स्तर तक फिसल गईं। हालांकि, ब्रेंट की तरह इसमें भी बाद में मामूली सुधार दिखा। सुबह 9:15 बजे यह डब्ल्यूटीआई क्रूड 5.28 डॉलर प्रति बैरल यानी 5.84 प्रतिशत गिरकर 85.19 डॉलर प्रति बैरल पर ट्रेड करता देखा गया।
कीमतों का ताजा समीकरण
कच्चे तेल के आज के उतार-चढ़ाव को नीचे दी गई तालिका से आसानी से समझा जा सकता है:
| क्रूड ऑयल प्रकार | ओपनिंग प्राइस ($) | सबसे निचला स्तर ($) | गिरावट (%) | सुबह 9:15 बजे की स्थिति ($) |
|---|---|---|---|---|
| ब्रेंट क्रूड (Brent Crude) | 91.94 | 91.33 | 7.16% | 92.67 |
| डब्ल्यूटीआई क्रूड (WTI) | 84.71 | 84.07 | 7.07% | 85.19 |
भारत पर इसका सीधा असर
इस बड़ी गिरावट का असर सिर्फ अंतरराष्ट्रीय वायदा बाजारों तक सीमित नहीं रहेगा। भारत जैसे विकासशील देशों के लिए, जो अपनी जरूरत का लगभग 80 से 85 प्रतिशत कच्चा तेल आयात करते हैं, यह गिरावट बड़ी राहत लेकर आई है। जब भी अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चा तेल सस्ता होता है, तो देश के चालू खाता घाटे पर दबाव कम होता है और रुपये को मजबूती मिलती है। तेल की कीमतों में इस नरमी से घरेलू बाजार में पेट्रोल और डीजल की कीमतों पर भी आने वाले दिनों में अनुकूल प्रभाव पड़ सकता है। हालांकि, बाजार के विश्लेषक अभी भी पश्चिम एशिया की राजनीतिक स्थितियों पर पैनी नजर रख रहे हैं क्योंकि वहां की भू-राजनीति काफी संवेदनशील बनी हुई है।
मुख्य आर्थिक फायदे क्या हैं
भारतीय अर्थव्यवस्था को इस तेल मंदी से कई स्तरों पर सीधे तौर पर फायदा मिलने की उम्मीद है। मुख्य लाभ कुछ इस प्रकार हैं:
- सस्ता आयात बिल: कच्चे तेल के दाम गिरने से भारत के आयात खर्च में हर महीने बड़ी विदेशी मुद्रा की बचत होती है।
- घरेलू रुपये को मजबूती: आयात बिल कम होने से अमेरिकी डॉलर की मांग घटती है, जिससे भारतीय रुपये को मजबूती मिलती है।
- महंगाई पर लगाम: डीजल के दाम स्थिर होने या घटने से माल ढुलाई की लागत कम होती है, जिसका सीधा असर रोजमर्रा के सामानों की कीमतों पर पड़ता है।
कच्चे तेल की कीमतों में आई यह भारी गिरावट भारत के घरेलू शेयर बाजार के लिए भी टॉनिक का काम कर सकती है। इससे खासकर पेंट, सीमेंट और एविएशन सेक्टर की कंपनियों की लागत कम होगी, जिससे उनके मुनाफे में सुधार की उम्मीद है।
हालांकि, तेल बाजार की यह शांति कितनी टिकाऊ है, इस पर अभी कुछ भी कहना जल्दबाजी होगी। पश्चिम एशिया के हालात पल-पल बदलते हैं और वहां का भू-राजनीतिक परिदृश्य बेहद संवेदनशील है। यही वजह है कि घरेलू तेल कंपनियां और विशेषज्ञ अभी पूरी स्थिति को करीब से देख रहे हैं।








