नई दिल्ली,अंग भारत। चुनाव आयोग ने हाल ही में सोशल मीडिया पर फैल रही भ्रामक सूचनाओं और डीपफेक सामग्री को रोकने के लिए एक बेहद सख्त रुख अपनाया है। आयोग ने सभी डिजिटल प्लेटफॉर्म्स को स्पष्ट आदेश दिए हैं कि किसी भी प्रकार की आपत्तिजनक, फर्जी या भ्रामक पोस्ट की पहचान होने पर उसे अधिकतम 3 घंटे के भीतर हटाना अनिवार्य होगा। यह कदम निष्पक्ष और पारदर्शी चुनाव सुनिश्चित करने के लिए उठाया गया है, ताकि डिजिटल युग में लोकतांत्रिक प्रक्रिया की गरिमा बरकरार रहे।
सोशल मीडिया के लिए निर्देश
डिजिटल प्लेटफॉर्म्स की जिम्मेदारी अब पहले से कहीं अधिक बढ़ गई है। चुनाव आयोग के कड़े दिशा-निर्देशों के तहत, सोशल मीडिया कंपनियों को अब केवल कंटेंट हटाना ही नहीं, बल्कि ऐसी सामग्री पर त्वरित प्रतिक्रिया भी देनी होगी।
- किसी भी आपत्तिजनक पोस्ट की रिपोर्ट मिलते ही 180 मिनट के भीतर कार्रवाई करनी होगी।
- फर्जी और भ्रामक जानकारी फैलाने वाले एकाउंट्स पर कड़ी निगरानी रखी जाएगी।
- चुनाव प्रक्रिया को प्रभावित करने वाले किसी भी डिजिटल हेरफेर को बर्दाश्त नहीं किया जाएगा।
AI कंटेंट पर पाबंदी
आजकल आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) का इस्तेमाल करके राजनेताओं की फर्जी आवाजें या वीडियो (डीपफेक) बनाना काफी आसान हो गया है। चुनाव आयोग ने इसे गंभीरता से लिया है। अब यदि कोई राजनीतिक दल या उम्मीदवार किसी ऐसे कंटेंट का उपयोग करता है जिसे AI की मदद से बनाया गया है या एडिट किया गया है, तो उसे स्पष्ट रूप से ‘AI जनित’ या ‘डिजिटल रूप से परिवर्तित’ टैग करना होगा। इतना ही नहीं, उस कंटेंट का स्रोत क्या है, यह भी बताना अनिवार्य होगा ताकि मतदाता भ्रमित न हों।
विशेष निगरानी अभियान
आयोग ने विशेष रूप से पांच राज्यों—असम, केरल, तमिलनाडु, पुडुचेरी और पश्चिम बंगाल—में चुनाव के दौरान सोशल मीडिया पर एक हाई-टेक निगरानी सेल सक्रिय किया है। इसका मुख्य काम उन पोस्ट को ट्रैक करना है जो आचार संहिता का उल्लंघन करती हैं या समाज में नफरत फैलाने का काम करती हैं। 15 मार्च के बाद से अब तक करीब 11,000 से अधिक आपत्तिजनक पोस्ट और यूआरएल की पहचान की जा चुकी है, जिन पर संबंधित सोशल मीडिया कंपनियों के माध्यम से कार्रवाई की गई है या पुलिस को रिपोर्ट किया गया है।
मौन अवधि का महत्व
जन प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 की धारा 126 के तहत, मतदान से 48 घंटे पहले ‘मौन अवधि’ (Silence Period) लागू हो जाती है। इस दौरान सोशल मीडिया पर किसी भी तरह का चुनावी प्रचार या विज्ञापन डालना पूरी तरह से प्रतिबंधित है। यह नियम केवल पोस्ट तक सीमित नहीं है, बल्कि डिजिटल विज्ञापनों और पेड प्रमोशन पर भी लागू होता है। इस नियम का उल्लंघन करने पर भारी जुर्माना और कानूनी कार्रवाई का प्रावधान है।
सी-विजिल ऐप का उपयोग
नागरिकों को सशक्त बनाने के लिए चुनाव आयोग ने ‘सी-विजिल’ (cVIGIL) ऐप को एक प्रमुख हथियार बनाया है। यह ऐप किसी भी जागरूक नागरिक को आचार संहिता के उल्लंघन की रिपोर्ट करने की अनुमति देता है। इसकी प्रभावशीलता का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि 15 मार्च से 19 अप्रैल के बीच ही 3 लाख से अधिक शिकायतें दर्ज की गई हैं।
| विवरण | आंकड़े |
|---|---|
| दर्ज कुल शिकायतें | 3,23,099 |
| निपटान समय | 100 मिनट के भीतर |
| सफलता दर | 96% |
आयोग का दावा है कि 96% मामलों का निपटारा मात्र 100 मिनट की समय सीमा में किया गया है। यह डेटा दर्शाता है कि चुनाव आयोग तकनीक का इस्तेमाल करके जमीनी स्तर पर चुनावी कदाचार को कम करने में कितना सफल रहा है। आयोग ने साफ कर दिया है कि चुनावी पवित्रता बनाए रखने के लिए किसी भी प्लेटफॉर्म या व्यक्ति को कानून से ऊपर नहीं माना जाएगा।








